छठी बैठक: 15 मई 2026
विषय:
लोकविद्या, विश्वविद्यालय और पर्यावरण
प्रमुख वक्ता:
1. छेदीलाल निराला, प्रजापति समाज शोषित संघर्ष समिति; 2. रंजन प्रताप सिंह, शोध छात्र, बी.एच.यू.
विषय के बारे में
आज नगरीय पर्यावरण को जीने लायक स्वच्छ बनाना यह एक बहुत बड़ी चुनौती है. यह अब संदेह नहीं रह गया है कि पर्यावरण प्रदूषण (जल, मिट्टी, हवा, वातावरण आदि) की समस्या विकराल हो जाने का कारण सरकारों ने लागू की ‘विकास’ की नीतियों में रहा. इस बैठक में आज हम इस विषय के ज्ञान-आधार पर चर्चा करेंगे और लोकविद्या और विश्वविद्यालय विद्या के बीच इस विषय पर कहाँ टकराहट है और कहाँ सहयोग की संभावना है, इस पर बात करेंगे.
यह चर्चा वाराणसी नगर के सन्दर्भ में होगी जो समस्या को हल करने में लोक-भागीदारी के रास्तों की खोज में सहायक होगी. स्थानीय स्तर पर लोकविद्या के बल पर इस दिशा में कितने तरह के काम हो सकते हैं, आदि पर शोध के रास्ते भी प्रशस्त करेगी.
ये बातें बौद्धिक सत्याग्रह की मांग करती हैं. बहुजन को आगे बढ़कर इसका नेतृत्व करना चाहिए. बौद्धिक सत्याग्रह ज्ञान और कार्य में लोकविद्या और विश्वविद्यालय के ज्ञान में बराबरी का दावा पेश करने का सत्याग्रह है.
पाँचवीं बैठक: 15 अप्रैल 2026
विषय:
साम्राज्यवादी युद्ध, किसान और बहुजन स्वराज
प्रमुख वक्तागण:
1. रामजनम, 2. रामजी सिंह, 3. विद्याधर, 4. राजेन्द्र मानव, 5. लक्ष्मण प्रसाद
विषय के बारे में
इस बार यह पंचायत वाराणसी शहर में और आसपास के गाँवों में सरकार द्वारा ज़मीनों का अधिग्रहण किये जाने से सम्बंधित है, जिसके चलते सामान्यजन और किसानों की जीविका खतरे में हैं. यह राज्यसत्ता का बहुजन के खिलाफ एक अघोषित युद्ध है. एक तरफ साम्राज्यवादी राज्यसत्ताएं ईरान पर आक्रमण कर उसे मिटा देने के अहंकार में अंधी और उन्मत्त हैं, तो दूसरी तरफ इन्हीं साम्राज्यवादी राज्यसत्ताओं ने अपने देश के किसान और बहुजन के खिलाफ एक अघोषित युद्ध छेड़ा हुआ है.
इस पंचायत में तीन परियोजनाओं के तहत ली जा रही ज़मीनों के विरोध में संघर्षरत किसानों के नेतृत्व को आमंत्रित किया गया है. वक्ताओं ने मुख्या रूप से निम्नलिखित विषयों पर अपने विचार रखे:
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- रामजनम : किसानों के खिलाफ अघोषित युद्ध का हल है- बहुजन स्वराज.
- रामजी सिंह: काशी द्वार परियोजना के तहत पिंडरा ब्लाक के 10 गांवों की ज़मीन जाएगी.
- विद्याधर : रामनगर में बंदरगाह निर्माण परियोजना
- राजेंद्र प्रसाद मानव: सिंहपुर में वैदिक सिटी निर्माण परियोजना 5 गांवों की ज़मीन
- लक्ष्मण प्रसाद : बहुजन स्वराज का रास्ता- रचनात्मक कार्य
चौथी बैठक: 15 मार्च 2026
विषय:
1. अमेरिका भारत व्यापार समझौता, और 2. अमेरिका-इज़राइल और ईरान युद्ध
प्रमुख वक्ता:
1. विजय जावंधिया, किसान नेता; 2. गिरीश सहस्रबुद्धे
विषय के बारे में
इस बार पंचायत में चर्चा का दोहरा विषय है अमेरिका – भारत के बीच ट्रेड डील, और ट्रेड डील के साथ अमेरिका-इजराइल और ईरान का युद्ध. जिस प्रकार से अमेरिका भारत से व्पापार के विषय में, और ख़ास कर अपने कृषि-उत्पादों को भारत पर थोंपने के बारे में निरंतर दबाव बना रहा है, उसपर बात होगी. उसी तरह जैसे अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्राध्यक्ष को अगवा करके अपने जेल में बंद कर दिया, या ईरान के सर्वोच्च नेता की ह्त्या कर दी, इसपर बात होगी. इन दोनों को जोड़ते हुए विषय बनाया है आजकी चर्चा का. कोशिश हम लोगों की है कि ट्रेड डील पर हमारे जो मुख्य वक्ता हैं आदरणीय विजय जावंधिया जी, जिन्होंने डब्ल्यूटीओ की शुरुआत से ही इसको बहुत पैनी नजर से और गहराई से देखा है, उनसे हम इस व्यापार समझौते के बारे में सुनें और इन चीजों पर हम भी सोचें. यदि उनसे बातचीत होगी, तो हम लोग ट्रेड डील को ठीक से समझ पाएंगे. दूसरा भाग है कि जो अमेरिका कर रहा है, अभी जो दादागिरी है उसकी, उस पर गिरीश जी अपनी बातचीत रखेंगे. हम लोग भी जो हम समझते हैं, या हमारे के मन में सवाल होंगे उनको रखेंगे.
तीसरी बैठक: 15 फरवरी 2026
विषय:
बौद्धिक सत्याग्रह-ज्ञान के क्षेत्र में बहुजन का दखल
प्रमुख वक्ता:
1. अपर्णा; 2. डॉ. राहुल राजभर
अपर्णा जी गाँव के लोगों की आवाज़ में जान फूंकने वाली पत्रकार हैं जिन्होंने ‘गाँव के लोग’ पर पूर्वी उत्तर प्रदेश में विस्थापन की विस्तृत रिपोर्टिंग की है. आप ‘आफत में गाँव’ पुस्तक (अगोरा प्रकाशन, वाराणसी) की लेखिका हैं.
डॉ. राहुल राजभर, बीएचयू से समाजशास्त्र में पीएचडी हैं. छात्र जीवन से ही बहुजन के लिए बराबरी के मुखर प्रवक्ता रहे हैं. अब समानता के लिए और शोषण के विरुद्ध संघर्ष आगे बढ़ाने के लिए राजनीति में सक्रिय हैं.
विषय के बारे में
हाल ही में देश के सार्वजनिक जीवन में दो मुद्दों पर उबाल आया हुआ है.
- भारत और अमेरिका की सरकारों के बीच कृषि क्षेत्र में जो समझौता हुआ है वह भारत के किसान समाज के साथ ही पूरे बहुजन समाज के लिए भयंकर त्रासदी का दौर ले आएगा. किसान, कारीगर, छोटे दुकानदार और स्थानीय बाज़ार इस समझौते के चलते उजड़ जायेंगे. इस विस्तृत उजाड़ और विस्थापन का मुकाबला किस ज्ञान के आधार पर होगा?
- विश्वविद्यालयों में बहुजन के साथ भेदभाव कम करने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की एक नियमावली आई है, जिसका विशेष वर्ण के समूह खुला विरोध कर रहे हैं और बहुजन छात्र इसे लागू करने की मांग कर रहे हैं. चारों ओर इस विषय पर बड़ी अफरातफरी है.
दोनों ही बातें बौद्धिक सत्याग्रह की मांग करती हैं.
बहुजन को आगे बढ़कर इसका नेतृत्व करना चाहिए.
विश्वविद्यालय के छात्रों में ‘सामाजिक भेदभाव’ के सवाल पर उठा उबाल आधुनिक शिक्षा और नौकरी के संस्थानों के अन्दर का सवाल है. जितने बहुजन इसके अन्दर आते हैं, उसकी तुलना में कई गुना बाहर हैं, जो भारत सरकार की भेदभावपूर्ण (सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक) नीतियों के शिकार हैं. ये सभी अपना जीवन अपने ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर चलाते हैं. विश्वविद्यालय का ज्ञान और लोकविद्या में जब तक बराबरी और भाईचारे का रिश्ता नहीं बनता, तब तक न व्यापक समाज में और न विश्वविद्यालय के अन्दर ‘सामाजिक भेदभाव’ रोका जा सकता है. बहुजन छात्रों का यह उबाल विश्वविद्यालय की दीवार के बाहर व्यापक बहुजन की ‘समाज-शक्ति’ को पहचानने और उसके संवर्धन के रास्तों से जुड़े, यह आज की मांग है. ऐसे जुड़ाव का एक मार्ग बौद्धिक सत्याग्रह है.
ज्ञान के क्षेत्र में शोषण, ऊंच-नीच और भेदभाव से मोर्चा उठाना बौद्धिक सत्याग्रह है.
पहली बैठक: 15 दिसम्बर 2025
विषय:
बहुजन समाज की शक्ति के स्रोत उजागर करने मे साहित्य और कला की भूमिका
प्रमुख वक्ता:
रामजी यादव, गाँव के लोग पत्रिका के सम्पादक और अगोरा प्रकाशन
ज्ञान के क्षेत्र में शोषण, ऊंच-नीच और भेदभाव से मोर्चा उठाना बौद्धिक सत्याग्रह है.
बहुजन स्वराज पंचायत
बहुजन की पहल पर स्वराज का निर्माण
उद्देश्य
- बहुजन स्वराज पंचायत का उद्देश्य बहुजन की पहल पर न्याय, त्याग और भाईचारा के मूल्यों से गर्भित बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय समाज का निर्माण है.
- बहुजन की पहल पर स्वराज के निर्माण का कार्य उनके अपने ज्ञान (लोकविद्या), विरासत और जीवनमूल्यों के बल पर किया जाना है, इसके लिए बहुजन की शक्तियों की पहचान, स्मृति, प्रवृत्ति और आकांक्षाओं का संयोजन आवश्यक है.
- झूठी कहानियों के सुनने-सुनाने का अंत होना चाहिए. एक स्वतंत्र बहुजन आख्यान गढ़ने का लक्ष्य रखना होगा.
- राज्यसत्ता-वित्तीय पूँजी-साइंस (और अब कृत्रिम बुद्धि) के गठबंधन ने असत्य, हिंसा, शोषण, नफ़रत, अन्याय और युद्ध की व्यवस्था को दुनिया पर थोप दिया है. बहुजन स्वराज पंचायत सत्य, सबकी खुशहाली और आपसी सहयोग की व्यवस्थाओं को बनाने का लक्ष्य रखता है.
आवाहन
भारत बहुजन का ही रहा है. यहाँ की सभ्यता और संस्कृति को बहुजन ने ही गढ़ा है. इस सभ्यता का मूल विचार और ज्ञान बहुजन के पास ही रहा है. यही हर युग में देश को संकटों से निकालता और पुनर्निर्मित करता रहा है.अंग्रेजी काल के परकीय पाश्चात्य विचार/व्यवस्था और उसके साथ मेल में बैठी ब्राह्मणवादी विचार/व्यवस्था की जकड़न से मुकाबला इन्होंने ही किया है. आज़ाद भारत में अंग्रेजी भाषा और ब्राह्मणवादी सत्ता के एकाधिकार को गद्दी से बेदखल भी इन्होंने ही किया है. किसान आन्दोलन के लम्बे दौर में हम बहुजन स्वराज की परंपराओं की झलक देख सकते हैं. ‘न्याय, त्याग और भाईचारा’ के मूल्यों में निष्ठा के नतीजे भी किसान आन्दोलन के नतीजों में देखे जा सकते हैं. ये बातें बहुजन की शक्ति के स्रोतों की खोज और उनके पुनरुज्जीवन एवं नवीनीकरण का आवाहन कर रही हैं.
बहुजन स्वराज पंचायत यह अपील करती है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर सामान्य जन यानि बहुजन की पहचान, उनकी विरासत, ज्ञान, जीवनमूल्य, समाज संगठन के प्रकार आदि पर मंथन करें. बहुजन का एक नया आख्यान गढ़ने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी बनती है. इसके लिए जगह-जगह बहुजन स्वराज पंचायतें की जानी चाहिए.
बहुजन की शक्ति के स्रोत
भारत में बहुजन की शक्ति उसकी अपनी मौलिक सामाजिक पहचान में है. बहुजन न अकेला है, न भीड़ है. यह एक बृहत् समाज है. इसकी अपनी ज्ञान (लोकविद्या) और दर्शन की परंपरायें हैं, समाज संगठन और ‘राज’ के अपने मूल्य और तरीके हैं, प्रकृति के साथ सहजीवन के रास्ते बनाना उसके ज्ञान के महत्वपूर्ण अंग रहे हैं. ये सब आज भी मज़बूती से बना हुआ है, केवल इसके ऊपर पड़ी धूल की परतें हटानी हैं. इन शक्तियों के समकालीन स्वरुप को उजागर करना बहुजन स्वराज पंचायत का कार्य है.
हमारे देश में बहुजन अनेक स्वायत्त समाजों में रहता है, जिनके पास अपने-अपने ज्ञान, दर्शन, जीवनमूल्य, और रिश्तों की समझ है. बहुजन समाज को छोटे-छोटे समाजों में विभाजित देखना गलत है, बल्कि ये परस्पर सहयोग और एकता के नित नये प्रकार बनाते आये हैं. नितनवीन तरीकों से सहयोग के ये रिश्ते बना पाने का एक आधार इसमें भी रहा कि ये स्वायत्त समाज किसी दूरस्थ केंद्रीय सत्ता के मातहत नहीं थे, बल्कि समाज में वितरित सत्ता के मार्फ़त संगठित होते रहे. इसे ही स्वराज कहा गया. इन व्यवस्थाओं में जीवन के हर क्षेत्र में बदलाव की पहल बहुजन के पास बनी रही. बहुजन की इस ज्ञान-विरासत में आज भी बहुत संभावनाएं हैं.
यह भी सच हैं कि 20 वीं सदी से बहुजन के अत्यधिक पास स्थित इस तरह की ‘सत्ता’ को ब्राह्मणवादी, साम्राज्यवादी और आधुनिक शिक्षा के संस्थानों ने नकारात्मक करार दिया और उसे नेस्तनाबूत करने के हरसंभव तरीके इस्तेमाल किये. विश्वविद्यालयों मे पढ़े लोगों ने नव-ब्राह्मणवाद को जन्म दिया और बहुजन के स्वायत्त समाजों को ‘जाति’ जैसे शब्दों से संबोधित कर ‘स्वायत्त सत्ता’ के विचार और भूमिका को संकुचित और निकृष्ट करार दिया. आज़ाद भारत के शुरूआती दशकों में बहुजन ने इस साजिश का मुकाबला ‘आरक्षण’ के मार्फ़त किया. लेकिन अब आरक्षण भी बहुजन में विभाजन पैदा करने का आधार बन गया है. ऐसे में बहुजन को अपने मौलिक ‘स्वायत्त सत्ता’ के विचार और जीवन दर्शन पर वापस आना होगा. बहुजन के ‘स्वायत्त सत्ता’ के ताने-बाने से बुने जाल (नेटवर्क) पर ही बहुजन स्वराज निर्मित किया जा सकता है.
‘राज्य’ की परिकल्पना पर खुली नई वैश्विक बहस
मशीनी उद्योगों की दुनिया ने पिछले दो-ढाई सौ वर्षों के दौरान दुनिया भर में राष्ट्र-राज्य की सत्ता को स्थापित किया. इस दौर में राज्यसत्ता-साइंस-पूँजी के गठबंधन के बल पर कुछ राष्ट्रों ने दुनिया के तमाम देशों के संसाधनों और बहुजन की बेतहाशा लूट की. हमारे देश में भी यही हुआ. लेकिन पिछले 25-30 वर्षों में बड़े उद्योगों की दुनिया तेज़ी से सिमट गई और कंप्यूटर-इन्टरनेट के जरिये व्यापार और प्रबंधन पर आधारित एक नई दुनिया बन गई. इस नई दुनिया में वित्तीयपूँजी-राज्यसत्ता-साइंस (और कृत्रिम बुद्धि) के एक नये गठबंधन ने आकार लिया और यह जीवन के हर क्षेत्र पर एकाधिकार बना रहा है; लेकिन इसके विस्तार में शासक वर्गों को राष्ट्र-राज्य की अवधारणा बाधा बनती नज़र आने लगी है. ऐसे में कुछ साम्राज्यवादी शक्तियों ने सभ्यतागत राज्य और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के विचार और ढांचों की और बढ़ने की बात शुरू की है और इसके समर्थक देश और विचारक मुखर होकर बहुजन को रास्ते से हटाने (ख़त्म कर देने) की वकालत करने लगे हैं.
बहुजन को इस स्थिति से मोर्चा लेने और बहुजन हिताय-बहुजन सुखाय समाज के समकालीन जीवन दर्शन और व्यवस्थाओं को गढ़ने की शुरुआत खुद अपने हाथों में लेनी है. बहुजन स्वराज पंचायत इस ओर कदम उठाने का एक प्रयास है.
कार्यक्रम
वाराणसी में विद्या आश्रम के सारनाथ परिसर पर लोकविद्या जन आन्दोलन की पहल पर 7, 8, 9 अक्तूबर 2025 को एक बहुजन स्वराज पंचायत का आयोजन हुआ. तीन दिनों तक लगभग 200 लोगों की भागीदारी से हुई इस पंचायत में उपरोक्त सन्दर्भ में ‘बहुजन की पहल पर स्वराज का निर्माण’ विषय पर विमर्श हुआ. इस पंचायत में ‘स्वराज’ की समकालीन व्याख्या के प्रयास हुए. इस दिशा में बहुजन, सामान्य जीवन, लोकविद्या, पंचायत जैसी अवधारणाओं की भूमिका की विस्तृत चर्चा हुई. नए दृष्टिकोण और नए कार्यक्रम उभर कर आये और इन पर कदम आगे बढाने के लिए भागीदार वक्ताओं का एक व्हाट्सएप समूह भी बनाया गया. कई स्थानों पर बहुजन स्वराज पंचायत को आयोजित करने के प्रस्ताव आये. विद्या आश्रम, सारनाथ से पिछले कुछ वर्षों से शुरू हुए बहुजन ज्ञान संवाद और बहुजन ज्ञान विमर्श जैसे कार्यक्रमों का सिलसिला तेज़ करने की बात हुई.
बहुजन स्वराज पंचायत की विस्तृत रपट यहाँ देखें https://www.vidyaashram.org/bsp/
निवेदक
चित्रा सहस्रबुद्धे, लक्ष्मण प्रसाद, रामजनम, फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, कमलेश कुमार राजभर, पारमिता, गिरीश सहस्रबुद्धे, …

