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NEW: लेख “ज्ञान पंचायतों का सिलसिला” – चित्रा सहस्रबुद्धे (pdf)

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Gyaan Panchayat


Changes in the information age have opened the world of knowledge such that the rule of science and technology is now limited to government departments, professional bodies and the university. Independent thinkers, social activists, non-party political workers and ordinary people are increasingly liberating their knowledge, reasoning and thoughts on policy from the traps of science. Computer, media, language, art and entertainment openly use alternate sources of knowledge, understanding and critical appreciation. All this has greatly enlarged the world of knowledge and there is new respect for other values and standards. A new understanding is emerging that people constitute the biggest location of knowledge and its activity. Take any area of human activity, social problems or nature and you will find a competent alternate understanding and process. The areas of agriculture, health care, house building, forestry, literary criticism, industry and materials, water management, market management, all bear this out. Most such thoughts come to be expressed in the context of problems and resistances which are results of government policy or activity of large corporations. Often such understanding or knowledge process has a deep relation with the needs of the people and their ways of thinking. The dominant media, government, professional bodies and the university appear to get into concerted action to marginalize the arguments and policy proposals that stem from alternate streams of knowledge. Arguments produced in any particular sector or with respect to any specific problem get isolated and no suggestions, that are not main line, are accepted. To alter this situation, it is necessary that alternate thinkers in different areas come together in some effective manner. This will strengthen the people’s side in the spheres of knowledge and policy. For this, it is not at all necessary that these people also agree with one another. What is needed is that they see themselves as participants in a new knowledge movement. A Gyan Panchayat needs to be built to shape such a knowledge movement. This Gyan Panchayat can have the capacity to open pathways for solving problems and handling situations that have plagued mankind for the entire capitalist period.

Let this Gyan Panchayat draw inspiration from the French Encyclopedists and also from Mahatma Gandhi. Just as the European Enlightenment held the Church responsible for the miserable state of man and just as Gandhi held the machine responsible for the debasement that man had suffered, let the Gyan Panchayat stand for humanity and against the university in the period of informational capitalism. University is the most prized product of the capitalist age. It is the university where all that knowledge has been produced which provides the basis of the destruction of nature and production of poverty every day. The university obstructs the free movement of thought by building enclosures, both physical and social. However, one thing that cannot be done to thought, is to stop its movement. There are people everywhere who are not constrained by extraneous considerations and who individually or collectively challenge the false limitations. All these people must become part of this Gyan Panchayat. Gyan Panchayat is like a people’s court in the world of knowledge. It is what ought to turn philosophy into a social force. It is the place from where the knowledge basis of another world is prepared. A revolutionary change in the world of knowledge is a prerequisite for a radical pro-people transformation of the society. Gyan Panchayat is the bearer of such a revolution.

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ज्ञान पंचायत


सूचना युग में बदलाव ने ज्ञान की दुनिया को ऐसे खोल दिया है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी का नियम अब सरकारी विभागों, पेशेवर निकायों और विश्वविद्यालय तक ही सीमित है। स्वतंत्र विचारक, सामाजिक कार्यकर्ता, गैर-पार्टी राजनीतिक कार्यकर्ता और आम लोग तेजी से नीति पर अपने ज्ञान, तर्क और विचारों को विज्ञान के जाल से मुक्त कर रहे हैं। कंप्यूटर, मीडिया, भाषा, कला और मनोरंजन खुले तौर पर ज्ञान, समझ और आलोचना के वैकल्पिक स्रोतों का उपयोग करते हैं। इन सारी प्रक्रियाओं ने ज्ञान की दुनिया का विस्तार किया है जिसकी बदौलत अन्य मूल्यों और मानकों के लिए नया सम्मान पैदा हुआ है। एक नई समझ उभर रही है कि लोग ज्ञान और उसकी गतिविधि का सबसे बड़ा स्थान हैं। मानवीय क्रियाएं, सामाजिक समस्याएं या प्रकृति के किसी भी क्षेत्र को लें, आपको एक सक्षम वैकल्पिक समझ और प्रक्रियायें मिलेंगीं। कृषि, स्वास्थ्य देखभाल, गृह निर्माण, वानिकी, साहित्यिक आलोचना, उद्योग और सामग्री, जल प्रबंधन, या बाजार प्रबंधन किसी भी क्षेत्र को लें, यही दिखाई देगा। साथ ही यह भी दिखाई देगा कि ऐसे अधिकांश विचार उन समस्याओं और प्रतिरोधों के संदर्भ में व्यक्त किए जाते हैं जो सरकारी नीति या बड़े निगमों की गतिविधियों का परिणाम होते हैं। अक्सर ऐसी समझ या ज्ञान प्रक्रिया का लोगों की ज़रूरतों और उनके सोचने के तरीक़ों से गहरा संबंध होता है। लेकिन होता यह है कि प्रमुख मीडिया, सरकार, पेशेवर निकाय और विश्वविद्यालय ज्ञान की वैकल्पिक धाराओं से उपजे तर्कों और नीति प्रस्तावों को दरकिनार करने में लग जाते हैं। परिनाम्वश किसी विशेष क्षेत्र में, या किसी विशिष्ट समस्या के संबंध में सामने आये तर्क अलग-थलग पड़ जाते हैं और कोई भी सुझाव, जो मुख्य धारा में नहीं बैठता, अस्वीकार कर दिया जाता है। इस स्थिति को बदलने के लिए यह आवश्यक है कि विभिन्न क्षेत्रों में वैकल्पिक विचारक किसी प्रभावी तरीके से एक साथ आएं। इससे ज्ञान और नीति के क्षेत्र में लोगों का पक्ष मजबूत होगा। इसके लिए यह बिल्कुल भी जरूरी नहीं है कि वैकल्पिक विचार रखनेवाले सब लोग एक-दूसरे से हर बात में सहमत भी हों। आवश्यकता तो इस बात की है कि वे स्वयं को एक नये ज्ञान आंदोलन में भागीदार के रूप में देखें। ऐसे ज्ञान आंदोलन को आकार देने के लिए एक ज्ञान पंचायत बनाने की जरूरत है। यह ज्ञान पंचायत उन समस्याओं के समाधान और उन स्थितियों से निपटने के रास्ते खोलने में सक्षम हो सकती है, जिन्होंने पूरे पूंजीवादी काल में मानव जाति को त्रस्त किया है।

यह ज्ञान पंचायत को फ्रांसीसी विश्वकोषकारों और महात्मा गांधी दोनों से प्रेरणा ले। जिस तरह यूरोपीय ज्ञानोदय ने मनुष्य की दयनीय स्थिति के लिए चर्च को जिम्मेदार ठहराया और जिस तरह गांधी ने मनुष्य की दुर्दशा के लिए मशीन को जिम्मेदार ठहराया, उसी तरह सूचनात्मक पूंजीवाद के दौर में ज्ञान पंचायत को मानवता के लिए और विश्वविद्यालय के खिलाफ खड़ा होना चाहिए। विश्वविद्यालय पूंजीवादी युग का सबसे चमकीली देन है। यह विश्वविद्यालय ही तो है जहाँ वह सारा ज्ञान पैदा होता है जो दिन-ब-दिन प्रकृति के विनाश और गरीबी के सातत्य का आधार प्रदान करता है। विश्वविद्यालय भौतिक और सामाजिक दोनों तरह के घेरे बनाकर विचारों के मुक्त संचार को बाधित करता है। हालाँकि, विचार के गति को रोकना असंभव है। हर जगह ऐसे लोग हैं जो विचार पर बाहरी बंधनों को न मानते हैं, और न ही उनसे बंधते ही हैं, बल्कि व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से झूठी सीमाओं को चुनौती देते हैं। इन सभी लोगों को ज्ञान पंचायत का हिस्सा बनना चाहिए। ज्ञान पंचायत ज्ञान की दुनिया में जनता की अदालत की तरह है। यही वह जरिया है जो दर्शन को एक सामाजिक ताकत में बदल सकता है। यह वह स्थान है जहां से नयी दुनिया का ज्ञान आधार तैयार होता है। ज्ञान की दुनिया में क्रांतिकारी परिवर्तन समाज में मौलिक लोकहितकारी परिवर्तन की एक शर्त है। ज्ञान पंचायत इसी क्रांति की वाहक है।

 

 

लोकविद्या पंचायत


लोकविद्या पंचायत लोकविद्याधारक समाज की ज्ञान पंचायत है।
विचार
  • मनुष्य एक बौद्धिक प्राणी है। ज्ञान और विवेक उसके स्वाभाविक गुण हैं।
  • अधिकांश लोग, किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे-छोटे दुकानदार और महिलायें, कालेज या विश्वविद्यालय में नहीं पढ़े हैं, लेकिन उनके पास अपना-अपना विस्तृत ज्ञान होता है। इनके ज्ञान को लोकविद्या कहा जाता है। ये लोकविद्याधर कहे जाते हैं।
  • लोकविद्या के बल पर ये अपने घर-परिवार चलाते हैं और तरह-तरह की सुविधायें और वस्तुयें पूरे समाज को मुहैया कराते हैं।
  • इनकी दुर्दशा का कारण यह है कि इनके ज्ञान का, लोकविद्या का कोई संगठन नहीं है। राजनीति में, बड़े बाजार में, बड़े-बड़े सांस्कृतिक प्रतिष्ठानों में और विश्वविद्यालयों में इनके ज्ञान की कोई पूछ नहीं है। वास्तव में समाज के शक्तिसम्पन्न स्थान लोकविद्या को ज्ञान मानने से ही इनकार कर देते हैं।
  • इसके चलते देश और समाज के संचालक मूल्यों, नीतियों और व्यवस्थाओं पर लोकविद्याधारक समाज की समीक्षा व राय लेने की कोई आवश्यकता ही नहीं समझी जाती। नतीजतन लोकविद्याधारक समाज के हित की बातें ठोस रूप में सार्वजनिक नहीं हो पातीं और न शासन की नीति और व्यवस्था में कोई स्थान ही पातीं हैं।
  • जब तक लोकविद्या संगठित नहीं होती, तब तक सार्वजनिक दुनिया में लोकविद्याधारक समाज की दखल नहीं बन सकेगी। लोकविद्याधारक समाज खुशहाली और सम्मान हासिल करे इसके लिये इसी समाज की पहल और नेतृत्व में लोकविद्या का संगठन होना जरूरी है।
  • लोकविद्या पंचायत लोकविद्या का एक ऐसा स्थान होगा जहाँ समाज में सही-गलत की पहचान व्यापक लोकविद्याधर समाज अपने ज्ञान के बल पर करेगा, किन्हीं विशेषज्ञों पर अंध भक्ति से नहीं।
लोकविद्या पंचायत को लोकविद्याधर समाज की ऐसी ज्ञान पंचायत बनाना है जहाँ
  1. किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे-छोटे दुकानदार, महिलायें (लोकविद्याधर) अपने-अपने ज्ञान की क्षमता और सामर्थ्य को बढ़ाने व मजबूत करने के लिये एकत्र होंगे।
  2. जाति, धर्म और सम्प्रदाय से ऊपर उठकर लोकविद्याधारक एक दूसरे से बराबरी के आधार पर वार्ता करेंगे।
लोकविद्या पंचायत लोकविद्याधर समाज की ज्ञान की गतिविधि का ऐसा स्थान बनेगी जहाँ से
  1. यह अभियान चलाया जायेगा कि विभिन्न विद्याओं से प्राप्त आय में 5 गुने से अधिक का अंतर न हो। यानि अधिकतम और न्यूनतम आय में अनुपात 5:1 का हो। (आज सरकारी नौकरी में यह अनुपात लगभग 15:1, और निजी क्षेत्र में लगभग 100:1 का है।)
  2. इस अनुपात को बनाने का लक्ष्य रखते हुये पंचायत, बाजार, कृषि, उद्योग, शिक्षा, चिकित्सा आदि की व्यवस्थाओं पर प्रस्ताव तैयार कर शासन को लागू करने के लिये भेजेगी व इसके पक्ष में तर्क प्रस्तुत करेगी।
  3. संचार माध्यमों और सांस्कृतिक क्षेत्रों में लोकविद्या के मूल्य, शक्ति और दखल के रूपों पर चिंतन कर इनके पक्ष में तर्क प्रस्तुत किये जायेंगे।
  4. लोकविद्या और लोकविद्याधर समाज की खुशहाली, सम्मान और समृद्धि के लिये राजनैतिक और सामाजिक नेतृत्व के सामने सतत राय व प्रस्ताव रखे जायेंगे।

 

आइये!
लोकविद्या पंचायत में भागीदार होकर लोकविद्या को ज्ञान का और लोकविद्याधरों को ज्ञानी होने का दावा पेश करें।

और

एक न्यायपूर्ण और बराबरी पर आधारित समाज को गढ़ने की लोक आधारित ज्ञान-क्रिया को समाज में स्थापित करें।

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ज्ञान पंचायत


माहिती युगातील संक्रमणाने ज्ञानाचे क्षेत्र इतके खुले केले आहे की विज्ञान आणि तंत्रज्ञानाची मक्तेदारी आता केवळ सरकारी विभाग, व्यावसायिक संस्था आणि विद्यापीठे यांच्यापुरतीच शिल्लक राहिली आहे. स्वतंत्र विचारवंत, सामाजिक कार्यकर्ते, पक्षनिरपेक्ष राजकीय कार्यकर्ते आणि सामान्य लोक आपले धोरणविषयक ज्ञान, तर्क आणि दृष्टिकोन सायंसच्या फंदातून सोडवू बघत आहेत. संगणक, माध्यमे, भाषा, कला आणि मनोरंजन या क्षेत्रांत उघडपणे ज्ञान, समज आणि टीका यांच्या पर्यायी स्रोतांचा वापर करता आहेत. या सर्व प्रक्रियांनी ज्ञानाचे जग विस्तार पावले आहे आणि विज्ञानेतर मूल्ये आणि नियमांबद्दल नवीन आदर निर्माण झाला आहे. ज्ञान आणि त्याच्या गतीशीलतेचे अंतिम माहेरघर सर्वसामान्य लोक आहेत, असे नवीन प्रमेय उदयास येत आहे. मानवी कृती, सामाजिक समस्या किंवा निसर्गाचे कोणतेही क्षेत्र घ्या, सर्वत्र तुम्हाला व्यवहार्य पर्यायी विचार, समज आणि प्रक्रिया सापडतील. शेती असो, आरोग्यसेवा असो, घरबांधणी असो, वनीकरण असो, साहित्यिक टीका असो, उद्योग आणि साहित्य असो, जलव्यवस्थापन असो किंवा बाजार व्यवस्थापन असो – कुठलेही क्षेत्र असो, सर्वत्र हेच दिसेल. शिवाय यांपैकी बहुतांश पर्यायी प्रक्रिया सरकारी धोरणे अगर मोठ्या कंपन्यांचे प्रकल्प यांच्यामुळे उद्भवलेल्या समस्या आणि दुष्परिणामांना लोकांनी केलेल्या प्रतिकाराच्या संदर्भात व्यक्त होतांना दिसतात. अनेकदा हे वैकल्पिक विचार किंवा ज्ञान प्रक्रिया यांचा लोकांच्या गरजा आणि विचार करण्याच्या पद्धतींशी जवळून संबंधित असतात. परंतु या पर्यायी प्रवाहांतून उद्भवणारे युक्तिवाद आणि धोरणात्मक प्रस्ताव डावालायला प्रमुख संचार माध्यमे, सरकार, व्यावसायिक संस्था आणि विद्यापीठे ज्ञानाच्या सर्वस्व पणाला लावतात. परिणामी, एखाद्या विशिष्ट क्षेत्रात किंवा विशिष्ट समस्येच्या संदर्भात मांडलेले युक्तिवाद बाजूला सारले जातात आणि मुख्य प्रवाहात न बसणारी कोणतीही सूचना उडवून लावली जाते. ही वस्तुस्थिती बदलण्यासाठी विविध क्षेत्रातील पर्यायी विचारांचा पुरस्कार करणाऱ्यांनी प्रभावीपणे एकत्र येणे गरजेचे आहे. याने ज्ञान आणि धोरण क्षेत्रात लोकांचा हस्तक्षेप बळकट होईल. यासाठी पर्यायी विचार मांडणारे सर्व सर्वच बाबतीत एकमेकांशी सहमत असणे अजिबात आवश्यक नाही. गरज आहे ती प्रत्येकाने स्वत:कडे नवीन ज्ञान चळवळीतील सहभागी म्हणून पाहण्याची. अशा ज्ञान चळवळीला आकार देण्यासाठी ज्ञान पंचायत स्थापन करणे गरजेचे आहे. ही ज्ञान पंचायत भांडवलशाही काळात मानवजातीला ज्या समस्या आणि परिस्थितींनी ग्रासले आहे त्यांवर मात करण्यासाठी व उपाय शोधण्यासाठी समर्थ ठरावी.

या ज्ञान पंचायतीने फ्रेंच विश्वकोषकार आणि महात्मा गांधी या दोघांकडून प्रेरणा घेऊ दे. ज्याप्रमाणे अठराव्या शतकातील युरोपातील प्रबोधनाने (European Enlightenment) माणसाच्या दयनीय अवस्थेसाठी चर्चला जबाबदार धरले, आणि ज्याप्रमाणे गांधींनी माणसाच्या दुर्दशेसाठी यंत्राला जबाबदार धरले, त्याचप्रमाणे माहिती-भांडवलशाही (informational capitalism) च्या युगात ज्ञान पंचायत मानवतेच्या बाजूने आणि विद्यापीठ-विरोधात उभी ठाकली पाहिजे. विद्यापीठ भांडवलशाही युगाची सर्वात ठळक निर्मिती व प्रतीक आहे. ते सर्व ज्ञान जे आजवर निसर्गाचा विनाश आणि न संपणारी गरिबी दोन्ही चा आधार ठरले आहे, या विद्यापीठांनीच तयार केले आहे. भौतिक आणि सामाजिक अशा दोन्ही प्रकारचे बंधने निर्माण करून समाजात लोकस्थ मानवी विचारांच्या मुक्त संचाराला विद्यापीठ सतत अडथळा आणते. तरी शेवटी विचारांची गती थांबवणे अशक्यच आहे. विचारांच्या बाह्य मर्यादांवर ज्यांचा विश्वास नाही, असे लोक सर्वत्र आहेत, आणि ते वैयक्तिकरित्या किंवा सामूहिकपणे खोट्या सीमांना सतत आव्हान देत असतात. या सर्व लोकांनी ज्ञान पंचायतीचा भाग बनले पाहिजे. ज्ञान पंचायत हे ज्ञानाच्या जगातील सार्वजनिक न्यायालय आहे. ज्ञान पंचायत तत्वविचाराचे रूपांतर सामाजिक शक्तीत करायाचे माध्यम ठरावे. नवीन जगाच्या उभारणीचा ज्ञानाधार तयार करू शकेल असे हे ठिकाण आहे. ज्ञानाच्या जगात क्रांतिकारक बदल ही समाजात मूलभूत लोकहितकारी बदलाची अट आहे. ज्ञान पंचायत हे या क्रांतीची वाहक ठरावी.

 

 

लोकविद्या पंचायत


लोकविद्या पंचायत ही लोकविद्याधारक समाजाची ज्ञान पंचायत होय.
विचार
  • मानव हा एक बौध्दिक प्राणी आहे. ज्ञान आणि विवेक त्याचे स्वाभाविक गुण आहेत.
  • शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, लहान दुकानदार आणि स्त्रिया अषा बहुसंख्य लोकांनी कधी कॉलेज अगर विद्यापीठाचे उंबरठे ओलांडले नाहीत. तरी त्यांच्याकडे स्वतःचे असे विस्तृत ज्ञान असते. याच ज्ञानाला लोकविद्या असे म्हणतात. हे सर्व लोकविद्याधर म्हणवतात.
  • हे लोक लोकविद्येच्या बळावर आपले कौटुंबिक जीवन चालवतात आणि सर्व समाजाला वस्तू आणि सुविधा पुरवतात.
  • राज्यव्यवस्था, मोठ्या बाजारपेठा मोठमोठी सांस्कृतिक प्रतिष्ठाने आणि विद्यापीठे लोकविद्येला गणत नाहीत. समाजातील शक्तिस्थळे मुळात लोकविद्येला ज्ञानाचा दर्जाच नाकारतात. लोकांकडील या ज्ञानाचे, लोकविद्येचे कुठलेच संघटन नाही. हेच लोकविद्याधर समाजाच्या दुर्दषेचे कारण होय.
  • अशा परिस्थितीत समाजातील नीतीमूल्ये, धोरणे आणि व्यवस्थांच्या बाबतीत लोकविद्याधर समाजाची मते दुर्लक्षिली जातात. परिणामी या समाजासाठी हिताच्या गोष्टी सार्वजनिक पातळीवर ठोस स्वरूपात पुढे येत नाहीत किंवा शासकीय धोरणे आणि व्यवस्था यांवर प्रभाव टाकू शकत नाहीत.
  • जोवर लोकविद्याधर समाज संघटित नसेल तोवर सार्वजनिक क्षेत्रात या समाजाला कुठलेच स्थान मिळू शकणार नाही. लोकविद्याधर समाज संपन्न व प्रतिष्ठित व्हावा याकरिता याच समाजाच्या नेतृत्वात लोकविद्येचे संघटन होणे गरजेचे आहे.
  • समाजासाठी योग्य काय आणि अयोग्य काय याचा निवाडा लोकविद्याधर समाज, कुठल्याही तज्ञांच्या नव्हे तर, निव्वळ आपल्या ज्ञानाच्या ताकदीवर करू शकेल असे लोकविद्येचे स्थान म्हणजेच लोकविद्या पंचायत.
लोकविद्या पंचायत लोकविद्याधर समाजाची अशी ज्ञान पंचायत असेल जिथे
  • शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, छोटे व्यावसायिक व महिला आपापले ज्ञान व क्षमता वाढविण्याच्या आणि अधिक समर्थ करण्याच्या उद्देषाने एकत्र जमतील.
  • जात, धर्म आणि सम्प्रदाय यांच्या सीमा ओलांडून लोकविद्याधारक समतेच्या आधारावर एकमेकांशी संवाद साधतील.
लोकविद्या पंचायत लोकविद्याधर समाजाच्या ज्ञान-मोहिमेचे असे स्थान बनेल की जेथून
  1. विभिन्न ज्ञान-क्षेत्रांत होणाऱ्या कमाल आणि किमान मिळकतीचे प्रमाण 5:1 यापेक्षा अधिक असू नये अशी मोहीम चालवली जाईल. (आज सरकारी नोकऱ्यांत हे प्रमाण जवळ जवळ 15:1, तर खाजगी क्षेत्रात ते जवळ जवळ 100:1 आहे.)
  2. हे प्रमाण साधता यावे यासाठी पंचायत बाजारपेठ, शेती, उद्योग, षिक्षण, आरोग्य इत्यादी क्षेत्रांत असलेल्या व्यवस्थांबद्दल प्रस्ताव तयार करून सरकार समक्ष ठेवेल आणि प्रस्तावांच्या समर्थनार्थ तर्क मांडले जातील.
  3. संचार माध्यमे आणि सांस्कृतिक क्षेत्रांत लोकविद्येची नीतीमूल्ये, ताकद व स्थान कुठल्याप्रकारे रूजवता व मजबूत करता येतील यावर चिंतन होऊन तशी पावले उचलली जावीत यासाठी पुढाकार घेतला जाईल.
  4. लोकविद्या व लोकविद्याधर समाज यांची भरभराट, सन्मान आणि समृध्दी साधण्याच्या उद्देषाने राजकीय आणि सामाजिक नेतृत्वासमक्ष सतत विचार व प्रस्ताव मांडले जातील.

 

या!
लोकविद्या पंचायत मध्ये सहभागी होऊन लोकविद्या ज्ञान आहे आणि लोकविद्याधर ज्ञानी आहेत असा दावा करू,

आणि,

समता व न्यायावर आधारलेला समाज घडवण्यासाठी लोक-आधारित ज्ञानक्रिया समाजात रूजवू.

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NEW: LJA Workshop in WSF, Kathmandu Nepal (15-19 Feb 2024)

Dialogues on Knowledge in Society

This is an attempt at constructing a universe of knowledge dialogue that is simultaneously a political, economic, cultural and philosophical dialogue. This requires that no strict paradigm of knowledge be allowed to govern the processes of the dialogue. This knowledge dialogue therefore takes place in an universe of knowledge traditions and locations where none is superior or inferior to the other. Knowledge activity in social movements, Lokavidya traditions in ordinary life, science in the universities, knowledge traditions of the monasteries and the knowledge activity on the Internet and many other less conspicuous streams and locations of knowledge are all accorded equal status in these dialogues. Some events and publications are listed below.

  • The Workshops at the World Social Forum: Jan.2004 Mumbai; March 2006, Karachi; November 2006, Delhi; and Jan. 2007, Nairobi. (We failed to reach Nairobi). Four Bulletins in English have been published, one each for the four WSF workshops.
  • Lokavidya Samvad: A Hindi journal. 18 issues have been published since 1998. It tries to engage with economic, cultural, literary, political and philosophical issues with a lokavidya standpoint. Click here for some scans of front covers of previous issues.
  • Kisan Peeth: A forum for knowledge dialogue among farmers and activists relating to problems of peasantry. A bulletin is also published.
  • Chintan Dhaba: A thinker’s cafe just outside the Ashram where workers and peasants discuss with the educated on equal terms about questions ranging from daily issues to philosophy.
  • Seminars, workshops, people’s movements:Participation and organization.
  • Online discussions on the Internet via mailing lists http://www.edu-factory.org and a blog, http://lokavidyapanchayat.blogspot.com.

लोकविद्या सत्संग

 

विद्या आश्रम से लोकविद्या सत्संग का अभियान अब सक्रिय तौर पर शुरू किया गया है. कई वर्षों पहले आश्रम से लोकविद्या सत्संग शुरू किये गये थे। वाराणसी में गंगाजी के घाटों पर और विशेष अवसरों पर प्रयाग में संगम पर लोकविद्या सत्संग के नाम से गायन और वार्ता के कार्यक्रम आयोजित किये जाते रहे. पिछले साल इन्दौर के क्षेत्र में वहां के लोकविद्या समन्वय समूह ने कई ऐसे कार्यक्रम आयोजित किये जो मुख्य रूप से कबीर की गायकी पर आधारित थे। गाँव-गाँव से मंडलियाँ शामिल होती थीं और रात-रात भर भी कार्यक्रम हुए, गाँवों में हुए और कारीगर बस्तियों में हुए।

अब विद्या आश्रम ने लोकविद्या सत्संग के नाम से एक पुस्तिका तैयार की है. यह लोकविद्या जन आंदोलन पुस्तकमाला की पांचवीं कड़ी है। इसमें कबीर के पदों का लोकविद्या संस्करण जैसा बनाया गया है. आश्रम इन पदों को गाने वालों का एक समूह बना रहा है। लोकविद्या आश्रमों में, भाईचारा विद्यालयों से, ज्ञान पंचायतों में और सम्मेलनों तथा संघर्ष व आंदोलन के स्थानों पर इन पदों की गायकी और समसामयिक चर्चा के साथ लोकविद्या सत्संग किये जायेंगे. पुस्तिका विद्या आश्रम की वेब साइट पर है और लिंक भी नीचे दिया जा रहा है.

Kala Sadhana

 

In the field of art lokavidya and organized knowledge in this sub-continent have always been stongly related and interacted with each other leading to enrichment of both. Philosophers tell us that loka and shastra in the world of Indian art have never been opposed to each other, on the contrary it is the practice and convention among the people which has acted as the sustaining criteria. The debate in this respect uses the terms ‘desi’ and ‘margi’ for what is situated and grows in the society at large and the organized institutional forms and expressions. It is generally believed that the two were never hierarchised. One can find rich and relevant discourses in this respect in the writings of Nihar Ranjan Rai, Kapila Vatsyayan and Namwar Singh among others.

It is the understanding of the Ashram that in the present information age the rising new paradigms, theories and philosophies of knowledge would gain immensely from the people’s point of view, if initiatives from the practice and philosophy of art assert their presence in the world of knowledge.It would be our endeavour to take to the center stage in a people’s knowledge movement a new discourse and practice from the fields of art, language, design and media.


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Lokavidya Jan Andolan BLOG
NEW: LJA Workshop in WSF, Kathmandu Nepal (15-19 Feb 2024)

 

Lokavidya Jan Andolan



The first international conference of Lokavidya Jan Andolan (LJA) was held in Varanasi between 12-14 November 2011. LJA activities are at present spread in the states of Uttar Pradesh, Bihar, Madhya Pradesh, Maharashtra and Andhra Pradesh. The following emerged as the consensus in the Lokavidya Jan Andolan (LJA) Conference at Varanasi in November 2011:

  1. LJA is the knowledge movement of the lokavidyadhar samaj.
  2. It places before the society the wide ranging and far-reaching claims of lokavidya.
  3. It develops lokavidya perspectives on various movements of the constituents of lokavidyadhar samaj (farmers, artisans, adivasis, small shopkeepers and women).
  4. It shapes variety of initiatives to infuse lokavidya perspectives into the movements of the lokavidyadhar samaj.
  5. It spreads the idea of lokavidya in the world of activists through participation in and active relations with small and local organizations, institutions, struggles, publications and initiatives for connectivity and communications.
  6. It shapes all its activities in the light of the broad objectives of unity in lokavidyadhar samaj. It is in this unity that it also sees the criteria and tests of lokavidya perspectives.

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NEW: लोजआ कार्यशाला, विश्व सामाजिक मंच, काठमांडू, नेपाल (15-19 फरवरी 2024)
लोकविद्या जन आन्दोलन ब्लॉग

 

लोकविद्या जन आन्दोलन


लोकविद्या जन आन्दोलन के प्रथम अधिवेशन का घोषणापत्र
(विद्या आश्रम, सारनाथ, वाराणसी 12-14 नवम्बर 2011)
जन आन्दोलन और ज्ञान का दृष्टिकोण

विस्थापन आज भारत में सामाजिक आन्दोलनां का सबसे बडा सरोकार बन गया है। यह विस्थापन जमीन, घर, रोजगार, संसाधन और बाजार सभी से हो रहा है। किसानों के आन्दोलन प्रमुख रूप से कृषि उत्पादन का दाम हासिल करने के लिए, कर्ज और बिजली के लिए तथा जबरदस्ती किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ होते रहे हैं। आदिवासियों और स्थानीय समाजों के आंदोलन घर, जमीन और जंगल से बेदखली तथा पर्यावरणीय विनाश के खिलाफ चलते रहे हैं। शहरी गरीबों और झोपड़पट्टियों में रहने वालों के संघर्ष हमेशा ही विस्थापन के विरोध में और सामान्य नागरिक व सामाजिक अधिकारों को हासिल करने के लिए होते रहे हैं। वैश्विक बाजार और बड़ी पूठजी की घुसपैठ द्वारा स्थानीय बाजार को तहस-नहस करने के खिलाफ कारीगर और ठेले-गुमटी पर धंधा करने वाले बड़े पैमाने पर लामबंद होते रहे हैं। ये सभी आंदोलन कुछ समय से विस्थापन के विरोध के एक व्यापक आन्दोलन का रूप ले रहे हैं। एक तरफ शासन और प्रशासन की नई व्यवस्थायें इस प्रतिरोध को बड़े पैमाने पर दबाने में लगी हुई हैं, तो दूसरी तरफ लोगों के साथ खड़े सामाजिक कार्यकर्ता एक नई जन एकता को आकार देने के रास्ते खोज रहे हैं।

ये सब विस्थापन के शिकार लोग और समाज ऐसे हैं जो कभी कालेज नहीं गये हैं और अपनी जिंदगी लोकविद्या क् बल पर चलाते हैं। लोकविद्या उनका अपना वह ज्ञान है जो उन्होंने विरासत में प्राप्त किया है; काम के स्थान पर, समाज में और सहकर्मियों से सीखा है और जिसको उन्होंने अपनी जरूरत, अनुभव और प्रयोगों के बल पर अपनी तर्क बुद्धि से प्रभावी और समसामयिक बनाया है। विस्थापन उनकी जिंदगी की चौखट में ऐसे बदलाव ले आता है जिनके चलते वे लोकविद्या, यानि अपने ज्ञान के इस्तेमाल से वंचित हो जाते हैं और बाजार में एक सस्ते मजदूर के रूप में खड़े कर दिये जाते हैं। लोकविद्याधर समाज का लोकविद्या से रिश्ता टूटने की इस प्रक्रिया का हर हालत में मुकाबला करना ज़रूरी है। वास्तव में लोकविद्या, यानि लोगों का सोचने का तरीका, उनके मूल्य, उनका संगठन का तरीका, उनका हुनर, ज्ञान, सौन्दर्य बोध और नैतिक संवेदनायें, कुल मिलाकर उनकी ज्ञान की दुनिया ही उनकी शक्ति का प्रमुख स्रोत है। भारत में और सारी दुनिया में फैले किसानां, आदिवासियों, कारीगरों, छोटा-छोटा धंधा करने वालों और विविध स्थानीय समाजों के बीच यदि कुछ समान है, तो वह लोकविद्या ही है। यही इन सबके बीच एकता की कड़ी है। यह समझना जरूरी है कि आज मुक्ति का रास्ता ज्ञान की दुनिया से होकर गुजरता है। लोकविद्या दृष्टिकोण सूचना युग का जनता का दृष्टिकोण है।

लोकविद्या का दावा

दुनिया भर में किसान और आदिवासी एक नया दावा पेश कर रहे हैं। अपनी-अपनी भाषा में और अपने-अपने तरीकों से वे यह कह रहे हैं कि अपने ज्ञान, मूल्यों और विश्वासों के साथ जीना और वह सब ज्ञान प्राप्त करना जो वे चाहते हैं, ये उनके जन्म सिद्ध अधिकार हैं। इन्हें उनसे छीना नहीं जा सकता। एशिया, अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिका में नये किस्म की हलचल दिखाई दे रही है, जिसमें पूरी दुनिया के शोषित, उत्पीड़ित एवं विस्थापित लोगों की एक नई एकता के संकेत हैं। इस बार इस एकता का आधार लोकविद्या में होना है यानि उनके इर्द-गिर्द के समाजों और प्रकृति की उनकी समझ में जो समान है, उसमें होना है। इसका यह अर्थ है कि किसानों और आदिवासियों, कारीगरों और महिलाओं तथा छोटा-छोटा धंधा करने वालों और मज़दूरों को लोकविद्या का दावा पेश करना चाहिए। यह कोई जीविकोपार्जन की ज़रूरत भर का दावा नही है, यह एक नई दुनिया बनाने का दावा है। उन्हें यह दावा पेश करना है कि पठूजी और ज्ञान के व्यवसायीकरण को केवल लोकविद्या ही बुनियादी चुनौती दे सकती है।  उन्हें यह दावा भी पेश करना है कि सत्य व सामाजिक और आर्थिक बराबरी के समाज का ज्ञान का आधार केवल लोकविद्या में है। हमें यह समझना होगा कि जब तक ये दावे पेश नहीं किये जाते, तब तक हम बुनियादी सामाजिक परिवर्तन के अपने असरहीन पूर्वाग्रहों में फठसे रहेंगे। ऐसा लोकविद्या-ज्ञान का दावा हमारे विचारों और कार्यों में एक नई और वास्तविक उड़ान भर दे सकता है, जो आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में नई सोच को जन्म दे। ऐसे दावों को आकार देने की प्रक्रिया ही लोकविद्या जन आंदोलन है।

लोकविद्या जन आन्दोलन (लो.ज.आ.)

वैश्विक आर्थिक और पर्यावरणीय संकट ने उन विचारों और संस्थाओं को बेनकाब कर दिया है, जिन्होंने बड़े पैमाने पर लोगों को भूखा मारकर और प्रकृति का विनाश करके चंद लोगों की जेबें भरी हैं। लोकविद्या जन आन्दोलन इसी बहुमत जनता का ज्ञान आन्दोलन है, यानि उन लोगों का ज्ञान आंदोलन है, जिन्हें पूठजी के प्रतिष्ठानों, विश्वविद्यालयों और राज्य की व्यवस्थाओं ने अज्ञानी घोषित कर रखा है। ज्यादातर लोग यह मानते हैं कि विश्वविद्यालयों के बाहर ज्ञान का सागर है। समाज में ज्ञान का विस्तृत फैलाव है, ऐसा मानने वालों की कोई कमी नही है। यानि लोगों के पास ज्ञान है और उस ज्ञान की अनुभूति भी। और फिर भी न उन लोगों को और न उनके ज्ञान को ही समाज में सम्मान है। उनके ज्ञान के बल पर अच्छी आय नही हो सकती, इसलिए लोग गरीब हैं। सार्वजनिक दुनिया में उनके ज्ञान को सम्मान नही है, इसलिए उनके मूल्य और संस्कृति हाशिये पर पड़े रहते हैं। उनके ज्ञान का जन संगठनों के साथ कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, इसलिए उनका कोई राजनैतिक महत्व नहीं है। एक ऐसे राजनैतिक आंदोलन की ज़रूरत है, जिसमें लोग अपने ज्ञान के आधार पर गति पैदा करते हैं। लोकविद्या जन आंदोलन एक ऐसा ही आंदोलन है। लोकविद्या जन आन्दोलन किसानों, कारीगरों, आदिवासियों, छोटा-छोटा

धंधा करने वालों, महिलाओं और नौजवानों के आंदोलनों को एक ज्ञान के मंच पर इकट्ठा करने का प्रयास है। यह उनके ज्ञान का मंच है, लोकविद्या का मंच है। ऐसे ही मंच से यह दावा किया जा सकता है कि लोकविद्या में ही समाधान है।

दुनिया में हो रहे और ज्ञान आन्दोलन

दुनिया में कई जगह नये किस्म के आन्दोलन शुरू हुए हैं, ऐसे आन्दोलन जिनमें एक सर्वथा नई राजनैतिक सोच दिखाई देती है और जिन्हें लोकविद्या जन आन्दोलन कहा जा सकता है। भारत में ‘लोकविद्या’ का अभियान, बोलिविया से शुरू हुआ ‘धरती माठं के अधिकार’ का आन्दोलन, इक्वाडोर में ‘प्रकृति के अधिकार’ का विचार, वाया कम्पेसिना नाम के अंतर्राष्ट्रीय किसान संगठन का ‘खाद्य सम्प्रभुता’ का विचार व अभियान तथा यूरोप व अमेरिका में छात्र आन्दोलन में आकार ले रहे ‘ज्ञान के पूठजीवाद’ और ‘ज्ञान मुक्ति’ के विचार एक नई राजनीतिक बहस को जन्म दे रहे हैं। इन सभी में यह आग्रह है कि लोगां के पास ज्ञान होता है और लोकविद्या साइंस के नाम पर प्रसारित ज्ञान से किसी भी अर्थ में कम नहीं है। समझ यह है कि पिछली सदियों में जनता पर और प्रकृति पर जो कहर ढाया गया है और जो इस सूचना युग के नये साम्राज्य में कई गुना बढ़ गया है, उसे वही लोग ठीक कर सकते हैं, जो आधुनिक ज्ञान की व्यवस्थाओं में समा नही गये हैं। लोकविद्या जन आंदोलन यह दावा पेश करता है कि दुनिया भर में हो रहे ऐसे ज्ञान आंदोलन, संघर्षों का एक नया बिरादराना बना रहे हैं, लोगों का एक विश्वव्यापी ज्ञान आन्दोलन खड़ा कर रहे हैं।

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लोकविद्या जन आन्दोलन ब्लॉग

 

लोकविद्या जन आंदोलन


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Bhaichara Vidyalaya


Campaign for equal respect to all streams of knowledge with activities like evening schools for rural children, Yuva Gyan Shivirs (Knowledge Camps for Youth), Vidyarthi Vikas Karyakram (Program for Poor Students) and training in knowledge journalism.

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भाईचारा विद्यालय


समाज में सत्ता के अनेक केन्द्र होना यह समाज के स्वस्थ और न्यायपूर्ण होने के लिए आवश्यक माना जाता रहा है. ये न केवल रचनात्मक गतियों को तेज़ करते हैं बल्कि  ज्ञान और समाज सगंठन के हर पक्ष को व्यापक, समृद्ध और न्यायपूर्णबनाते हैं. ज्ञान के क्षेत्र पर किसी एक ही ज्ञानधारा की इजारेदारी , जैसी आज साइंस की है, समाज में गैर-बराबरी पैदा करती है और विविधता व सहजीवन क बुनयाद को ध्वस्त करती है. लोकविद्या भाईचारा विद्यालय सभी ज्ञान धाराओं के बीच भाईचारे के रिश्ते को बनाने और दृढ करने का पक्षधर है और इसी विचार से विद्या आश्रम की ओर से  लोकविद्या भाईचारा विद्यालय चलाये जाते रहे हैं.

लोकविद्या भाईचारा विद्यालय की मान्यता है क जो लोग सकूल-कालेज नहीं जाते वे भी ज्ञानी होते हैं और समाज व देश की समृद्धि में इनके ज्ञान का बहुत बड़ा योगदान है. ये अपना ज्ञान अपने बूते पर हासिल करते हैं. उनका यह ज्ञान यानि लोकविद्या, किसी भी अर्थ में विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम दर्जे का नहीं होता. लोकविद्या को जब विश्वविद्यालय की विद्या के बराबर दर्जा मिलेगा तो समाज में न्याय और बराबरी का राज स्थापित हो सकेगा. ऐसे ही समाज में किसान, कारीगर, आदवासी, छोटी-छोटी पूँजी के बल पर सेवा और मरम्मत का काम करने वाले परवार इज्जत के साथ समृद्ध जीवन जी सकते हैं. 

भाईचारा विद्यालय लोकविद्या की प्रतिष्ठा का अभियान है।

मूल्य

    • विद्या वही जो लोकहित साधे।
    • शिक्षा वही जो गैर-बराबरी दूर करे।
    • श्रम वही जो इज्जत की रोटी दे।

समझ

    • दुनिया में ज्ञान का सबसे बड़ा भण्ड़ार लोकविद्या में है।
    • विश्वविद्यालय के बाहर लोगों के पास जो ज्ञान है वह लोकविद्या है।
    • किसान, कारीगर, आदिवासी, महिलायें, छोटा दुकानदार लोकविद्याधर हैं।
    • समाज में गैर-बराबरी का एक आधार लोकविद्या को ज्ञान का दर्जा न होने में है।
    • समाज में सभी ज्ञान-धाराओं को बराबर की प्रतिष्ठा हो। यह अभियान हमारा है।।
    • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सभी क्षेत्रों में लोकविद्या को विश्वविद्यालय की विद्या के बराबर का दर्जा हो। सभी विद्याओं के बीच भाइचारा हो।
    • सूचना युग में एक ज्ञान-समाज बन रहा है।
    • इस युग में लोकविद्या (ज्ञान) का शोषण चरम पर है।
    • पूँजीपतियों के संस्थान लोकविद्या पर कब्जा कर रहे हैं।
    • इस शोषण और कब्जे से लोकविद्या (ज्ञान) को मुक्त कराना है। यह अभियान हमारा है।

भाईचारा विद्यालय अभियान के कार्य

    • बौद्धिक सत्याग्रह की नींव डालना।
    • गरीब बच्चों में प्राथ्मिक शिक्षा के मार्फ़त आत्मविश्वास पैदा करना। 10 गाँवों में शाम को विद्यालय चल रहे हैं।
    • आम आदमी, किसान, कारीगर, आदिवासी, छोटे दुकानदार और उनके परिवारों यानि लोकविद्याधरों की ज्ञान-शक्ति की पहचान कर उसे सार्वजनिक प्रतिष्ठा देना। लोकविद्याधरों के साथ ज्ञान वार्ताओं और विविध सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक आयोजनों के द्वारा इसे किया जाता है।
    • अभियान के कार्यकर्ताओं में विविध प्रकार के ज्ञान के मूल्यांकन कर पाने की क्षमता का विकास करना। इसके लिये युवा ज्ञान शिविरों का आयोजन किया जाता है।

ज्ञान के बोल

    • ज्ञान उद्योग नही है।
    • ज्ञान जीविका कमाने का साधन है, मुनाफा कमाने का नहीं।
    • ज्ञान समाजहित की धरोहर है, शोषण का साधन नहीं।
    • ज्ञान की सभी धाराएँ बराबर के सम्मान की हकदार हैं।
    • ज्ञान मनुष्य और समाज की शक्ति और मुक्ति का स्रोत है।

विद्या आश्रम का मानना ​​है कि समाज की ताकत (लोकशक्ति) की नींव लोकविद्या की लूट और शोषण के खिलाफ किये गये रचनात्मक कार्य और संघर्ष में निहित है। विद्या आश्रम एक ऐसा स्थान है जहां सामाजिक विचारक, लोकविद्याधर, सामाजिक कार्यकर्ता, वैज्ञानिक और दार्शनिक, जिनकी संवेदनाएं समाज के गरीबों और पीड़ितों के साथ जुड़ी हुई हैं, एक साथ आते हैं।

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भाईचारा विद्यालय


समाज निरोगी आणि न्याय्य राहण्यासाठी समाजात अनेक शक्ती केंद्रे असणे आवश्यक मानले जाते. हे केवळ सर्जनशील हालचालींना गती देत ​​नाहीत तर ज्ञान आणि सामाजिक संस्थेच्या प्रत्येक पैलूला अधिक व्यापक, समृद्ध आणि न्याय्य बनवतात. आजच्या विज्ञानाप्रमाणे ज्ञानाच्या क्षेत्रात एकाच प्रवाहाची मक्तेदारी समाजात विषमता निर्माण करून विविधतेचा आणि सहजीवनाचा पाया नष्ट करते. लोकविद्या भाईचारा विद्यालय हे ज्ञानाच्या सर्व प्रवाहांमध्ये बंधुभावाचे नाते निर्माण करून दृढ करण्याच्या बाजूने असून याच विचारातून विद्या आश्रमाने लोकविद्या भाईचारा विद्यालय चालवले आहे.

शाळा-महाविद्यालयात न जाणारेही ज्ञानी असून त्यांच्या ज्ञानाचा समाज व देशाच्या उत्कर्षात मोठा हातभार लागतो, असा विश्वास लोकविद्या भाईचारा विद्यालयाने व्यक्त केला. त्यांचे ज्ञान ते स्वतःच आत्मसात करतात. त्यांचे ज्ञान, म्हणजे लोकज्ञान, विद्यापीठाच्या ज्ञानापेक्षा कोणत्याही प्रकारे कनिष्ठ नाही. जेव्हा लोकशिक्षणाला विद्यापीठीय शिक्षणाबरोबर समान दर्जा मिळेल, तेव्हा समाजात न्याय आणि समतेचे राज्य प्रस्थापित होईल. अशा समाजात अल्प भांडवलात शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, सेवा व दुरुस्तीची कामे करणारी कुटुंबे सन्मानाने समृद्ध जीवन जगू शकतात.

भाईचारा विद्यालय लोकविद्येला प्रतिष्ठा मिळवून द्यायसाठीची मोहीम होय

नीतीमूल्ये

    • लोकहित साधेल तेच ज्ञान
    • विषमता दूर करेल तेच शिक्षण
    • मानाची भाकरी देतील तेच श्रम

मूळ मांडणी

    • लोकविद्या हे जगातले ज्ञानाचे सर्वात मोठे भांडार आहे.
    • विद्यापीठांच्या बाहेर लोकांकडे जे ज्ञान आहे ते म्हणजे लोकविद्या.
    • शेतकरी, आदिवासी, कारागीर, लहान व्यावसायिक आणि महिला लोकविद्यावंत आहेत.
    • लोकविद्येला ज्ञानाचा दर्जा नसणे यातच असमानतेचा स्रोत आहे.
    • समाजात सर्वच ज्ञान-प्रवाहांना समान प्रतिष्ठा असावी.
    • आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक सर्वच क्षेत्रांत लोकविद्या आणि विद्यापीठांतील ज्ञानाला समान दर्जा असावा.
    • माहिती युगात एक ज्ञान-समाज घडत आहे.
    • नेमके याच या युगात लोकविद्येच्या शोषणाने चरम सीमा गाठली आहे.
    • भांडवलदारांच्या संस्था लोकविद्येवर प्रभुत्व गाजवत आहेत.
    • या जोखडातून, या शोषणातून लोकविद्येची मुक्ती हीच आमची मोहीम आहे.

लोकविद्या भाईर्चचारा विद्यालय मोहिमेचेची उद्दिष्टे

    • बौध्दिक सत्याग्रहाचा पाया घालणे.
    • गरीब मुलांत प्राथमिक षिक्षणा मार्फत आत्मविश्वास रूजवणे.
    • सामान्यजन, शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, लहान व्यावसायिक आणि त्यांच्या कुटुंबांच्या ज्ञानाचे बळ ओळखून त्या ज्ञानाला सार्वजनिक प्रतिष्ठा देण्यासाठी कार्य करणे, याकरिता लोकविद्यावंतांसोबत ज्ञान-संवाद आणि विविध सांस्कृतिक व षैक्षणिक उपक्रम हाती घेणे.
    • या मोहिमेतील कार्यकर्त्यांत वेगवेगळया प्रकारच्या ज्ञानाचे मूल्यांकन करण्याच्या क्षमतांचा विकास व्हावा या उद्देषाने युवा ज्ञान-शिबिरांचे आयोजन करणे.

ज्ञानाची वचने

    • ज्ञान म्हणजे उद्योग नव्हे.
    • ज्ञान उपजीविकेचे साधन आहे, नफेखोरीचे नव्हे.
    • ज्ञान समाजहिताचे वाहन आहे, शोषणाचे साधन नव्हे.
    • ज्ञानाचे सर्व प्रवाह समान प्रतिष्ठा व सन्मानाचे अधिकारी आहेत.
    • ज्ञान मानव आणि समाज यांच्या मुक्तीचा स्त्रोत आहे.

समाजाच्या ताकदीचा (लोकशक्तीचा) पाया लोकविद्येची लूट व शोषणाला विरोध करणाऱ्या रचनात्मक कार्यात आणि संघर्षांत आहे, अशी विद्या आश्रमची मान्यता आहे. विद्या आश्रम हे असे स्थान आहे की जेथे समाजातील गरीब व शोषितांशी ज्यांच्या जाणिवा जुळलेल्या आहेत असे समाजातील विचारक, लोकविद्याधर, सामाजिक कार्यकर्ते, वैज्ञानिक आणि तत्वज्ञ एकत्र येतात.

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Knowledge Satyagraha


Vidya Ashram calls on all college and university educated people to deliberate on the following actions:

  • Opposition to the building of elite institutions of higher education.
  • Recognition of knowledge in society, knowledge with peasants and artisans, and reflection of this in our writings and public stands.
  • Support for proper economic returns on lokavidya; at a minimum buying lokavidya products, and campaigning for it.
  • Opposition of policies that restrict peasants and artisans from using their knowledge for economic activity. Opposition to the expropriation of lokavidya by the corporations.
  • Campaign for public spending on research in the fields and work-sites by peasants and artisans.
  • Work for the dignity of lokavidya by building overlaps between formal education at all levels and lokavidya.

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बौद्धिक सत्याग्रह


ज्ञान मनुष्य का स्वाभाविक गुण है। ज्ञान से ही मानवीय गुणों की प्रतिष्ठा होती है और ज्ञान से ही समाज चलता है। लेकिन यदि ज्ञान पर निहित स्वार्थों का कब्जा़ हो जाय और यदि ज्ञान प्रबन्धकों के हाथ की कठपुतली बन जाय तो उसके शोषण के रास्ते खुलते हैं, सामाजिक मूल्यों में गिरावट आती है, बृहत् समाज में विपन्नता आती है और समाज दो हिस्सों में बँट जाता है। एक ओर ज्ञान पर कब्जे़ की पूँजी की दुनिया होती है तो दूसरी ओर लगभग सब लोग। ज्ञान की मुक्ति ही मनुष्य की मुक्ति का रास्ता है। 21वीं सदी को यह ऐतिहासिक चुनौती उठानी है। इसकी शुरूआत बौद्धिक सत्याग्रह से की जानी चाहिये। बौद्धिक सत्याग्रह ज्ञान के सम्बन्ध में एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाने और उसे व्यवहार में लाने का तरीका है। नीचे दिये गये बिन्दु व्यक्तिगत स्तर पर और सामाजिक स्तर पर इसे समझने और इसे अभ्यास में लाने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं।

  1. ज्ञान के क्षेत्र में श्रेणीबद्धता यानि ऊँच-नीच को अस्वीकार करना।
  2. ज्ञान के किसी एक प्रकार को सबसे बढि़या न मानना।
  3. ज्ञान के किसी एक स्थान को सबसे अधिक महत्व न देना।
  4. ज्ञान के निर्माण के किसी एक तरीके को सबसे सही न मानना।
  5. ज्ञान के निजीकरण का विरोध करना।
  6. ज्ञान के संगठन के विविध तरीके अपनाना।
  7. कम्प्यूटर सूचनाओं के भण्ड़ारण और प्रक्रियाओं की मशीन है इसे मनुष्य की ही एक कृति से अधिक दर्जा न देना।
  8. ज्ञान के प्रबन्धन में कम्प्यूटर को एक मशीन से अधिक दर्जा न देना।
  9. इंटरनेट सम्पर्क और संचार का माध्यम है कोई अलग किस्म का समाज बनाने का माध्यम नहीं। मायावी (virtual) दुनिया की सीमाओं को पहचानना और उजागर करना।
  10. लोकविद्या को विद्या का सम्मान देना।
  11. लोकविद्या की सामाजिक प ्रतिष्ठा के लिये कार्य करना।
  12. लोकविद्या-धारक समाजों के प्रति सम्मान की दृष्टि रखना।
  13. शिक्षा में लोकविद्या के समावेश के तरीके विकसित करना।
  14. कला को केवल मनोरंजन का साधन बनाने का विरोध करना।
  15. ज्ञान के शोषण की व्यवस्थाओं को उजागर करना और इस शोषण के विरोध के संघर्षों में शामिल होना।
  16. व्यापार और बाजार के मार्फत किसानों और कारीगरों की विद्या के शोषण का विरोध करना।
  17. लोकविद्या-धारक समाज अपनी विद्या का इस्तेमाल बिना रोकटोक कर सके इसकी हिमायत करना।

उपरोक्त मान्यताओं के अनुरूप अपना जीवन ढालना ही आज बौद्धिक सत्याग्रह का रूप है।


ज्ञान मुक्ति मंच


21 वीं सदी के शुरूआत के साथ औद्योगिक युग समाप्त हो चुका है और सूचना युग शुरू हुआ है। कहा जा रहा है कि एक ज्ञान आधारित समाज बन रहा है । हम देख रहे है कि इस युग में सूचना उद्योग (टी. वी., मोबाइल, कम्प्यूटर-इन्टरनेट, आदि) सबसे तेजी से फल-फूल रहे हैं । छोटे-छोटे उद्योग-धन्धे और खेती उजड़ रहे हैं और इनसे जुड़े लोग आत्महत्या कर रहे हैं । जो युवक कम्प्यूटर-इन्टरनेट पर बहुत कुशलता के साथ अंग्रेजी में काम कर सकते हैं केवल उन्हें ही मोटे वेतन मिल रहे हैं और शेष नौजवानों के लिए सम्मान-जनक रोजगार के रास्ते बन्द होते जा रहे हैं ।

  • ज्ञान आधारित सूचना युग में शिक्षा महंगी है। यानि सामान्य लोगों से ज्ञान प्राप्त करने का अधिकार छीना जा रहा है ।
  • ज्ञान आधारित सूचना युग में ज्ञान की ज्यादातर गतिविधियाँ कम्प्यूटर-इन्टरनेट पर होने जा रही हैं और वे अधिकतर अंग्रेज़ी में होती हैं। यानि कम्प्यूटर का ज्ञान आम जनता की पहुँच से बाहर है।
  • ज्ञान आधारित सूचना युग में लोकविद्या (किसानी ,कारीगरी, वान्यिकी, स्वास्थ्य रक्षा, पालन-पोषण आदि लोक आधारित ज्ञान) को कम मूल्य दिया जा रहा है । यानि आम लोगों के पास जो ज्ञान है उसका शोषण हो रहा है।
  • ज्ञान आधारित सूचना युग में लोकविद्या पर कब्जा किया जा रहा है। पेटेन्ट बनाकर और कम्प्यूटर में संग्रहित कर लोकविद्या पर पूँजीपतियों का कब्जा स्थापित हो रहा है ।
  • ज्ञान आधारित सूचना युग में शिक्षा, बाजार, प्रशासन और सेवा (डाक, बैंक, पुस्तकालय, खबरें, शोध, सूचना आदि) कम्प्यूटर-इन्टरनेट पर स्थानांतरित हो रहे हैं। यानि सार्वजनिक व्यवस्थायें गरीब समाज से दूर हो रही हैं।

कहने को तो यह ज्ञान आधारित सूचना युग है किंतु वास्तव में यह ज्ञान पर कब्जे और उसके शोषण पर आधारित सूचना युग है। इसलिए आम आदमी की जिन्दगी जीने के लायक बने, समाज में न्याय की स्थापना हो और सभी नौजवानों को आगे बढ़ने के मौके मिलें इसकी पहली शर्त है कि ज्ञान को पूँजीपतियों के कब्जे से और शोषण से मुक्त किया जाय। इसी के लिए ज्ञान मुक्ति मंच बनाया गया है।

ज्ञान मुक्ति मंच की प्रमुख माँगें निम्नलिखित हैं –

  • कम्प्यूटर हिन्दी में हो।
  • गांव-गांव में मीडिया स्कूल हो।
  • कृषि उत्पाद का जायज़ दाम हो।
  • घर-घर में उद्योग हो।
  • स्थानीय बाजार को संरक्षण हो ।
  • लोकविद्या को शिक्षा में शामिल किया जाय।
  • उच्च शिक्षा के दरवाजे सबके लिए खुले हों।

ज्ञान मुक्ति मंच जगह-जगह पर नौजवानों के ज्ञान शिविर चलाकर इस विषय पर  नौजवानों को नई समझ से लैस कर रहा है। इन ज्ञान शिविरों में आगे बढ़कर हिस्सा लें।

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बौध्दिक सत्याग्रह


ज्ञान मनुष्य प्राण्याचा स्वभाव आहे. ज्ञानामुळेच मनुष्य गुणांना प्रतिष्ठा लाभते. ज्ञान जेव्हा निहित स्वार्थाच्या आहारी जाते किंवा ज्ञान-व्यवस्थापकांच्या हातातले कळसुत्री बाहुले बनून राहते, तेव्हा ज्ञानाच्या शोणाचे मार्ग मोकळे होतात, सामाजिक नीतीमूल्यांचा ऱ्हास होतो, संपूर्ण समाजात हलाखी माजते आणि समाज दोन भागात वाटला जातो. एकीकडे ज्ञानावर अधिकार गाजवणाऱ्या भांडवलाचे जग असते, तर दुसरीकडे जवळ-जवळ सर्वच लोक. ज्ञान मुक्तीतच मानव मुक्तीचा मार्ग आहे. हेच एकविसाव्या शतकाचे आव्हान आहे. बौध्दिक सत्याग्रह म्हणजे हे आव्हान पेलण्याची सुरवातीची तालीम होय!ज्ञान या संकल्पने विषयी एक व्यापक दृष्टिकोन स्वीकारणे आणि तो व्यवहारात उतरवणे, याचा एक उपाय म्हणजे बौध्दिक सत्याग्रह. वैयक्तिक आणि सामाजिक पातळीवर याचे आकलन व्हायला निम्नलिखित गोष्टी उपयोगी ठराव्यात.

  1. ज्ञानाच्या क्षेत्रात उच्च-नीच, श्रेष्ठ-कनिष्ठ असा भेद नाकारणे.
  2. ज्ञानाचा कुठलाही एक प्रकार किंवा प्रणाली बाकी सर्वांपेक्षा श्रेष्ठ असे न मानणे.
  3. ज्ञानार्जनाच्या कुठल्याही एका स्थळाला अन्य सर्वांपेक्षा जास्त महत्व न देणे.
  4. ज्ञान निर्मितीची कुठलीही एक पध्दत कुठल्याही स्रंदर्भ किंवा परिस्थितीत अन्य सर्वांपेक्षा अधिक योग्यच असते असे न मानणे.
  5. ज्ञानाच्या खाजगीकरणाला विरोध करणे.
  6. ज्ञान संग्रहाचे वेगवेगळे मार्ग स्वीकारणे.
  7. कम्प्यूटर माहिती-संग्रहाचे एक तंत्र असून त्याला ‘मानवाचीच एक कृती‘ याहून वरचा दर्जा न देणे.
  8. ज्ञान-व्यवस्थापनात कम्प्यूटरला कुठल्याही एका यंत्रापेक्षा वर न मानणे.
  9. इंटरनेट एक वेगळयाच प्रकारचा समाज घडवण्याचे नव्हे तर केवळ संपर्क व संचाराचे माध्यम आहे असे मानणे व मायावी जगाच्या सीमा ओळखणे आणि त्या उघड करणे.
  10. लोकविद्येला ज्ञान म्हणून प्रतिष्ठा देणे.
  11. लोकविद्येला सामाजिक प्रतिष्ठा मिळावी यासाठी कार्य करणे.
  12. लोकविद्यावंत समाजांना आदरयुक्त सन्मानाची वागवणूक देणे.
  13. लोकविद्येला शिक्षणात समाविष्ट करण्यासाठी उपाय योजना करणे.
  14. केवळ मनोरंजनाचे साधन म्हणून कलेकडे बघण्याच्या वृत्तीला विरोध करणे.
  15. ज्ञानाचे षोशण करणाऱ्या व्यवस्थांचा पडदाफाश करणे आणि या शोशणाला विरोध करणाऱ्या लढ्यांत सामिल होणे.
  16. व्यापार आणि बाजारपेठे च्या माध्यमांतून होणाऱ्या शेतकरी व कारागिरांच्या शोशणाला विरोध करणे.
  17. लोकविद्यावंत समाजाला आपले ज्ञान कोणत्याही आडकाठी शिवाय मुक्त पणे वापरता यावे या संकल्पनेचा पुरस्कार करणे

ज्ञान मुक्ती मंच


एकविसाव्या शतकासोबतच उद्योग-युग संपुश्टात येऊन माहिती युगाची सुरवात झाली. असे म्हणतात की एक ज्ञान-प्रधान समाज अस्तित्वात येत आहे. टी.व्ही, कम्प्यूटर, मोबाईल, इंटरनेट यांसारख्या माहिती उद्योगांची भरभराट होत आहे. लहान उद्योग आणि शेती मोडकळीला आले आहेत आणि यांवर विसंबून  असलेले लोक आत्महत्येचा मार्ग स्वीकारत आहेत. जे तरूण इंग्रजी भाषेत कम्प्यूटर वर कुशलतेने काम करू शकतात तेच लठ्ठ पगारांचे धनी होऊ शकतात. इतरांसाठी मात्र सन्मानाचे रोजगार मिळायचे मार्गच बंद होत चालले आहेत. या ज्ञान-प्रधान माहिती युगात

  • शिक्षण महागडे झाले आहे. म्हणजेच सर्वसामान्य लोक शिक्षणाच्या अधिकाराला मुकत चालले आहेत.
  • ज्ञानाच्या महत्वाच्या बहुतांश क्रिया कम्प्यूटर-इंटरनेट वर इंग्रजी भाषेत होतात. यासाठी लागणारे कम्प्यूटरचे ज्ञान सामान्यांच्या अवाक्याबाहेर गेले आहे.
  • लोकविद्येला (शेती, कारागिरी, वनोद्योग, आरोग्य-रक्षण, पालन-पोशण सारखे सर्वसामान्य लोकांत वसलेले ज्ञान) किंमत नाही. म्हणजेच, सामान्यांच्या ज्ञानाचे शोशण होत आहे.
  • लोकविद्येत समाविष्ट सर्वांना उपलब्ध ज्ञानाची पेटंटे काढून कम्प्यूटर वर तिचा संग्रह सुरू आहे. म्हणजेच लोकविद्येवर भांडवली प्रभुत्व लादले जात आहे.
  • शिक्षण, बाजारपेठ, प्रशासन आणि सेवा (पोस्ट, बॅंक, पुस्तकालये, बातम्या, संशोधन, माहिती इ.) यांचे कम्प्यूटर वर स्थानांतरण होत आहे. म्हणजेच सार्वजनिक व्यवस्था गरिबांपासून दूर होत आहेत.

म्हणायला तर हे ज्ञान आधारित माहिती युग आहे. पण वास्तवात मात्र हे ज्ञानावर कब्ज्याचे आणि ज्ञानाच्या शोषणाचेच युग आहे. किंबहुना, सर्वसामान्य लोकांचे जगणे जगणे व्हावे, समाजात न्याय असावा व सर्व युवकांना प्रगतीचा वाव मिळावा याकरिता ज्ञानावरची भांडवलशहांची पकड सुटावी आणि ज्ञानाची शोषणापासून मुक्ती व्हावी हे गरजेचे आहे. ज्ञान-मुक्ती मंचाची निर्मिती या उद्देषाने केली आहे. मंचाच्या प्रमुख मागण्या अशा आहेत:

  • कम्प्यूटर चे कार्य विविध प्रादेशिक भाषांत व्हावे.
  • प्रत्येक गावात मीडिया-शाळा असावी.
  • शेतमालाला उचित भाव मिळावा.
  • घरोघरी उद्योग व्हावेत.
  • स्थानिक बाजारपेठ संरक्षित असावी.
  • शिक्षणात लोकविद्येचा समावेश असावा.
  • उच्च शिक्षणाची कवाडे सर्वांसाठी खुली असावीत.

युवा-शिबिरे भरवून नवीन विचार रूजवण्याचे कार्य ज्ञान-मुक्ति मंच करत आहे. या शिबिरांत भाग घेण्यासाठी पुढे या!

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Lokavidya Ashram

 

  1. Lokavidya Ashrams give equal respect to all streams of knowledge and refuse to accept any hierarchy in the world of knowledge.
  2. They claim equal place for lokavidya in the world of knowledge.
  3. These are the places from where farmers, adivasis, artisans, women and those engaged in marginal enterprises, namely the people from the lokavidyadhar samaj, derive epistemic energies.
  4. In these places are held Gyan Panchayats on problems of the society.
  5. Lokavidya Satsangs are organized in these Ashrams.
  6. These ashrams shape programs for developing competencies in the areas of language, connectivity, communication and art for the children and youth of the lokavidyadhar samaj.

Lokavidya Tana-Bana

 

  1. Today knowledge management and social media are creating new paradigms for development and politics and fresh opportunities are arising for conceptualizing new social formations.
  2. Lokavidyadhar samaj too has an opportunity to build afresh its connectivity-communication frameworks to serve its own ends, namely, to build a movement towards a genuine knowledge based society, a society in which lokavidya rules the world of knowledge. Lokavidya Tana-bana may be seen as an enterprise shaping such initiatives.
  3. Just as lokavidya lives in society and does not reside in any institutions or instruments, similarly lokavidya tana-bana ought to be an inseparable part of society.
  4. It is constituted by people who take initiative from a lokavidya perspective to develop communication and connectivity within the lokavidyadhar samaj.
  5. It establishes connection between the activities and expressions of the lokavidyadhar samaj and develops new relations among them to facilitate and enhance the processes of recovery of their lost world and reconstruction of a new one.

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Swaraj Gyan Panchayat

Towards a New Political Dialogue

Great changes have taken place in the workings of the world order since around 1990. The conditions for this change were created by global events such as the break-up of the Soviet Union, the expanding influence of globalization, and the exponential growth of information and communication technologies. Right since the use of entirely new strategies and techniques in the Second Gulf War, capitalism and imperialism have managed to achieve ever growing loot and exploitation of large populations of the world. New ways of thought have evolved to provide theoretical basis to justify the systems of exploitation. The ICTs, new systems of governance and control, and the global market are in sync to sustain and strengthen the system.These exploitative processes have found appreciation and active support from the established political systems of the day – be they democratic, socialist, or communalistic. No ideology of liberation of humanity, that has come out of Europe till date, is up to the challenge. Neither theoretically, nor practically. Implications of this situation are clear: It would be a mistake to attempt to try to locate the difficulties of failure merely in organization of the liberation struggles inspired by them. The responsibility this places on the shoulders of those engaged in struggles for liberation of humanity is much larger. The situation calls for construction of an entirely new political dialogue and imagination.

The Ukrain-Russia war has not merely altered the equilibrium of the world order. The received notion of the state is itself under strain. Important countries like Russia, China, Turkey, Israel and India seem to be leading the challenge to it. These countries talk of richness of their civilizations and cultures and stake their claim to redefine the world-order and the global balance of power. The leaders of these countries, perceived as dictators by their own peoples, are also seen questioning the hegemony of the western imperialist powers – the UK, the USA and Europe, the very birthground of the established notion of state. This is a fledgling, and yet a growing trend. The situation is complex enough to confound activists of progressive and secular struggles for social change.

There exists a deep and a far-reaching agreement and understanding between the actors of the old state and the proponents of the new fledgling state. There is complete concurrence between the two on the absolute necessity of continued loot and, exploitation of the samaj for realization of their respective visions.

In our country the farmers movement has created a new space of challenge to both. A space for nurturing alternative vision for reconstruction of a just and equal society. That space belongs to the bahujan samaj and provides to it an historical opportunity. An opportunity for re-building the samaj on the strength of its knowledge (lokavidya) and concrete social values of justice (nyaaya), sacrifice (tyaaga) and brotherhood (bhaaichaaraa). The path begins with a new political dialogue.

The twenty-first century awaits such a dialogue – a dialogue not burdened by the dead-weight of western traditions of social-political thought, nor by the organized knowledge systems within the country. In fact, such a dialogue always existed around the idea of ‘swaraj’. Ironically, however, it is post-independence political processes that have gradually killed it.

The twenty-first century was inaugurated with a de-stabilization within the world of western knowledge systems. It happened with emergence of the computer, and information and communication technologies. This was the time when there grew a broad awareness of existence of knowledge in possession of the bahujan samaj and the role it played in sustaining the samaj. After all, it is this knowledge, which imperialism sought to harness through the use of the new techniques of knowledge management and information flow in order to increase profits and enhance capital accumulation.

Movements of the bahujan samaj that mark this period have made it possible for us all to bring to the fore the idea of swaraj once again. Dialogue around the idea will need to understand the world-view of the bahujan samaj afresh and place it at the centre of the dialogue.

Swaraj Chetana (Swaraj Consciousness)

The bahujan samaj is the vast sea of social formations of farmers, artisans, adivasis, women, workers, and small vendors and shop owners – of men and women, exploited and outcast by the system, and largely strangers to the college and university sytem. Clearly, the supreme need is to understand their consciousness, that gives life to ripples and waves in that sea. It is on the strength of this consciousness that movements for change rest, and that paths of liberation are forged. It is not classes, which make up the bahujan samaj. People of the bahujan samaj identify and speak of themeselves, and live as members of so many smaller (laghu) samaj’s.

The swarajist tradition is a gift of the bahujan samaj. Their consciousness lives on, unsplintered and undivided, even today. One perceives it every day, here and there, in ordinary life. It is this integral consciousness that directs and regulates economic, technical, social, political, cultural, philosophical as well as productive and knowledge activities of men and women of the bahujan samaj. In order to understand this undivided consciousness, it may help to note its different facets, like the moral, the social, the political and the knowledge facets. An ordinary example might clarify this. That to thieve is wrong is the moral facet, that thefts damage the weave of the samaj is the social facet, that thieving is a punishable offense is the political facet, and that thieving is a sign of avidya is the knowledge facet of the consciousness controlling the act of thieving within the samaj. Can one better understand the consciousness of the bahujan samaj by looking at the weight and role of these, and possibly more facets in various activities of day-to-day life of bahujan samaj?
The political ideologies – such as, liberal democracy, democratic socialism, scientific socialism – of modern Europe were born and took root in the context of the development of a political society, the society mentored and shaped by the bourgeoisie and the proletariat. Our society is a samaj made of many laghu-samaj’s, smaller social formations, with further progression right down to the individual. The individual and the larger samaj are two extreme ends of human existence. It is imperative to understand that human consciosness is one, where individual consciosness and social consciosness are inter-dependent, mutually regulatory and with no hierarchy between them. This an activist on the ground already knows intuitively. However, it is unfathomable for those who cannot set aside European categories of thought.

It is to denote the integral consciousness of the bahujan samaj referred to above that we would like to use the term ‘swaraj chetana’. We witness it in movements of the bahujan samaj.

1. Farmers movement

The question of incomes of farmer households has been the focus of the farmers movement. The chief demands have lingered around just, remunerative, or scientific prices for farm produce. The modern industrial system and lifestyles simply do not allow any long-term satisfaction of this demand. The farmers see the the demand as a path to an honorable status in society. Farmers movement draws attention toward need for re-installation of social values of justice, sacrifice and brotherhood. Its insistance on non-political methods provides a space for a constructing a dialogic between movements around restoring power back to the samaj.

2. Movement for social justice

The primary concern of social justice is with equality of the the bahujan samaj with the modern classes. That is equality of those sacrificed on the altar of construction of the modern industrial society with those who were literally born and brought up with the rise of that society. The demand of the bahujan samaj for this equality, and of the policies adopted by the state in response are under increasing fire. That the present leadership of social justice movements has failed to question the knowledge basis of the modern society merely adds fuel to this fire. Social justice stands a chance only if knowledge with bahujan samaj has the same social status as science, the basis of modern society. The leadership fails to understand this, entrapped as it is in safeguarding interests of the miniscule portion of the bahujan samaj, which has been drawn into the modern system. The demand for success of social justice movements is for a new leadership, which engages in a dialogue that honors the knowledge and values in bahujan samaj and imagins a future built upon that knowledge and those values.

3. Jal-Jangal-Jameen movement

The demand for local control on jal-jangal-jameen (water-forest-land) by sections of the bahujan samaj amounts to a declaration of the capacity of these samaj’s for conserving and managing these natural resources by their own wisdom, values and knowledge. They always did precisely that. Till the British, and then the post-independence Indian governments wrested that control from them in service of modern industrial society. These samaj’s never found a place in the democratic system, which restored that control to them. A swaraj dialogue may throw open major possibilities for them.

4. Environment justice movement

It is widely appreciated that factors that have led to destruction of environment are also the ones that have caused climate change. This would make life itself to become unsustainable. These factors reside in the very nature of the economy and the lifestyles that industrial revolution brought into existence. Only a challenge to the knowledge basis of industrial revolution, to science itself can bring this economy and these lifestyles into question and render efforts at change meaningful. Swaraj chetana as the bearer of an integral tradition of thought can give a concrete shape to such a challenge. The demand is of a dialogue based on according a just place to the traditional wisdom and knowledge of nature.

5. Swaraj Abhiyan

The idea of swaraj and the thought of svadeshi are fundamental to our culture and traditions. Although both appeared in independence struggle before Mahatma Gandhi, under his leadership they were freed from being treated merely as economic, or political notions. Gandhi ji reconstructed them in various aspects of philosophical traditions of this entire land. Since independence, swaraj and swadeshi have been reduced to adorning names of certain organizations and trusts. However, the SGP conceives of swaraj debate as that new political dialogue, which enlightens pathways to reconstruction of autonomous samaj and contemporary forms of self-governance. Activist of swaraj andolan must understand this and not be swayed by quick fixes, which will ultimately only produce harm.

6. Lokavidya Jan Andolan

Lokavidya Jan Andolan is a knowledge movement. It seeks a just and equal position for Lokavidya in the world of knowledge. It demands an imagination of that social arrangement in which lokavidya-based work earns the same income as work based on modern university education. LJA has drawn attention to the sant-parampara and philosophical traditions of the bahujan samaj. It can participate in building a political dialogue which is free from domination of the state, individualism and western philosophical hought in the world of knowledge.

Let all individuals, groups and organizations desiring social change and engaged with various ways of thinking – all of us – start a political dialogue. Let experiences and needs of movements of the bahujan samaj guide this dialogue and provide points of departure. The dialogue may fittingly be called ‘Swaraj Gyan Panchayat’.

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स्वराज ज्ञान पंचायत

एक नये राजनीतिक विमर्श की ओर

1990 के आस-पास से सोवियत यूनियन के टूटने, वैश्वीकरण के विस्तार पाने, सूचना (इंटरनेट) उद्योग के दिन दूना रात चौगुना आगे बढ़ने तथा दूसरे खाड़ी युद्ध के साथ युद्ध क्षेत्र में सर्वथा नए तौर तरीकों के विकसित होने से शुरू होकर आज तक पूँजीवाद और साम्राज्यवाद ने नई-नई वैचारिक स्थापनाओं, नई संपर्क-सूचना प्रौद्योगिकी और नई राज्य व्यवस्थाओं व वैश्विक बाजार के जरिये लूट और शोषण में बड़ी बढ़ोत्तरी की है. प्रचलित लोकतांत्रिक, समाजवादी और सांप्रदायिक व्यवस्थाओं सभी ने इसी प्रक्रिया में ज़ोर भरा है. यूरोप से उपजी परिवर्तन की विचारधाराएं इस प्रक्रिया से मुकाबला करने में सर्वथा नाकामयाब रही हैं, सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों स्तरों पर. इसका मतलब यह है कि शोषण के जाल से मुकाबले की दिक्कतों को केवल सांगठनिक स्तर पर नहीं समझा जा सकता बल्कि यह एक नए विमर्श की मांग कर रहा है.हाल ही में शुरू हुए रूस-यूक्रेन युद्ध ने राष्ट्रीय और अंतरर्राष्ट्रीय राजनीति के आधार और समीकरणों को नया मोड़ दे दिया है, जिसके चलते प्रचलित राज्यसत्ता की अवधारणाओं को बड़े पैमाने पर प्रभावित हुई हैं. कुछ बड़े देशों ने नवनिर्माण के लिए सभ्यता, संस्कृति, इतिहास, भाषागत जैसी पहचान को एक ऐसा आधार बनाने की पेशकश की हैं, जो वैश्विक शक्तियों के नए सिरे से पुनर्संगठन का संकेत दे रही हैं. यह एक नई लेकिन प्रभावी बनती धारा है. इस धारा के चलते रूस, चीन, इजराइल, तुर्की और भारत अपने देश की सभ्यता और संस्कृति के गौरव शिखरों को और इसके फैलाव को एक दावे के रूप में पेश करते नज़र आते हैं. इन देशों के नेता अपने-अपने देशों में तानाशाह की पहचान रखते हैं और वैश्विक मंच पर पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों (मुख्यतः इंग्लैण्ड, अमेरिका, यूरोप आदि) के विरोध की भाषा बोलते नज़र आ रहे हैं. परिवर्तन के कार्यकर्त्ता के लिए यह पेचीदगी भरी स्थिति है. प्रगतिशील और सेकुलर धारा के कार्यकर्ताओं के सामने असमंजस की स्थिति है.

उपरोक्त दोनों ही प्रक्रियाओं में बहुजन समाज की लूट अबाधित होने पर गहरी सहमति है. हमारे देश में फ़िलहाल इन दोनों खेमों के बीच किसान आन्दोलन ने ऐसी जगह पैदा की है, जहाँ किसान आंदोलन के कार्यकर्ता तथा गाँधी से लेकर मार्क्स तक सभी के अनुयायी एक साथ शामिल हैं. यह एक ऐतिहासिक मौका देता है एक तीसरे रास्ते के निर्माण का. एक ऐसे रास्ते के निर्माण का, जिसमें देश का बहुजन समाज (लोकविद्या समाज) अपने ज्ञान और विरासत के ठोस जीवनमूल्यों के आधार पर नवनिर्माण का रास्ता बनाए. इसकी शुरुआत एक नए राजनीतिक विमर्श से होगी.

21वीं सदी एक नये राजनीतिक विमर्श का इंतज़ार कर रही है, एक ऐसे राजनीतिक विमर्श का जो पाश्चात्य वैचारिक परम्पराओं और देशी संगठित ज्ञान के दबावों से मुक्त हो. हमारे देश में ‘स्वराज’ के इर्द-गिर्द एक ऐसा राजनीतिक विमर्श हमेशा से रहा है, लेकिन आज़ादी के बाद वह हाशिये पर चला गया. इस सदी के शुरू होने के थोड़ा पहले से ही आम लोगों के ज्ञान यानि लोकविद्या को नये सिरे से मान्यता मिलना शुरू हुई है. जिसके चलते और इस दौर के जन-आन्दोलनों के चलते उन नई परिस्थितियों का निर्माण हुआ है, जिनमें ‘स्वराज’ की चर्चा मुख्य धारा की बहस में आ सकती है. हमें इसके लिए दुनिया को बहुजन समाज की दृष्टि से समझने की शुरुआत नए सिरे से करनी होगी.

स्वराज चेतना

बड़े पैमाने पर शोषित और बहिष्कृत लोग, यानी किसान, मज़दूर, कारीगर, स्त्रियां, आदिवासी और ठेले गुमटी वाले, कालेज या विश्वविद्यालय नहीं गए होते हैं. हमें इनकी चेतना के स्वरुप को समझना होगा क्योंकि इन्हीं की चेतना की ताकत पर परिवर्तन के आंदोलन बनते हैं और मुक्ति के रास्ते निखारे जाते हैं. ये लोग वर्गों के रूप में नहीं पाए जाते तथापि समाज के रूप में ही वे अपनी पहचान करते हैं और उसी रूप में अस्तित्व भी रखते हैं.
‘स्वराज’ की परंपरा इन्हीं समाजों की देन है. इन समाजों में स्वराज चेतना के अंश आज भी जिंदा है. इनकी इस चेतना के चार अंग हैं : नैतिक, सामाजिक, राजनीतिक और ज्ञान आधारित. जबकि इन्हें अलग-अलग पहचानने से समझने की दृष्टि से कुछ मदद हो सकती है तथापि ये एक किस्म की संयुक्त चेतना के रूप में ही अस्तित्व रखते हैं. इन समाजों के जीवन में आर्थिक, तकनीकी, सामाजिक, राजनीतिक ,सांस्कृतिक, दार्शनिक और उत्पादन व ज्ञान सम्बंधित सारी गतिविधियां इसी संयुक्त चेतना से संचालित होती हैं. अपनी समझ साफ़ करने के लिए एक उदाहरण की मदद ली जाये. चोरी करना गलत है यह नैतिक चेतना है. चोरी करने से सामाजिक ताना-बाना टूटता है यह सामाजिक चेतना है. चोरी करना दंडनीय अपराध है यह राजनीतिक चेतना है. यूरिया से ज़मीन को होने वाले दूरगामी नुक्सान को पहचानना ज्ञान आधारित चेतना है. इस तरह हम चेतना के इन अंगों की थोड़ी बहुत व्याख्या करके आम लोगों के जीवन में इन चेतनाओं के आनुपातिक महत्त्व की पहचान कर सकते हैं.

आधुनिक यूरोप की राजनीतिक विचारधाराएं राजनीतिक समाज ( बुर्जुआ और सर्वहारा की प्रधानता में बने समाज और राज्य) के विकास के संदर्भ में विकसित हुई हैं. लोकतंत्र, लोकतांत्रिक-समाजवाद और वैज्ञानिक-समाजवाद ऐसी ही विचारधाराएं हैं. भारतीय समाज लघु समाजों (सोशल फार्मेशन) से बना है और लघु समाज लघुतर समाजों से. इस प्रक्रिया को जारी रखें तो अंत में व्यक्ति पर पहुँच जायेंगे। समाज और व्यक्ति मानवीय वास्तविकता के एक दूसरे के पूरक दो छोर हैं. यह समझाना महत्वपूर्ण है कि मानवीय चेतना में वैयक्तिक चेतना और सामाजिक चेतना का अन्योन्याश्रित संबंध निहित होता है. ज़मीनी कार्यकर्त्ता चेतना की यह समझ अक्सर रखते हैं. समस्या ज़्यादा पढ़े-लिखे लोगों के साथ है, जो यूरोपीय विचारों का सन्दर्भ लिए बगैर सोच नहीं पाते.

जिस संयुक्त चेतना का ज़िक्र ऊपर किया गया है उसे मोटे तौर पर ‘स्वराज चेतना’ का नाम दिया जा सकता है.
नीचे कुछ जन आन्दोलनों में इस चेतना को पहचाना जा सकता है.

1. किसान आन्दोलन

किसान आन्दोलन किसान परिवारों की आय पर केन्द्रित है. इसकी प्रमुख अभिव्यक्ति कृषि उत्पाद का जायज़, वैज्ञानिक और लाभकारी मूल्य मांगने में हुई है. उद्योग प्रधान आर्थिकी और वर्तमान जीवन शैली में यह संभव नहीं है. किसान आन्दोलन उस समाज की कल्पना का आग्रह रखता है, जिसमें उसे बाकि लोगों की तरह ही मान और सम्मान हो. आन्दोलन की व्यापकता और संघर्ष का जज़्बा न्याय, त्याग और भाईचारा जैसे मूल्यों की पुनर्प्रतिष्ठा की ओर ध्यान ले जाता है. यह आन्दोलन अपने लिए अराजनीतिकता के आग्रह के जरिये ऐसे नये राजनीतिक विमर्श को आकार देने का आधार बना रहा है, जिस विमर्श में राजनीति के साथ सामाजिक सत्ता की पुनर्स्थापना का महत्त्व उजागर हो.

2. सामाजिक न्याय आन्दोलन

सामाजिक न्याय की मांग उन लोगों की बराबरी की मांग है, जो औद्योगिक दुनिया के निर्माण में हाशिये पर डाल दिए गए हैं . ये ही बहुजन समाज हैं . इसकी प्रभावी समाज में शामिल होने की मांग का और उसके लिए अपनाई गई नीतियों का विरोध बड़े पैमाने पर शुरू हो गया है. जिसका मूल कारण यह है कि बहुजन समाज ने ज्ञान की अपनी परम्पराओं के आधार पर औद्योगिक समाज के ज्ञान के आधार साइंस को चुनौती नहीं दी है. अपनी लड़ाई ज्ञान के क्षेत्र में ले जाये बगैर सामाजिक न्याय संभव नहीं है. सामाजिक न्याय आन्दोलन के नेतृत्व में इस समझ की कमी है या यह कह लीजिये कि उन्हें बहुजन समाज का केवल ऊपरी हिस्सा ही दिखाई देता है. यह ऊपरी हिस्सा किसी बड़े परिवर्तन या मांग के समर्थन के लिए तैयार नहीं है. यह आन्दोलन बहुजन समाज के नये नेतृत्व और उस राजनीतिक विमर्श की मांग कर रहा है जिसमें बहुजन समाज की ज्ञान की परम्पराओं को स्थान मिले.

3. जल-जंगल-ज़मीन आन्दोलन

परंपरागत तौर पर जिन समाजों का नियंत्रण जल, जंगल और ज़मीन पर हुआ करता था वह पहले अंग्रेजों ने और फिर आज़ाद हिन्दुस्तान की सरकारों ने उनसे छीन लिया. वे इन प्राकृतिक संसाधनों पर अपना नियंत्रण वापस मांग रहे हैं. उनके ऐसे नियंत्रण का सीधा अर्थ यह है कि जल, जंगल और ज़मीन का प्रबंधन वे अपने ज्ञान, सामाजिक मूल्यों और विवेक के आधार पर करेंगे. इन समाजों के हितों का समावेश किन्हीं भी लोकतंत्र के नाम पर चलने वाली व्यवस्थाओं में नहीं हो सका है. स्वराज का राजनीतिक विमर्श उनके लिए बड़े रास्ते खोल सकता है.

4. पर्यावरण/जलवायु आन्दोलन

पर्यावरण और स्थितिकीय के विनाश के जो कारक हैं वे ही जलवायु परिवर्तन और उसके चलते जीवन ही समाप्त हो जाये, इसके भी कारक हैं. ये कारक प्रमुख रूप से औद्योगिक क्रांति के चलते बनी आर्थिकी और जीवन शैली में निहित हैं. जब तक औद्योगिक क्रांति के ज्ञान-आधार यानी साइंस को चुनौती नहीं दी जाती तब तक इस आर्थिकी और जीवन शैली को बदलने के पुख्ता आधार नहीं बनते. स्वराज चेतना एक समग्र तर्क परंपरा की वाहक है और इस चुनौती को मूर्त रूप देने की क्षमता रखती है. पर्यावरण/जलवायु आन्दोलन एक ऐसे राजनीतिक विमर्श की मांग कर रहा है, जिसमें प्रकृति की पारंपरिक समझ और ज्ञान को उसका न्यायोचित स्थान मिले.

5. स्वराज अभियान

स्वराज का विचार वर्ष 2011 के भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन के बाद से सार्वजनिक बहस में दुबारा आ गया. स्वराज और स्वदेशी ये इस देश और सभ्यता की परम्परा के मौलिक विचार हैं, जो महात्मा गाँधी के पहले से राष्ट्रीय आन्दोलन में बहस में भी रहे. महात्मा गाँधी ने उन्हें राजनीतिक अथवा आर्थिक स्तर से उठा कर एक सार्वभौमिक भारतीय दर्शन के अंगों के रूप में पुनर्निर्मित किया. अब स्वराज के नाम से संगठन, अभियान, संस्थाएं आदि चल रहे हैं. स्वराज की यह बहस एक नये राजनीतिक विमर्श को जन्म देती है. यह एक ऐसी बहस होनी है, जो स्वायत्त समाजों के पुनर्निर्माण और स्वशासन के समकालीन के रूपों और मार्गों को उजागर करेगी. यह बात स्वराज आन्दोलन में सक्रिय व्यक्तियों और समूहों को समझना ज़रूरी है. तुरंत नतीजा हासिल करने की इच्छा के परिणाम प्रतिकूल ही होंगे.

6. लोकविद्या जन आन्दोलन

लोकविद्या जन आन्दोलन बहुजन समाज का ज्ञान आन्दोलन है, जिसका प्रमुख ध्येय लोकविद्या के लिए ज्ञान की दुनिया में बराबरी का स्थान हासिल करना है. यह उस व्यवस्था की कल्पना की मांग करता है, जिसमें लोकविद्या आधारित कार्यों पर वैसी ही आय हो जैसी विश्वविद्यालय के ज्ञान के आधार पर होती है. लोकविद्या के विचार और आन्दोलन ने संत परंपरा और बहुजन समाज की दर्शन की परम्पराओं की ओर ध्यान खींचा है. यह उस राजनीतिक विमर्श को बनाने में भागीदार हो सकता है, जो राज्यसत्ता, व्यक्तिवाद और ज्ञान के पाश्चात्य दर्शन के दबाव में न हो.

परिवर्तन के आकांक्षी व्यक्ति, समूह, संगठन और ढंग-ढंग से सोचने वाले मिलकर एक नया राजनीतिक विमर्श शुरू करें. जन-आन्दोलनों की ज़रूरतों और उनमें निहित दिशाबोध से इस विमर्श के प्रस्थान बिंदु बनाये जायें. इस संवाद को ‘स्वराज ज्ञान पंचायत’ का नाम दिया जाए तो बेहतर होगा.

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स्वराज ज्ञान पंचायत

एका नवीन राजकीय संवादाच्या दिशेने

एकोणीसशे नव्वद नंतर च्या तीन दशकांत जगात फार मोठे बदल घडून आले. यांसाठी पोषक अशी पार्श्वभूमी तयार होण्यात सोवियत यूनियन चे विघटन, जागतिकीकरणाचा वाढता व्याप आणि संगणक व संचार तंत्रज्ञानात घडून आलेले अभूतपूर्व बदल या बाबींचा वाटा निर्णायक मानायला हवा. दुसऱ्या खाडी युद्धात अगदीच नवीन तंत्र आणि डावपेचांचा वापर केला गेला. त्यानंतर भांडवलशाही व साम्राज्यवाद यांकरवी जगातील मोठ्या जनसंख्येच्या आधीपासूनच होत असलेल्या लुटीत प्रचंड वाढ साध्य करणाऱ्या प्रक्रिया सुरू झाल्या आहेत. या सोबतच या वाढीव लुटीचे ही समर्थन करायला नवनवीन वैचारिक व्यवस्था अस्तित्वात आल्या आहेत. इंटरनेट व संचार प्रणाली, शासन आणि नियंत्रणाच्या आधुनिक व्यवस्था आणि जागतिक बाजारपेठ हे या सर्व प्रक्रियांत एकमेकाला सहायक आणि पूरक ठरले आहेत.प्रभावी चलनात असलेल्या सर्वच विचार-प्रणाली व राजकीय व्यवस्थांकरवी – मग त्या लोकशाही असोत, का समाजवादी, अगर सम्प्रदायवादी – या जागतिक शोषण प्रक्रियांचे ‘विकास’ या नावाने स्वागत होत आहे! पाश्चिमात्य देशांत जन्मलेले मानव-समाज मुक्तीचे सगळेच विचार हे नवीन आव्हान पेलण्यास हतबल ठरले आहेत, असे मानायाला पुरेशी जागा आहे. या विचारांवर आधारलेल्या मुक्ती-लढ्यांचे वैफल्य निव्वळ संघटनात्मक स्वरूपाचे मानले, तर ते सपशेल चुकीचे ठरेल. परिणामी या सर्वच संघर्षांत सहभागी कार्यकर्त्यांसमोर विलक्षण आव्हान उभे ठाकले आहे. अशा परिस्थितीत सर्वांनी मिळून आपसांत एका नवीन प्रकाराचा संवाद आरम्भणे गरजेचे आहे.

जागतिक ताकदींमधला परस्पर समतोल रशिया-युक्रेन युद्धाने जवळ-जवळ संपुष्टात आणला आहे. एवढेच नव्हे तर युद्धा सोबतच्या घडामोडींनी ‘राज्य’ (नेशन-स्टेट) या दोन-अडीच शतकांपूर्वी यूरोपात अस्तित्वात आलेल्या समाज-संचलना विषयीच्या मूळ संकल्पनेवर मोठे प्रश्न-चिह्न उभे केले आहे. या प्रक्रियेत रशिया, चीन, तुर्कस्थान, इज्राएल आणि भारत हे देश आघाडी वर दिसतात. आपली प्राचीन समृद्ध सभ्यता व संस्कृती या बद्दल हे देश आक्रमक पवित्रा घेतांना, आणि त्या बळावर जागतिक शक्ती-समीकरणात निर्णायक बदल घडवायची भाषा बोलतांना दिसतात. एकीकडे या सर्व देशांच्या नेत्यांची देशांतर्गत प्रतिमा ‘हुकूमशहा’ अशी आहे, तर दुसरीकडे मात्र हेच नेते ‘राज्य’ या संकल्पनेच्या जनक (ब्रिटन, अमेरिका, फ्रांस) देशांच्या दंडुकेशाही चा विरोध करतांनाही आढळतात. सध्या अंकुरावस्थेत असलेला – “सिविलायझेशन स्टेट” या नावाने संबोधला जात असलेला – हा निवडुंग फोफावण्याच्या मार्गावर आहे. प्रगतीशील धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्त्यांच्या दृष्टीने एकंदर परिस्थिती पुरेशी जटील आणि कोंडीत टाकणारी आहे.

जुन्या (नेशन-स्टेट), आणि सध्या मूळ धरत असलेल्या नवीन (सिविलायझेशन स्टेट) अशा दोन राज्य-संकल्पनांत बरीच वेगळीक आहे, मतभिन्नता आहे. या वेगवेगळ्या संकल्पनांचे पुरस्कर्ते अनेक बाबतीत एकमेकाचा विरोध ही करतात. मात्र एका अतिशय महत्वाच्या मुद्द्यावर दोहोंत एकमत व मैत्री दिसून येते. जर भावी समाजाचे आपल्या आवडीचे चित्र प्रत्यक्षात रेखाटायचे असेल, तर बहुजन समाजाची लूट मांडणे अपरिहार्य आहे, यावर दोनही प्रकारच्या राज्यांचे प्रवर्तक एकमेका सोबत आहेत.

देशांतील शेतकरी चळवळीने मात्र प्रचलित दोनही प्रभावी राजकीय प्रवाह थोपवण्याचे आव्हान पेलण्यासाठी मैदान मोकळे केले. हे मैदान बहुजन समाजाचे आहे. न्याय व समते वर समाजाची पुनर्बांधणी घडवायचे हे मैदान आहे. बहुजन समाजा साठी ही ऐतिहासिक संधी आहे. स्वतः जवळचे आपले ज्ञान आणि न्याय, त्याग व बंधुभावाची आपली सामाजिक मूल्ये यांच्या दिमतीवर नवीन समाजाची निर्मिती करायला पुढाकार घ्यायची ही संधी आहे. याची सुरवात एका नवीन राजकीय संवादाची मुहूर्तमेढ ठेवून होऊ शकेल.

एका नवीन धरतीच्या राजकीय संवादाच्या प्रतीक्षेत हे शतक आहे. पाश्चिमात्य उगमस्थाने असलेल्या वैचारिक परंपरा व व्यवस्था, आणि देशांतर्गत संघटित ज्ञान प्रणालींनी पुरस्कृत केलेल्या वैचारिक परंपरा व व्यवस्था या दोहोंचे जोखड झुगारून टाकणारा असा हा संवाद असेल. तसे पाहिले तर असा संवाद आपल्या समाजात ‘स्वराज’ अगर तत्सम संकल्पनांभोवती नेहमीच घडत असे. परंतू, इंग्रजांपासून स्वातंत्र्य मिळविल्यानंतरच्या राजकीय प्रक्रियांनीच तो हळू-हळू संपुष्टात आणला, ही ऐतिहासिक विडम्बनाच मानावी लागेल.

एकविसाव्या शतकाची नांदी पाश्चिमात्य ज्ञान क्षेत्राला मोठे हादरे देत झाली. संगणक विज्ञान आणि संचार तंत्रज्ञान यांत झालेली विलक्षण प्रगती याला जवाबदार ठरली, आणि ज्ञान-क्षेत्रात सायंस चे निर्विवाद सर्वोच्च स्थान, थोडे-फार का होईना, डळमळीत झाले. परिणामी हा काळ बहुजन समाजाकडे असलेल्या विस्तृत ज्ञानाचे – म्हणजेच, लोकविद्येचे – सामाजिक अस्तित्व व समाज जगवायचे मार्ग पुरवायची त्या ज्ञानाची क्षमता, यांविषयीची, वसाहतवादी वर्चस्वात हरपत गेलेली, सार्वत्रिक ओळख आणि भान परत एकदा जागवणारा काळ ठरला. बहुजन समाजाने लोकविद्येच्या ताकदीवर केलेल्या उत्पादना वर जागतिक भांडवल, आणि नवोदित संगणक, इंटरनेट व संचार प्रणाली-आधारित ज्ञान-व्यवस्थापन तंत्र वापरून जागतिक बाजारपेठांतून वाढीव मुनाफा आणि भांडवल-संचय साधणारी जी नवीन प्रक्रिया या काळात बळावली, ती याला काही अंशी कारणीभूत ठरली.

बहुजन समाजाच्या या काळातील संघर्षांपासून शिकवण आणि प्रेरणा घेऊन ‘स्वराज’ या संकल्पनेभोवती संवाद साधता येऊ शकेल. बहुजन समाजाची विश्वदृष्टी नव्याने समजून घेणे या संवादातून साधू शकेल.

स्वराज-चेतना

बहुजन समाज हा विविध शेतकरी, कारागीर, आदिवासी, मजूर, फेरीवाले, लहान दुकानदार, स्त्रिया या समाजांचा विशाल सागर आहे. आधुनिक शोषणकारी व्यवस्थेने सामाजिक दृष्टीने बहिष्कृत केलेला असा हा समाज आहे; कॉलेज-विद्यापीठ शिक्षणाला कमोबेश मुकलेल्यांचा समाज आहे. या सागरातील लहरी व लाटांत या समाजाच्या जाणिवाच प्राण फुंकतात व त्याच बळावर या समाजाचे लढे उभे राहतात. बहुजन समाजातील लोकांची ओळख त्यांच्या-त्यांच्या लघु-समाजांतून तयार होते, आणि ते या समाजांचे घटक म्हणूनच बहुजन समाजरूपी सागरात जगतात, वावरतात.

स्वराज-चेतना बहुजन समाजाचा आविष्कार आहे. सामान्य जीवनात या चेतनेची पदोपदी प्रचीती येते. समाजातील आर्थिक, तांत्रिक, सामाजिक, राजकीय, सांस्कृतिक, तत्व-विचार संबंधी, आणि एकंदर सर्वच उत्पादक व ज्ञानाधिष्ठित कार्ये या अखंडित समग्र चेतनेच्या नियंत्रण व मार्गदर्शनानेच होत असतात. बहुजन समाजाची चेतना, समग्र जाणीव समजून घ्यायला तिचे विविध पैलू ओळखणे सहायक ठरावे. उदाहरणार्थ, चोरी करण्याला समाजात आळा घालणाऱ्या समग्र चेतने बद्दल असे म्हणता येईल: ‘चोरी करणे चूक आहे’ हा तिचा नैतिक पैलू आहे, तर ‘चोरी केल्याने समाजाची एकंदर वीण उसवते’ हा सामाजिक पैलू, ‘चोरी करणे दंडनीय अपराध आहे’ हा राजकीय पैलू, आणि ‘चोरी करणे अविद्येचे लक्षण आहे’ हा तिचा ज्ञान-पैलू. सर्वच प्रकारचे सामाजिक व्यवहार असेच त्या-त्या व्यवहारासंबंधी विविध आयामी समग्र चेतनेच्या बळावरच नियंत्रित होत असतात, या दृष्टीकोनातून बघितले तर बहुधा ती समजायला मदत होईल.
उदारमतवादी लोकशाही, लोकतांत्रिक समाजवाद, किंवा शास्त्रीय समाजवाद (लिबरल डेमोक्रसी, डेमोक्रेटिक सोशलिझम, किंवा सायंटिफिक सोशलिझम) या सारख्या राजकीय विचारधारा पाश्चिमात्य देशांत उदयाला आल्या आणि रुजल्या. त्या देशांतील समाज मध्यम वर्ग (bourgeoisie) आणि कामगार वर्ग (proletariat) यांच्या नेतृत्वात घडले. आपल्या देशाचा बृहत समाज मात्र असंख्य लघु-समाजांनी मिळून घडलेला आहे. यात लघु-समाज, त्यांत लघुतर समाज, … अशी घटकांची मालिका थेट व्यक्ती पर्यंत नेते. समाजाच्या या घडवणुकीत प्रत्येक पातळीवर ‘स्वायत्तता’ या संकल्पनेला महत्वाचे स्थान आहे. व्यक्ती आणि बृहत समाज हे मानवाच्या अस्तित्वाचे व जीवनाचे दोन टोकांचे घटक आहेत. या संदर्भात हे लक्षात घेणे गरजेचे आहे की व्यक्तिगत जाणिवा आणि सामाजिक जाणिवा यांच्या दरम्यान अन्योन्याश्रित पण समतेचे नाते ज्यात मान्य असते ती चेतना म्हणजेच मानवीय चेतना. जमिनीवर काम करणाऱ्या कार्यकर्त्याला हे सत्य आपसुकच गवसते. यात अडचण फक्त त्यांनाच भासते जे पाश्चिमात्य संकल्पना बाजूला सारून विचार करू शकत नाहीत!
वर चर्चिलेली बहुजन समाजाची समग्र चेतना म्हणजेच स्वराज-चेतना. जागतिक शोषण व्यवस्थेने निर्माण केलेल्या परिस्थितीत होत असलेल्या बहुजन समाजाच्या सर्वच लढ्यांत स्वराज-चेतनेची स्फुटे दिसतात.

1. शेतकरी आंदोलन

या आंदोलनात शेतकरी कुटुंबाच्या मिळकतीचा प्रश्न मध्यवर्ती आहे. प्रमुख मागणी शेतमालाला रास्त भाव, फायदेशीर भाव, किंवा शास्त्रीय भाव या धरतीची आहे. आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था आणि जीवन-शैली कायम ठेवून या मागणी चे निराकरण होणे केवळ अशक्य आहे. शेतकरी असे मानतात की मानाने जगायचे असेल तर ही मागणी पदरात पाडून घेण्याला पर्याय नाही. समाजात न्याय, त्याग आणि बंधुभाव रुजवणे अतिशय गरजेचे आहे याकडे शेतकरी आंदोलनाने लक्ष वेधले आहे. अराजकीयत्वा वर आंदोलनाने दिलेला भर सत्ता समाजात परतावी यासाठी परस्पर संवाद साधण्या संबंधी आशावादाला बळ देणाराच आहे.

2. सामाजिक न्यायाचे लढे

सामाजिक न्याय प्रस्थापित व्हावा या उद्दिष्टाने लढलेले लढे बहुजन समाज आणि आधुनिक वर्ग यांत समता व्हावी यावर भर देतात. याचा अर्थ असा की आधुनिक औद्योगिक व्यवस्था उभारायला ज्या समाजांचा बळी गेला ते, आणि त्या व्यवस्थेने जे वर्ग मुळात जन्माला घातले आणि पोसले ते, यां दोहोंत समता व्हावी असा आग्रह सामाजिक-न्याय लढे धरतात. या लढ्यांतील मागण्या आणि त्यां संदर्भात सरकारींनी उचललेली धोरणात्मक पावले या दोहोंवर सध्या राजकारणात प्रचंड टीका सुरू आहे. सामाजिक न्याय आंदोलनांचे प्रस्थापित नेतृत्व आधुनिक व्यवस्थेच्या ज्ञान-आधारावर (म्हणजे ‘सायंस’ वर) आघात करायला तयार नाही, यामुळे अवस्था आगीत तेल ओतल्यागत झाली आहे. आज सायंस ला समाजात जी प्रतिष्ठा आहे तशीच बहुजन समाजाकडे असलेल्या ज्ञानाला (लोकविद्येला) नसेल, तर सामाजिक न्यायाचे लढे सक्षम ठरू शकत नाहीत. या लढ्यांचे वर्तमान नेतृत्व हे समजून घ्यायला तयार नाही, तर आधुनिक व्यवस्थेत प्रवेश मिळविलेल्या बहुजन समाजाच्या अगदीच लहान भागाचे हितसंबंध जोपासण्यातच कृतकृत्यता मानते. बहुजन समाजाचे ज्ञान व सामाजिक मूल्ये यांच्या ताकदीवर समताधिष्ठित नव समाज-निर्मिती साठी सार्वत्रिक संवाद साधायला तयार असेल अशा नेतृत्वाची सामाजिक न्याय लढ्याला आज खरी गरज आहे.

3. जल-जंगल-जमीन आंदोलन

पाणी, जंगल व जमीन या नैसर्गिक साधन-संपत्तीवर बहुजन समाजाच्या स्थानिक घटकांचा ताबा व नियंत्रण असावे, अशी जल-जंगल-जमीन आंदोलनाची मागणी आहे. या साधन-संपत्ती चा रख-रखाव साधायची आणि पर्यावरण संरक्षणाला साजेसा असा तिचा उपयोग करण्याची क्षमता, कला व ज्ञान स्थानिक समाजांकडे आहे, ही मान्यता या मागणीचा गाभा मानला पाहिजे. ही कार्ये हे समाज परंपरेने यशस्वी रीतीने करत आलेले आहेत. ब्रिटिश शासन आणि नंतर स्वतंत्र देशाच्या शासनांनी या समाजांपासून ती हिरावून घेतली. आपले अधिकार आणि कार्यांचा त्यांनी त्याग केल्यावर ही आधुनिक लोकशाही व्यवस्था त्यांना सामावून घेऊ शकलेली नाही. स्वराज संवाद या समाजांचे जल-जंगल-जमीन क्षेत्रातील ज्ञान व क्षमता आणि याविषयीच्या भावी शक्यता सर्वांसमक्ष मांडण्यात प्रभावी ठरावा.

4. पर्यावरण / हवामान न्याय आंदोलन

पर्यावरण नाशाला कारणीभूत असलेले घटकच हवामान बदलाला जवाबदार आहेत, हे सर्वश्रुत आहे. नाशाच्या या प्रक्रियेने हळू-हळू मानवी सामाजिक जीवनच दुष्कर होत चालले आहे. औद्योगिक क्रांती ने जे अर्थकारण स्थापले आणि ज्या जीवन-शैली ला खत-पाणी पुरवले त्यांतच पर्यावरणाचा नाश दडलेला आहे. परिणामी औद्योगिक क्रांतीचा ज्ञानाधार, म्हणजे ‘सायंस’ च्या एकाधिकारशाही विरुद्ध आवाज न उठवता फक्त या क्रांतीतून उदयाला आलेले अर्थकारण आणि जीवन्शाली वर टीका व आघात केले, तर तो निव्वळ कांगावा ठरेल. बहुजन समाजा ची समग्र चेतना म्हणून स्वराज-चेतने च्या बळावर पर्यावरण प्रश्नावर या व्यवस्थे समोर ठोस आव्हान उभारता येऊ शकेल. गरज आहे ती निसर्गाविषयी समृद्ध पारंपरिक ज्ञान, विवेक व पद्धती ज्या समाजांकडे आहेत त्यांना त्यांचे न्यायोचित स्थान बहाल करण्याची.

5. स्वराज-अभियान

वास्तविक बघता स्वराज आणि स्वदेशी या संकल्पना आपल्या परंपरा व संस्कृती करिता मुलभूत अशाच आहेत. स्वातंत्र्य लढ्यात गांधींच्या प्रवेशा आधीही त्या होत्याच. परंतू, गांधींच्या पुढाकारात निव्वळ आर्थिक किंवा राजकीय कल्पना न राहता, या सर्व भू-भागातील तत्व-विचाराचा अविभाज्य आणि मध्यवर्ती आयाम म्हणून या संकल्पना प्रतिष्ठा पावल्या. स्वातंत्र्यानंतर मात्र फक्त काही ट्रस्ट – संघटना – संस्थांची नावे भूषवण्या पलिकडे या शब्दांना महत्व उरलेले दिसत नाही. सत्ता समाजात असावी, स्वायत्त समाजाची पुनर्स्थापना आणि स्व-शासनाची वर्तमान कार्यक्षम रूपे यांवर स्वराज संकल्पनेतून खुलासा व्हावा, हे स्वराज संवादा चे मनोगत आहे. स्वराज आंदोलनाच्या कार्यकर्त्यांनी हे समजून घ्यावे आणि अशा अल्प-पल्ल्याच्या जुगाड-वजा उपायांना बळी पडू नये जे एकंदर स्वराज-निर्मिती साठी हानिकारक ठरू शकतील.

6. लोकविद्या जन आंदोलन

लोकविद्या जन आंदोलन हे ज्ञान आंदोलन आहे. ज्ञान-विश्वात लोकविद्येला न्यायोचित आणि समानते चे स्थान असावे, असा या आंदोलनाचा आग्रह आहे. हे आंदोलन असे मानते की लोकविद्येच्या बळावर जगणाऱ्यांची मिळकत विद्यापीठांतून आधुनिक शिक्षण घेतलेल्यांच्या मिळकती सारखीच असेल, अशी समाजाची एकंदर घडण असावी. भावी समाज संकल्पने संदर्भात या आंदोलनाने संत-परंपरा आणि बहुजन समाजाच्या तत्व-विचार परंपरांकडे लक्ष वेधले आहे. व्यक्तिवाद, ज्ञान-क्षेत्रातील पाश्चिमात्य तत्व-विचार आणि राज्यसंस्थे चे वर्चस्व यांपासून मुक्त अशा संवादात या आंदोलनाला रस आहे.

समाज-परिवर्तनाची इच्छा बाळगणाऱ्या व यासाठी विविध विचार घेऊन प्रयत्नशील असलेल्या सर्वच व्यक्ती, गट, संघटना – सर्वांनी – या राजकीय संवादात भाग घ्यावा. बहुजन समाजाच्या चळवळींचे अनुभव व गरजा या संवादासाठी मार्गदर्शक ठराव्यात.

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