बहुजन स्वराज पंचायत
7-9 अक्टूबर 2025, विद्या आश्रम
कार्यवाही
24 अक्टूबर 2025
विद्या आश्रम, सारनाथ परिसर पर 7, 8, 9 अक्तूबर 2025 को तीन दिवसीय बहुजन स्वराज पंचायत का सफल आयोजन हुआ. लगभग दो सौ भागीदारों के साथ हुई इस पंचायत में देश-दुनिया में हो रहे संघर्ष, आन्दोलन, युद्ध और उन्माद के वातावरण में बहुजन-समाज, स्वराज और लोकविद्या की दृष्टियों का परिवर्तनकारी पक्ष सामने लाया गया और इनमें निहित न्याय, त्याग और भाईचारे के मूल्यों की पुनर्स्थापना के रास्तों को गढ़ने पर चिंतन हुआ. पंचायत के आयोजकों की ओर से यह स्पष्ट किया गया कि इस पंचायत में जब हम बहुजन-समाज की बात करते हैं तो हमारा आशय बहुजन पार्टी से नहीं, बल्कि सामान्यजन से है, स्वराज का आशय ग्राम स्वराज नहीं है बल्कि सामान्यजन की पहल पर स्वराज का है और लोकविद्या का अर्थ महज़ परंपरागत विद्या से नहीं है, बल्कि बहुजन समाज में बसने वाली जिंदा विद्या से है. कुल छह सत्रों में विभाजित इस पंचायत का विषय था ‘बहुजन की पहल पर स्वराज का निर्माण’.
पंचायत में देश भर से भागीदारी रही. बंगलुरु, उड़ीसा, कोलकोता, इंदौर, सिंगरौली, नागपुर, दिल्ली, पटना, आजमगढ़, मऊ, झाँसी, मिर्ज़ापुर, गाजीपुर, वाराणसी, और वाराणसी के आसपास के अनेक सामाजिक कार्यकर्त्ताओं ने हिस्सा लिया.
लोकविद्या सत्संग
पंचायत की शुरुआत लक्ष्मण प्रसाद और गायक सामू भगत की सदारत में लोकविद्या के बोल के साथ हुई. आजमगढ़ से आये चनैनी गायक केदारनाथ की अध्यक्षता में लोकविद्या सत्संग हुआ. “ले चल, ले चल हो सजना, अमरपुरी ले चल”, “जान ले रे दीवाना अब”, “तेरा मेरा मनवा कैसे होई एक रे” और “हम पाई रे लोकविद्या की जड़ी” के पद गाकर बहुजन स्वराज पंचायत के प्रस्थान बिन्दुओं को अंकित किया.
स्वागत
विद्या आश्रम की समन्वयक चित्राजी ने पंचायत में आये सभी भागीदारों का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि यह पंचायत बहुजन-समाज की शक्ति के स्रोतों को उजागर करने का लक्ष्य रखती है. बहुजन समाज यानि सामान्य जन. पिछले 15-20 वर्षों में लोकविद्या जन आन्दोलन ने लोकविद्या दर्शन और विचार की अनेक अवधारणाओं को गढ़ा है और इस आधार पर कार्यक्रमों और जन आन्दोलनों में भागीदारी के मार्फ़त आज हम बहुजन-स्वराज पंचायत तक पहुंचे हैं. वाराणसी ज्ञान पंचायत की पहल पर यह बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित की गई है. वर्ष 2016 में सलारपुर में शोषित समाज दल और लोकविद्या जन आन्दोलन की संयुक्त पहल पर बनी वाराणसी ज्ञान पंचायत में अनेक संगठन शामिल हैं, जिनमें मुख्यत: लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन, स्वराज अभियान, बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषाद सेवा समिति और कारीगर नजरिया हैं. बहुजन स्वराज पंचायत के इस आयोजन में इंदौर से लोकविद्या समन्वय समूह और कला केंद्र की भागीदारी उल्लेखनीय है.
आज दुनिया के कुछ शक्तिशाली देशों ने बहुजन-समाज को बहिष्कृत, उत्पीडित कर लगभग मिटाने की मुहिम चला रखी है. इस मुहिम को लोकतान्त्रिक, समाजवादी, रुढ़िवादी सभी सरकारों का समर्थन मिलता हुआ हम देख रहे हैं. नई तकनीकी, साइंस और वित्तीय पूंजी के गठबंधन ने साम्राज्यवादी शक्तियों की नई आकांक्षाओं और व्यवस्थाओं के लिए मैदान तैयार किया है. इस मुहिम के साथ वे राष्ट्र-सत्ताओं के पुनर्संगठन की बातें भी कर रहे हैं. इन बातों में सभ्यतागत-राज्य (सिविलिज़ेशनल-स्टेट), राष्ट्र-राज्य (नेशन-स्टेट), उदार लोकतंत्र (लिबरल डेमोक्रेसी), सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (कल्चरल नेशनेलिस्म) प्रमुख हैं.
जबकि इस बहस के कुछ ही वर्षों पहले इक्वाडोर और बोलीविया देशों के मूल निवासियों ने एक नया रास्ता बनाया है. इन देशों में बहुराष्ट्रीय-राज्य (प्लूरिनेशनल-स्टेट) की एक नई अवधारणा अस्तित्व में आई और उसके हिसाब से इन्होंने अपने ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर राष्ट्र का संविधान बनाने की पहल ली. हम मानते हैं कि यह घटना दुनिया भर के बहुजन-समाजों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
हमारा मानना है कि इस वैश्विक बहस में ‘स्वराज’ को ले आने की पहल करनी चाहिए. ‘स्वराज’ यह बहुजन-समाज के विचार और परम्परा का हिस्सा है. भारत के किसान आन्दोलन के लम्बे दौर में हम स्वराज की परंपराओं की स्पष्ट झलक देख चुके हैं. ‘न्याय, त्याग और भाईचारा’ के नारे व मूल्य में उनकी दृढ निष्ठा के नतीजों का असर भी देख चुके हैं. हम उम्मीद करते हैं कि बहुजन स्वराज पंचायत से कुछ उजाला मिले और बहुजन की पहल पर स्वराज निर्माण के मार्ग खुलें.
विषय प्रवेश
गिरीश सहस्रबुद्धे, नागपुर (संयोजक, लोकविद्या जन आन्दोलन, महाराष्ट्र, विद्या आश्रम के न्यासी, शेतकरी संघटना (किसान आन्दोलन) के सक्रियकर्मी और भौतिक शास्त्र के अवकाशप्राप्त प्राध्यापक).
सत्र के मुख्य विषय को गिरीश ने विस्तार से पंचायत के सामने रखा. बहुजन स्वराज पंचायत यह बहुजन स्वराज की पहल की शुरुआत है. बहुजन समाज एक विशाल समाज है, जो सामान्य जीवन का वाहक है और एक ज्ञानी समाज है. हम जिसे लोकविद्या समाज कहते आए हैं, यह वही समाज है. ‘बहुजन’ यह शब्द इस बात को पकड़ता है कि ये सामान्य-जन का समाज है, अभिजनों से भिन्न. बहुजन समाजों का ज्ञान वह ज्ञान है, जो सृजन की वास्तविक क्रियाओं में पैदा होता है और वहीं बसता है और यह ज्ञान लोकविद्या कहलाता है, जो सामान्य जीवन का वाहक है. सामान्य जीवन का वाहक होने का मतलब है कि बहुजन ने अपने ज्ञान में कभी बिखराव नहीं आने दिया, ज्ञान के किसी एक हिस्से को बहुत बड़ा कभी होने नहीं दिया. इसके उलटे पिछले 400 वर्षों में जो पश्चिम में ज्ञान (साइंस) के एक – भौतिक – आयाम को इतना बढ़ावा मिला कि वह बहुजन समाज से अलग हो गया. बहुजन समाज के ज्ञान से विलग होकर जो ज्ञान खड़ा हुआ उसने ऐसे समूहों को जन्म दिया, जो बहुजन समाज पर शासन करते हैं. इनसे आधुनिक राजनीति ने आकार लिया और अलग-अलग किस्म की राज्य व्यवस्थाएं अस्तित्व में आईं. इस तरह आधुनिक ज्ञान (साइंस), आधुनिक राजनीति और आधुनिक राज्यसत्ता परस्पर की सहयोगी बनकर विकसित हुईं.
इन राज्य व्यवस्थाओं और आधुनिक ज्ञान के बल पर जो व्यवस्थाएं बनीं, उन्होंने समाज के सामने ऐसे भयानक संकट पैदा कर दिए हैं, जिनका जवाब इनके पास नहीं है. ज्ञान को समाज से विलग कर उसी समाज के विरोध में खड़ा करने के कुछ बड़े परिणामों में एक उदाहरण पर्यावरण संकट है. इसका सामना आधुनिक जीवन प्रणालियों की समाप्ति के बगैर असंभव है. इन जीवन प्रणालियों को बदलने का कोई जरिया वर्त्तमान व्यवस्थाओं के पास नहीं है, जबकि बहुजन-समाज के आंदोलन इस स्थिति पर निरंतर ध्यान खींचते रहे हैं. इस पंचायत के माध्यम से आज हम जिस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं वह, यह है कि बहुजन समाज के आंदोलन वर्त्तमान स्थिति को बहुजन ज्ञान के दृष्टिकोण से पहचानें. अगर नहीं पहचान पाते हैं तो ये आंदोलन भी आज की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के आंदोलन बनकर रह जाते हैं, ये तथ्य भी सामने है. परिवर्तन की विचारधाराओं से जो आंदोलन खड़े हुए वे सारे बहुजन समाज के आंदोलन ही थे. लेकिन वो आधुनिक ज्ञान-विधाओं पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगा पाए. ये उनकी प्रमुख कमजोरी मानी जानी चाहिए.
तो, आज स्थिति यह है कि जितनी राज्य प्रणालियां हैं, वे सभी, बहुजन समाज के ज्ञान को समाज से उठाकर राज्य व्यवस्था के साथ मिलकर बहुजन समाज के शोषण के आधार पर बनी. आधुनिक राज्य व्यवस्था का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. मात्र 400 साल – इससे ज्यादा नहीं. जब से नेशन स्टेट की बात शुरू हुई तभी से. नेशन स्टेट चाहे डेमोक्रेटिक वैरायटी का हो, तानाशाही हो या उदारवादी, उस स्टेट का ज्ञान आधार आधुनिक साइंस में ही रहा. अमेरिका ने इस ज्ञान और इस तरह की राज्य व्यवस्था के बल पर सारी दुनिया पर राज किया. लेकिन अब उसकी ताकत लगभग खत्म होती जा रही है, ऐसा सब मान रहे हैं. एक मल्टीपोलर वर्ल्ड-बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पनप रही है. इसमें अमेरिका ही सत्ता का एक केंद्र नहीं होगा, बल्कि कई देशों में सत्ता के केंद्र होंगे. जब सत्ता का केंद्र बिखरता है, आपको अपनी बात कहने का मौका बनाता है. आज कुछ ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं, जो हमको अपने स्वराज की बात कहने में मददगार साबित हो सकते हैं.
पिछली बार भी हम लोगों ने जब लोकविद्या की बात शुरू की थी तब मौका इंटरनेट के फैलाव का था जिसने साइंस पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया था. संचार की एक नई दुनिया खड़ी कर दी थी. ज्ञान क्या है और नहीं है, उसकी कसौटियाँ क्या हैं, इसके नए सिद्धांत खड़े कर दिए थे. इसलिए साइंस पर प्रश्न चिन्ह लग गया, और तमाम बहुजन समाजों के पास में जो अलग-अलग ज्ञान विधाएं हैं, उनकी एक पहचान बनी, जिसके बल पर हम अपनी लोकविद्या की बात खड़ी कर पाए. यह कह पाए कि आज की दुनिया की जो त्रासदी है वह यह है कि बहुजन के ज्ञान – लोकविद्या – की ताकत को आज की दुनिया नकारती है. हमने बात की कि लोकविद्या को संगठित ज्ञान के बराबर की प्रतिष्ठा होनी चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है. यह शर्त है न्याय-संगत समाज खड़ा करने की. इसके आगे का कदम बढ़ाने की बात हम अब कर रहे हैं.
अब जिस तरह की परिस्थितियां बन रही है उनमें राज्य व्यवस्थाओं को समाज ‘चलाना’ – मतलब बहुजन समाज के आन्दोलनों को सीमाओं में बांधना – अधिकाधिक कठिन होता जाएगा. बहुध्रुवीय विश्व बनने के पीछे यह भी एक कारण है. लेकिन नई व्यवस्थाएं जब खड़ी होती हैं तब राजनीति में नए किस्म की बातें भी साथ में आती हैं. जैसे विश्व बाजार का रूप बदलेगा, राज करने के तरीके बदलेंगे. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हो या सभ्यतागत राज्य हो, इन अलग-अलग नामों के साथ जो कुछ भी घट रहा है वह हमारे यहाँ 2014 से हो रहा है. इन सारे विषयों पर बात आगे होनी है. यहाँ मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि नई राज्य व्यवस्थाओं के नाम से जो भी घट रहा है उसमें बहुजन ज्ञान के लिए बराबरी और सम्मान का स्थान नहीं है. बहुजन ज्ञान का अर्थ मात्र लोकविद्या की वे धाराएं नहीं, जिनका साइंस के और विश्व बाजार के अधिपत्य में इंटरनेट और ज्ञान-प्रबंधन के माध्यम से शोषण किया गया. इनके साथ बात बहुजन-समाज की राज व्यवस्थाओं की भी हो रही है. समाज चलाने की व्यवस्थाओं की भी हो रही है. हम बहुजन स्वराज के समाज संचालन के ज्ञान दर्शन की बात भी कर रहे हैं. उसका भी दावा ठोकना है. जो बहुजन समाज की अपनी क्षमताएं हैं, समाज संचालन का जो ज्ञान है, यानि खुद अपना समाज चलाने की बात है, जिसको सब मिला–जुलाकर स्वराज का नाम दिया जा सकता है, उसका दावा करने का यह अवसर है.
अगर आज की दुनिया में बहुजन स्वराज को अवस्थित करना है, तो जिन चीजों को देखते हुए चलना होगा उनकी बात इस पंचायत में होगी. बहुजन समाज की एक नई पहचान बनाने की, एक नया बहुजन नैरेटिव खड़ा करने की यह बात है. आज की व्यवस्थाएं बहुजन समाज को बांटने वाली जो पहचान आज तक बनाती रहीं उसको दूर हटाने की बात है. यह बात हम पंचायत के पहले दो सत्रों में करेंगे. उसके बाद कल के सत्रों में स्वराज चेतना पर, स्वराज पर बात होगी. इसके अलग-अलग अर्थों पर बात होगी. बहुजन सभ्यता से इसके रिश्तों पर बात होगी. समाज संचालन से इसके रिश्तों पर बात होगी. लोकविद्या से इसके रिश्तों पर बात होगी. सामान्य जीवन के साथ इसके रिश्तों की बात होगी. एक और नई बात, जो एक अलग सत्र में होनी है, वह है कला और स्वराज के रिश्तों की. कला की जो विधा है वह लोकविद्या की विधा से अलग नहीं है. सामान्य जीवन की शर्तों के अनुसार सर्जन की विधा कला की विधा है, लोकविद्या की विधा है. तो इस पर एक अलग सत्र होगा. इस पंचायत के साथ प्रकाशित ‘बहुजन स्वराज की किताब’ आप देखेंगे तो पायेंगे कि किताब के लेखों पर पंचायत के सत्रों को गढ़ा गया है. दो किस्म की बातें हैं. एक बात है आज बहुजन समाज के सामने की चुनौती और स्वराज के अर्थ और प्रासंगिकता की. दूसरी है चुनौती के स्वीकार के लिए बहुजन समाज की क्षमताओं की बात. यह दो तरह की है: एक, स्वराज निर्माण में कला की बात; और दो, जीवंत बहुजन परंपराओं में बहुजन समाज की क्षमताओं की खोज, जो बहुजन की अपनी खोज होगी और बहुजन नैरेटिव को गढ़ेगी.
तो, आगे के सत्रों में ये बातें होंगीं. सत्संग के साथ में ये बातचीत चलेगी. कला की बात के साथ यह बातचीत चलेगी. लोकविद्या की बात के साथ यह बातचीत चलेगी, और स्वराज की बात को बढ़ाते हुए ये बातचीत चलेगी. मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप सभी उसमें सक्रियता से शामिल हों.
पहला सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
सुबह 11.00 बजे से भोजन तक
लेखक: फ़ज़लुर्रहमान अंसारी
विषय: बहुजन-समाज
अध्यक्ष मंडल: सामू भगत,वाराणसी (निर्गुण गायकी के कलाकार), केदारनाथ यादव, आजमगढ़ (लोरिकायन और चनैनी गायकी के कलाकार)
संचालन: फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, वाराणसी (बुनकर साझा मंच और लोकविद्या जन आन्दोलन)
वक्ता: रामजनम, इकबाल अंसारी, पारमिता
फ़ज़लुर्रहमान अंसारी (बुनकर साझा मंच, लोकविद्या जन आन्दोलन):
सत्र संचालक ने अपनी बात बहुजन समाज के इस परिचय के साथ की कि बहुत से ज्ञानी समाजों से मिलकर बना हुआ यह एक ऐसा समाज है, जिसमें तरह-तरह के हुनर, ज्ञान और कार्य करने वाले समाज साथ साथ उसी तरह रहते हैं जैसे किसी माला में विविध रंग के मोती पिरोये होते हैं. इन सभी समाजों को हम ज्ञानी इसलिए मानते हैं कि इनके पास केवल अपना ज्ञान और हुनर ही नहीं है बल्कि इसका दर्शन भी है, इनकी अपनी विरासत और परम्पराएँ हैं. आज सामान्य जन को ‘जनता’ के नाम से पुकारा जाता है, जो गलत है. क्योंकि जनता बेशक्ल और बेअकल मानी जाती है, जिसे हुक्मरान हांकते हैं. जबकि बहुजन समाज की अपनी एक समृद्ध पहचान है.
रामजनम, वाराणसी (स्वराज अभियान और लोकविद्या जन आन्दोलन, किसान नेता):
रामजनम ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि काफी लंबी कवायद के बाद हम लोग आज बहुजन स्वराज पंचायत तक पहुंचे हैं. जब हम लोगों ने सोचा कि देश के सामान्य जन को किस नाम से पुकारा जाए तो लोगो के अलग-अलग विचार आए, कुछ ने शूद्र तो कुछ लोगो ने पिछड़ा समाज कहा. हम लोग लोकविद्या जन आंदोलन के लोग हैं, हम लोग किसी भी समाज को शूद्र और पिछड़ा नहीं मानते, क्योंकि इनका भारत में गौरव शाली इतिहास रहा है और इन समाजों के इस देश में कई राजा रहे हैं. इन्हीं समाजों ने भारत देश को बनाया है और चलाया है. हम इन्हें पिछड़ा समाज नहीं मानते और शूद्र शब्द तो ब्राह्मणवादी शब्द है.
हम इन्हें इन शब्दों से नहीं बल्कि बहुजन-समाज के नाम से पुकारेंगे.
जब हम दुनिया के समाजों को देखते है तो हमको इनमें दो कैटेगरी दिखती है; एक विशिष्ट समाज, जिसे हम ‘प्रोफेशनल’ समाज कहते हैं और दूसरा सामान्य जन जिसे हम ‘बहुजन-समाज’ कहते हैं. ये जो प्रोफेशनल समाज है, ये दुनियां के सारे संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा है, दुनिया की अर्थनीति और राजनीति पर भी इनका ही कब्ज़ा है. इसी के बल पर ये बहुजन-समाज का तिरस्कार करता है.
बहुजन-समाज का हज़ारों साल का इतिहास है, पर इतना पुराना इतिहास देखने के बजाए अगर 2 या 3 सौ सालों का ही इतिहास देख लें तो हमें मालूम होता है कि बहुजन-समाज के पास तब सारे संसाधन भी थे और इनके राजा भी थे, जिनकी एक राज्य परम्परा थी, जिसमें न्याय, त्याग और भाईचारा था. खुद अंग्रेजों ने भारत आने के बाद अपनी किताबों में लिखा कि भारत के किसानों की आमदनी यूरोपीय किसानों से अधिक हुआ करती थी. उस समय खेती साम्राज्यवादी या सामंतवादी लोगो के कब्जे में नहीं थी. उस समय समाज की ऐसी व्यवस्था थी कि जिनके पास खेती करने योग्य ज़मीन नहीं थी तो समाज इनके लिए व्यवस्था करता था. हम मानते हैं यही असली स्वराज है.
आज हम बहुजन समाज का इतिहास विश्वविद्यालय में या किताबों में ढूंढते है. अगर बहुजन समाज का इतिहास देखना है तो समाजों के बीच जाना होगा, वहां आपको इनका जिंदा इतिहास मिल जाएगा.
इकबाल अंसारी, मऊ (अध्यक्ष, बुनकर वाहिनी उत्तर प्रदेश):
पूर्वांचल बुनकरों का एक बड़ा हब है, जैसे किसान देश का अनाज देता है वैसे ही बुनकर देश को कपड़ा देता है. मगर आज दोनों समाजों की समस्या एक ही है.
इसलिए हम बहुजन समाज के लोगों को ये समझना होगा कि जब भी कोई आंदोलन हो चाहे वो किसान का हो या बुनकर का हम बहुजन समाज को आपसी इख़्तिलाफ भूल कर उस आंदोलन को हर स्तर पर साथ देना चाहिए ताकि बहुजन समाज की आपसी एकता और भाईचारा मजबूत हो.
बात जब लोकविद्या ज्ञान की होगी तो मैं खुद एक बुनकर हूँ और करघे पर बुनकरी करता हूं. मेरे पास जो ज्ञान है वो किसी भी डिग्री का मौहताज नहीं. आज तमाम कारीगर समाज को ये बात मजबूती से उठानी होगी के हमारा जो ज्ञान या हुनर है वो किसी भी लिहाज़ से विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं है. इसलिए हमारे ज्ञान और विश्वविद्यालय के ज्ञान को बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए और हर कारीगर और किसान की आय पक्की और नियमित होनी चाहिए जो सरकारी कर्मचारी के बराबर हो.
पारमिता, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन और संयोजक, नागरिक समाज वाराणसी):
सामाजिक कार्यकर्ता और संघर्षशील पारमिता जी ने कहा कि बहुजन समाज को हम अलग अलग रूप में देखते है. कभी किसान के रूप में तो कभी कारीगर के रूप में, तो कभी आदिवासी के रूप में, कभी महिला शक्ति के रूप में और आज के इस आधुनिक दौर में इलेक्ट्रीशियन, कम्प्यूटर ऑपरेटर, मोटर साईकिल बनाने वाले आदि तमाम तरह के मिस्त्री और इस तरह के भिन्न-भिन्न प्रकार के कारीगर भी बहुजन समाज का ही हिस्सा हैं और इनका भी ज्ञान विश्वविद्यालय का नहीं है. ये सारे लोग उसी विद्या से आए हैं, जो समाज में रहकर सीखने की है, जिसे हम समाजों का विश्वविद्यालय कहते हैं.
अगर हम इतिहास में देखें तो बहुजन समाज का भी इस देश में काफी लंबा शासन रहा है और बहुजन समाज के अनेकों राजा हुए हैं, जिनका प्रयास बहुजन समाज के साथ न्याय संगत रिश्ता बनाने का रहा है और समाजों को विश्वास में लेकर ही कोई भी नीति बनाने की ओर झुकाव रहा है.
लेकिन आधुनिक शिक्षा और राज्यसत्ता में जब बहुजन समाज के बाहर के लोग नेतृत्व में आये तो उनका सम्बन्ध समाज से दूर होता गया और हश्र आप सभी के सामने है. लोकविद्या यह बहुजन समाज का ज्ञान-दर्शन है और इसके आधार पर जब तक समाज का पुनर्निर्माण और राज्यसत्ता का प्रकार आकार नहीं लेगा तब तक बहुजन का/के लिए स्वराज और बहुजन की पहल से स्वराज नहीं बना सकेंगे.
दूसरा सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के दूसरे सत्र की कार्यवाही
दोपहर 3.00 बजे से 5.00 तक
लेखक: लक्ष्मण प्रसाद
विषय: बहुजन समाज
अध्यक्ष मंडल: विजय जावंधिया, नागपुर,(किसान नेता, शेतकरी संघटना के पूर्व अध्यक्ष अंतर्राज्यीय किसान आन्दोलन समन्वय समिति के पूर्व अध्यक्ष), जानकी भगत, बिहार (समाजवादी नेता)
संचालक: लक्ष्मण प्रसाद, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन)
वक्ता: संजीव दाजी, हरिश्चंद्र केवट, राजकिशोर चौहान, रामदुलार प्रजापति, राजीव यादव, राहुल राजभर
संजीव दाजी (संयोजक, लोकविद्या समन्वय समूह, इंदौर):
मालवा और निमाड़ के इलाके में पिछले दस सालों से सक्रिय रहे संजीव दाजी सत्संगी मंडलियों के बीच लोकविद्या वार्ता और तरह-तरह के रचनात्मक कार्यों से जुड़े हैं. ये सत्संगी सभी की बात करते हैं. अलग-अलग संतो की बात करते हैं. ज्ञान-दर्शन की बात करते हैं. किसी भी गतिविधि को अंजाम देने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की भागीदारी जरूरी है. इंदौर के सांस्कृतिक कार्यक्रम में पारो-दरिया की एक संकल्पना है. जिसमें पारो स्त्री है और दरिया पुरुष. इंदौर के पास आदिवासी इलाकों में सत्संगी समूह संतों की वाणी के मार्फत बहुजन समाज की बात करते हैं. हाटों में सत्संग किये जाते हैं, जिसमें स्वाभाविक रूप से सत्संग सुनने के लिए और उसमें भागीदार होने के लिए लोग आते हैं. ज्ञान यात्रायें होती हैं, जिसमें अलग-अलग गाँवों के लोग शामिल होते हैं. कला और विद्या की प्रस्तुति के साथ बात होती है. यहाँ लोकविद्या दर्शन की बातें होती हैं, जीवन दर्शन की बाते होती हैं. उन्होंने पंचायत के सामने हाटों के इर्द-गिर्द लोकविद्या चेतना को उजागर करने के रचनात्मक कार्यों का एक नक्शा प्रस्तुत किया. उनका कहना यह था कि ग्रामीण क्षेत्रों के हाट लोकविद्या के ज्ञानपुंज होते हैं.
हरिश्चंद्र केवट, मिर्जापुर (लोक विद्या पत्रकार, मां गंगाजी निषाद सेवा समिति के सचिव) :
हरिश्चंद्र ने प्रमुखत: दो बातें रखीं. एक, बहुजन समाज किसी जाति विशेष से नहीं बना है बल्कि इसमें सभी सामान्य जन शामिल हैं. बहुजन समाज की पहचान सामान्य जन की व्यापक एकता बनाने का रास्ता खोलती है. यह ‘जाति’ और धर्म की सीमाओं से बाहर निकलकर न्याय के संघर्षों से जुड़ने का रास्ता देती है.
दूसरा, ‘पंचायत’ की व्यवस्था हम बहुजन की देन है. पंचायत जब होती है तो उसमें सभी व्यक्तियों की राय होती है. आज की व्यवस्था सिर्फ दिल्ली में बैठे लोग तय करते हैं. बनारस, गाजीपुर के सुदूर गांव में व्यवस्थाएं क्या होंगी ये वहीं से तय हो जाता है. बहुजन समाज मानता है कि स्वराज से हमें न केवल अपने रीति-रिवाज, परंपरा, मूल्य हमें मिल जाएंगे बल्कि न्याय की व्यवस्थाओं के नए सूत्र भी मिलेंगे.
राम किशोर चौहान, देवरिया (किसान मजदूर मंच):
अपनी बात रखते हुए कहा कि सभी भारतवासी किसान, मजदूर, कामगार वास्तविक बहुजन हैं. देवरिया में रोड निकालने के नाम पर किसानों की जमीन की लूट का जिक्र किया, जिसमें भारतीय किसान यूनियन के साथ उनका संगठन इस लड़ाई में शामिल रहा.
रामदुलार प्रजापति, वाराणसी (शोषित समाज दल और अधिवक्ता):
बहुजन समाज में किसान भी हैं, बुनकर, गड़ेरिया, लेदर से काम करने वाले, मिट्टी से काम करने वाले, सबका पालन करने वाले बहुजन हैं. इस बहुजन का कभी बहुत सम्मान था. लेकिन धीरे-धीरे यह गुलाम हो गया. उन्होंने सामाजिक न्याय आन्दोलन और आरक्षण आन्दोलन के विविध चरणों की बात को रखा और इनके राजनीतिकरण की संकुचित धारा में बदलाव की स्थिति को रखते हुए इस बहुजन पंचायत से एक नई लकीर खींचे जाने की उम्मीद होने की बात रखी.
राजीव यादव, आजमगढ़ (किसान आंदोलन के नेता और रिहाई मंच के सचिव):
बहुजन की पहचान की बात करते हुए उन्होंने कहा कबीर, बुद्ध, गोरख से जोड़कर देखें तो बहुजन समाज का एक वृहत् आयाम बनता है. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज के नाम पर जाति वर्चस्व की लड़ाई रही है. राजनीतिक समीकरण अंतत: कहाँ ले जायेंगे ? यह सवाल है. बहुजन समाज की एकता के स्रोत खोजने और पनपाने के लिए ऐसी पंचायतों को लगाने की ज़रूरत को रखा.
राहुल राजभर, वाराणसी (समाज में सक्रिय युवा सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता):
बहुजन समाज की संकल्पना में एक ऐसे समाज की संकल्पना है, जिसमें सबकी भागीदारी का समाज बने. बहुजन के महापुरुष, उनके इतिहास और दर्शन की बात करके समता मूलक समाज को आगे बनाया जा सकता है. समाज को बांटने वाले विचार और नीतियों ने हमें अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपनी विरासत के बारे में गलत जानकारियाँ देकर, हमें भ्रमित किया है. बहुजन समाज को अपनी पहचान खुद बनानी है. इस पंचायत से निश्चित ही इसकी ऊर्जा मिलेगी.
विजय जवंधिया,नागपुर (किसान आंदोलन के नेता, शेतकरी संघटना के पूर्व अध्यक्ष और अंतरराज्यीय किसान समन्वय समिति के पूर्व अध्यक्ष):
अध्यक्ष मंडल की ओर से अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि बहुजनों की ताकत होनी चाहिए, बहुजनों का स्वराज होना चाहिए और बहुजनों का स्वराष्ट्र होना चाहिए. आज असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की लूट का जवाब नहीं. बहुजन ही इकट्ठा नहीं है. व्यवस्था ने बहुजनों को आपस में लड़ा कर रख दिया है. इन्हें एकजुट होने की जरूरत है.
जानकी भगत, बिहार (पुराने समाजवादी और अर्जक संघ के कार्यकर्ता):
अध्यक्ष मंडल की ओर से बोलते हुए कहा कि मैं अंबेडकर से सीखता हूं. गांधी से सीखता हूं. किसानों के सवाल पर टिकैत साहब के साथ जेल गया, बिहार में जगदेव प्रसाद मारे गए, उसके न्याय के लिए संघर्ष में मैं जेल भी गया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की संतान, सब की शिक्षा एक समान हो यह हम मानते है.
तीसरा सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के तीसरे सत्र की कार्यवाही
शाम 5.00 बजे से 6.30 तक
लेखक: अपर्णा (रंगकर्मी, पत्रकार, गाँव के लोग, वाराणसी)
विषय: समाज सृजन के कला मार्ग
अध्यक्ष मंडल: चित्रा जी (समन्वयक, विद्या आश्रम, राष्ट्रीय संयोजक, लोकविद्या जन आन्दोलन)
संचालक: रामजी यादव, वाराणसी (एंकर, गाँव के लोग, प्रकाशक अगोरा)
वक्ता: अपर्णा, संजीव, अंशिका
मैं कहता आखिन देखी तू कहता कागज की लेखी
तीन दिवसीय बहुजन स्वराज पंचायत के पहले दिन के तीसरे सत्र का नाम ‘समाज सृजन के कला मार्ग’ था.
लोक में कला बहुजन समाज की ही देन है. लेकिन इधर जब से नई तकनीकें जीवन पर हावी हुई हैं तब से भाषा और कला में ‘लोक’ का प्रभाव कम होता गया है, जबकि देखा जाए तो लोककला में बहुजनों के अनुभव और जीवन की बातें शामिल होती हैं. बहुजन समाज अपने अनुभव से ही सीखता है, उसका यही अनुभव उसका शास्त्र होता है. लोककवि व दार्शनिक कबीरदास हों या रैदास हों.
अंशिका, पटना, चित्रकला और कविता की कलाकार:
इस सत्र में अंशिका ने अपने विचार रखते हुए कला के बारे में बताया. जीवन के हर क्षेत्र और काम में कला समाहित है, चलना, उठना, बैठना, बात करना या फिर घर पर किए जाने वाला कोई काम ही क्यों न हो. कला भाव प्रधान होने के साथ सृजनात्मक होती है. अंशिका ने शुरुआत अपनी लिखी कविता से की.
संजीव दाजी, इंदौर (लोकविद्या समन्वय समूह और कलाकेन्द्र):
इस पंचायत शामिल होने आए संजीव दाजी ने कलाकारों का आवाहन करते हुए अपनी एक कविता “अरे, ओ कलाकार.. . सुनते हो?” सुनाई. इसके साथ मालवा के गांवों में जमीनी स्तर पर किए जा रहे कामों पर प्रकाश डालते हुए होने वाले बदलाव के बारे में उन्होंने बताया. साथ ही यह भी बताया कि कैसे वे आदिवासियों और बहुजनों से जुडते हैं. उन्होंने कहा कि किसान, कारीगर, महिलायें जो ज्ञानी हैं, जिनके पास ज्ञान का भंडार है, समाज उनको अज्ञानी मानता है. ऐसा ढांचा तैयार किया गया है कि उन्हें एक मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं माना गया है लेकिन सैकड़ों वर्षों से उनके ज्ञान को सँजोने और पुनर्जीवित करने का काम संतों ने किया. समाज के ये संत बहुजन समाज से ही आए, उन्होंने उनकी कलाओं और हुनर को तरजीह दी. इस पंचायत में मालवा के अलग-अलग गांवों से आए आदिवासी कलाकारों ने, जो प्रस्तुति दी, वह अद्भुत थी. जबकि उसमें से किसी ने भी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है. लेकिन उन्होंने संतों की जो बातें अपने संगीत के माध्यम से सामने रखीं, उससे यह साबित हो गया कि वास्तव में मौलिक ज्ञान भंडार बहुजनों के पास है.
संजीव जी ने बताया कि तीन वर्ष पहले इंदौर में लोकविद्या कला केंद्र की स्थापना की. इसका विस्तार आसपास के गांवों में भी किया जा रहा है. गाँव-गाँव जाकर इनकी बातें और ज्ञान को लेकर छोटी-छोटी फिल्में बनाने का काम कर रहे हैं जिससे लोग अपने तरीके से अपनी बातें कहते हुए लोकविद्या के दर्शन को कैसे समझ रहे हैं, उनकी क्या सोच है, इस बात को सामने रख रहे हैं. ‘नई सोच नया करें’ के अंतर्गत गांवों और शहरों के लोकविद्या ज्ञानियों को जोड़कर लगातार प्रयोग किए जा रहे हैं और उसमें सफलता भी मिल रही है. इस तरह संजीव जी और सप्रे जी लगातार लोकविद्या ज्ञान की खोज करते हुए उसे सहेजने के काम में लगे हुए हैं. अपना वक्तव्य एक कविता से समाप्त किया.
सत्र के संचालक रामजी यादव (गाँव के लोग और अगोरा प्रकाशन):
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए रामजी यादव ने बताया कि ‘लोकविद्या जन आंदोलन’ और ‘गाँव के लोग’ के संयुक्त सहयोग से पूर्वाञ्चल के लोकगायकों खासकर बिरहा कलाकारों का कार्यक्रम आयोजित किया गया. ‘बिरहा में कबीर’ को गवाया गया, नए प्रयोग के साथ नई शुरुआत की गई. इसमें रैदास के पदों को भी गाने की योजना है. ये कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में शुरू किये जा चुके हैं. विद्या आश्रम पर भी तीन प्रस्तुतियां हो चुकी हैं.
अपर्णा, वाराणसी (रंगकर्मी और पत्रकार):
अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के जिस रायगढ़ शहर से वे आती हैं, वहाँ उन्हें बहुजन समाज को लेकर जाति भेद का कोई ऐसा अनुभव नहीं हुआ, जिसे जातिगत भेदभाव कहा जाता है. वास्तव में उत्तर प्रदेश में जाति की राजनीति को करीब से देखने को मिला. पूरे देश में जातिवाद को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं, वह दिल दहलाने वाली हैं. अपनी बात में उन्होंने कहा कि वास्तव में बहुजन द्वारा अपने ज्ञान और कला के माध्यम से किए जा रहे काम ही हैं जो देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. उनके पास अपनी मौलिक कलाएं हैं, जिनमें वे पारंगत है, उसे सीखने के लिए किसी तरह की किताब की जरूरत नहीं होती. साथ ही एक गुण और है, उनमें तृष्णा की प्रवृत्ति नहीं होती, वह कल की चिंता नहीं करते – जैसे आदिवासी समाज जंगल के पास रहते हुए केवल आज की जरूरतों के लिए ही चीजें लेते हैं.
अपनी बात कहने के बाद उन्होंने कथाकार रामजी यादव की कहानी, कहानी संग्रह ‘आधा बाजा ‘से ली हुई कहानी ‘परजुनियाँ’, का पाठ किया. कहानी के केंद्र में बहुजन नायक सोभा नाई हैं, जो समाज के हर वर्ग के लोगों को सुंदर बनाने का काम करते हैं. लेकिन अपने ज्ञान में पारंगत होने के बाद भी उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. सोभा नाई जो बारात में जाने वालों की बाल-दाढ़ी बना रहे होते हैं, इस उम्मीद से कि इस काम में यहाँ से चार पैसे ज्यादा आमदनी हो जाएगी. लेकिन दल्लू अहीर बारात में जाने का झूठ कहते हुए जबरदस्ती सोभा नाई से बाल बनवाने के लिए अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते.
अंत में इस सत्र की अध्यक्षता कर रही चित्रा सहस्रबुद्धे ने अपनी बात की शुरुआत करते हुए बताया कि बहुजन समाज का कला से क्या रिश्ता है. यह सवाल लगातार उठ रहा है. कला क्या है, किस प्रकार का ज्ञान है? क्या यह किसी विचार को प्रस्तुत करने का माध्यम मात्र है? कला क्या ऐसी कोई विधा है जो मनुष्य में पैदाइशी आती है. कला को यदि विद्या मानें तो सवाल उठता है कि यह किस तरह की विद्या है? इन सवालों पर विचार शुरू हुआ. आज जो समाज है, उसमें बहुजन समाज में बहुत सी जातियाँ हैं, जिनमें आपसी संघर्ष हैं. यह सच्चाई है लेकिन पूरे बहुजन समाज को राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र से एकदम बाहर कर दिया गया है यह भी सच्चाई है. तो इसका क्या रास्ता हो सकता है? इस पर विचार करते हुए हम कहते हैं कि बहुजन स्वराज में इसका एक रास्ता मिल सकता है, इसमें देखना होगा कि बहुजन समाज के पास शक्ति के कौन से स्रोत हैं? राजनैतिक दृष्टि से देखने पर उत्तर प्रदेश और बिहार में जाति को लेकर चीजें दिखाई देती हैं लेकिन आधुनिक राजनैतिक स्तर पर दुनिया में हर जगह गैर बराबरी को लेकर स्थितियाँ बिगड़ी हुई हैं. कोई रास्ता नहीं सूझता लेकिन बहुजन स्वराज पंचायत यह कहती है कि कमजोरियों पर अपनी इमारत खड़ी नहीं हो सकती, बहुजन समाज की शक्तियों पर उनकी अपनी इमारत बनती है. बहुजन समाज के पास क्या है जिसके बल पर स्वराज खड़ा होगा? जब इसकी बात करते हैं तो कला के इस सत्र में इस बात को मैं कहना चाहती हूँ कि समाज निर्माण के अनेक मार्ग दिखाई देते हैं. उससे भी आगे यह बात है कि स्वराज चेतना की बातें कला के द्वारा कैसे दिखाई देंगी? आज जो समाज व्यवस्थाएं हैं, जिनमें आधुनिक राजसत्ता, विज्ञान और पूंजी का गठबंधन है, इस गठबंधन ने सारी जातियों को लक्ष्य बनाया है, उन्हें भ्रमित किया है और इन व्यवस्थाओं में कुछ लोगों का ही विकास हो रहा है. इसमें बहुजन समाज को शामिल नहीं किया गया है. हम खोज रहे हैं कि बहुजन समाज जब स्वराज की बात करेगा तो कौन से लक्ष्य रखेगा? निश्चित ही इस गठबंधन को चुनौती देने का लक्ष्य रखेगा. कला के मार्ग से उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त करेगा? हम कहते हैं कि स्वराज चेतना का एक स्रोत कला में होता है, जो इस लक्ष्य को प्राप्त करने का माध्यम बन सकता है. बहुजन समाज की हर गतिविधि कलापूर्ण होती है. उन्होंने कला में निहित ज्ञान के प्रकार किस तरह व्यापक एकता, स्वायत्तता, भाईचारा और सहजीवन के मूल्यों को संजोते हैं, इसकी बात की.
दूसरे दिन 08/10/2025, सुबह 10.00-11.00
लोकविद्या सत्संग
दूसरे दिन की शुरुआत इंदौर से आई सत्संग मंडली के द्वारा लोकविद्या सत्संग से हुई. बहुजन स्वराज पंचायत में इंदौर से लगभग पचास की संख्या में मालवा-निमाड़ के विविध गाँवों की सत्संग मंडलियों से लोग आये थे. इनमें घनशामभाई भाबर, किशोर महाराज, पद्म नायक, कन्हैया महाराज, गणेश बुंदेला, जगदीशबाबा, बिलमनभाई बडोदिया, राजरत्नम महाराज, कुंजीपटल, करनभाई, शिवराम, परसराम, रवीना, गंगाबाई, देवानबाई की सदारत में अन्य साथियों के साथ सत्संग हुआ.
चौथा सत्र
दूसरे दिन 08/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
सुबह 11.00 बजे से भोजन तक
लेखक: रामजनम
विषय: स्वराज
अध्यक्ष मंडल: कृष्ण गांधी, झाँसी, उत्तर प्रदेश (किसान आन्दोलन में सक्रिय, पूर्व समन्वयक, अंतर्राज्यीय किसान आन्दोलन समन्वय समिति, लोकविद्या जन आन्दोलन) और अवधेश, सिंगरौली, मध्य प्रदेश (समाजवादी नेता और सिंगरौली में विस्थापन विरोध के जुझारू नेता, अध्यक्ष, लोकहित समिति. सिंगरौली)
संचालन: रामजनम, वाराणसी (किसान नेता, स्वराज अभियान और लोकविद्या जन आन्दोलन)
वक्ता: शिवराम कृष्णन, अक्षय कुमार, राजेंद्र मानव, रामजी सिंह, आर्यमन, शिवदास
शिवराम कृष्णन, बंगलौर (समाज शास्त्र के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक और विद्या आश्रम के न्यासी):
शिवराम कृष्णन जी ने हिंदी में बोलने की अपनी असमर्थता व्यक्त की. आर्यमन (पगडण्डी समूह) ने उनके वक्तव्य का हिंदी में अनुवाद किया. शिवराम कृष्णन ने कहा कि मैं लंबे समय से बहुजन-समाज से जुड़ा हूँ. उन दिनों इस समाज को बहुजन नहीं कहा जाता था. मैं आमतौर पर किसी ऐसे आंदोलन या संगठन से जुड़ा रहा हूँ, जो सामान्य लोगों से जुड़ा हो. एक वामपंथी होने के नाते भी मैं कई तरह की गतिविधियों में भाग लेता रहा हूँ और बाद में जब मैं पीपीएसटी में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल हुआ, तो धर्मपाल जी की प्रेरणा से भारतीय समाज में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता के तहत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में बात की. सुनील सहस्त्रबुद्धे बहुजन-समाज और विशेष रूप से लोकविद्या के इस तर्क के साथ आए, जो भारत में हमारे आंदोलन का केंद्र बिंदु बना है, खासकर बुद्धिजीवियों का, जो हतोत्साहित हैं. इसमें कुछ बहुत ही चौंकाने वाली बात थी कि हम सभी विश्वविद्यालय से निकले हैं, हम सभी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षित हैं, हालाँकि हमें अशिक्षित और कम पढ़े-लिखे लोगों से सहानुभूति थी. लेकिन हमने उन्हें ज्ञान के वाहक के रूप में नहीं देखा, यह नहीं देखा कि वे अपने तरीके से ज्ञान का उत्पादन करने और समाज को बदलने में सक्षम हैं. हमने उन्हें मूल रूप से उपभोक्ता या बाहुबल, ताकत, मेहनत के बल पर काम करने वाला श्रमिक माना. मुझे लगता है कि सुनील सहस्त्रबुद्धे की दूरदर्शिता ही थी कि 1990 के दशक के मध्य में, उन्होंने ‘लोकविद्या’ का यह तर्क गढ़ा कि प्रत्येक साधारण व्यक्ति के पास ज्ञान का एक अंश है, और यह ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है.
अक्षय कुमार, उड़ीसा (नवनिर्माण किसान संघ):
बहुजन स्वराज पंचायत में स्वराज पर अपनी बात रखते हुए उड़ीसा से आये हुए किसान नेता अक्षय कुमार ने कहा कि अंग्रेज आने के पहले भारतीय समाज स्वराज पर खड़ा था. समाज व्यवस्थाओ के मूल में स्वराज था और खेती इस व्यवस्था के केन्द्र में थी. शिल्प, वाणिज्य और संस्कृति का खेती से गहरा नाता था. अंग्रेज के जाने के बाद आजाद भारत अंग्रेजो के ढाँचे पर आगे बढ़ता रहा. 1990 मे वैश्वीकरण बाद वैश्विक पूंजी केन्द्र में आ गई और भारत मे स्वराज की रीढ़ टूट गई. हमें अपने कामों में वैश्विक पूंजी को चुनौती देना आवश्यक है. इसके बिना कोई नई स्वदेशी राजनीति नहीं खड़ी हो सकती.
राजेंद्र मानव, वाराणसी (किसान नेता और बहुजन कार्यकर्त्ता):
राजेन्द्र मानव ने कहा कि बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय का सपना अभी अधूरा है. इस सपने की तरफ बढ़ने के लिए बहुजन एकता जरूरी है. बराबरी और खुशहाली का समाज यानि समतामूलक समाज बहुजन समाज का पैगाम है. मानव जी ने बहुजन समाज पर स्वरचित कविता का पाठ भी किया.
रामजी सिंह, वाराणसी (किसान सभा वाराणसी के जिलाध्यक्ष):
साथी ने कहा कि भारत में आजादी आंदोलन और विभिन्न अंचलों में सामंतो के खिलाफ आंदोलन का मकसद भी स्वराज ही था. इन आन्दोलनों के नायकों ने ऐसे ही मन्तव्य समय-समय पर पेश किए है. दुनिया राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं के जाल में फंसे बहुजन समाज की मुक्ति के लिए बहुजन स्वराज पंचायत को आगे बढ़ाने की जरूरत है. बनारस के आसपास जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले किसान नेता रामजी ने कहा कि बहुजन स्वराज पंचायत को आगे ले जाने के लिए मेरा सक्रिय योगदान रहेगा.
आर्यमन, दिल्ली (पगडंडी समूह) :
युवा साथी आर्यमन ने शिक्षा, विकास की अवधारणा, न्याय, नैतिकता और जीवन शैली को रेखांकित करते हुए कई अहम सवाल खड़े किए.
शिवदास, वाराणसी, (युवा पत्रकार):
साथी ने सामाजिक न्याय, आरक्षण, संविधान और जाति के सवाल उठाये और कहा कि इन सवालों को बिना हल किए खुशहाली और बराबरी या स्वराज की बात आगे नही बढ़ सकती है.
अवधेश, सिंगरौली (लोकहित समिति):
अध्यक्ष मंडल के सदस्य ने सिंगरौली में विस्थापन विरोध के आन्दोलनों का गहरा अनुभव प्रस्तुत कर कहा कि इस देश का बहुजन समाज या लोकविद्या-समाज सृजनकर्ता और पालनहार है. इस समाज का जल, जंगल और जमीन से गहरा रिश्ता है. दूसरी तरफ पढ़े लिखे लोग या प्रोफेशनल क्लास है, जिसका रचना, सृजन और निर्माण में नगण्य योगदान है. तमाम जनसुनवाई और कार्यक्रम और आंदोलन से महसूस होता है कि सामान्य जन की चेतना और तेवर बढ़ा है और इसे बहुजन स्वराज के विचार के साथ आगे बढ़ने के अवसर भी हैं.
कृष्ण गांधी, झाँसी (किसान आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी, विद्या आश्रम के न्यासी, फिज़िक्स के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक) :
अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि स्वराज कही दूर का लक्ष्य नही है, यह लोगों की ज़िन्दगी में रचा बसा है. यह बात हवा में नही कही जा रही है. स्वराज हमारे आसपास समाज के लोगों की विभिन्न परम्परओं में मौजूद है. स्वराज लक्ष्य नही है, यह मार्ग ही है. अनेक उदाहरणों और आन्दोलन के अनुभवों से उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट किया.
अंत मे खुला सत्र हुआ जिसमें अरुण कुमार, वाराणसी और विजय जावंधिया, नागपुर ने भाग लिया.
पाँचवाँ सत्र
दूसरे दिन 08/10/2025 के दूसरे सत्र की कार्यवाही
दोपहर 3.00 बजे से 5.00 बजे तक
लेखक: हरिश्चंद्र केवट
विषय: स्वराज
अध्यक्ष मंडल: अरुण, वाराणसी (जयप्रकाश आन्दोलन के जुझारू कार्यकर्त्ता) और जे.के. सुरेश, बंगलुरु (संयोजक, लोकविद्या वेदिके, बंगलुरु, विद्या आश्रम के न्यासी, इनफ़ोसिस से अवकाशप्राप्त इंजीनियर)
संचालन: हरिश्चंद्र केवट, वाराणसी (लोकविद्या पत्रकार, सचिव, माँ गंगाजी निषाद सेवा समिति)
वक्ता: लक्ष्मण प्रसाद, रामस्वरुप सिंह, रामजी यादव, एकता शेखर, नवदीप, प्रह्लाद सिंह पटेल
लक्ष्मण प्रसाद, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन):
लक्ष्मण ने लंबे समय से लोकविद्या कार्यकर्ता के रूप में, किसान, कारीगर, आदिवासी के बीच काम किया हैं. अपने वक्तव्य में उन्होंने लोकविद्या समाज की ज्ञान आधारित व्यवस्थाओं पर प्रकाश डाला. आपने कहा कि, बहुजन समाज में न्याय, त्याग, भाईचारा, करूणा, सहिष्णुता, बंधुता जैसे अनेक बुनियादी मानवीय मूल्य होते हैं और तमाम तरह के सद्गुण भी. बहुजन समाज में संतों की एक लंबी कतार है, जिसमें कबीर, रविदास, तुकाराम, नानक, नामदेव आदि हैं, जो समाज की शक्ति को जागृत करने का काम किए. बहुजन समाज की इन ज्ञान आधारित व्यवस्थाओं की एक झलक हम हाल ही में हुए किसान आन्दोलन में देख चुके हैं.
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोक और सरकार के बीच ऐसा कोई माध्यम नहीं है, जिससे कि आपस में वार्ता हो सके. बिजली, पानी, दाम, भूमि-अधिग्रहण इत्यादि मुद्दों को लेकर किसानों का आंदोलन चलता रहता है. तीन काले कृषि कानून के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीनों तक ऐतिहासिक आंदोलन चला. अगर सरकार लोक की होती तो निश्चित रूप से सरकार और किसानों के बीच वार्ता के मार्फत कोई हल निकल जाता. किसानों की ही तरह कारीगर, आदिवासी, महिलाएं, छोटे-छोटे दुकानदार,इत्यादि समूचा बहुजन समाज अपनी-अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं.
हमारे यहां का लोकतंत्र पश्चिमी देशों के लोकतंत्र की अवधारणाओं की नकल है. अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए ऐसा लोकतंत्र बनाया गया है. इसमें लोक का तंत्र नहीं है. स्वराज के लिए ‘लोक का तंत्र’ आवश्यक है. अर्थात लोक और सरकार के बीच की दूरी समाप्त हो जाय.
स्वराज में पंचायत की व्यवस्था होती है. सारे निर्णय पंचायत में लिए जाते हैं और यह प्राय: सर्वमान्य होता है. पंचायत में निर्णय की प्रक्रिया बहुत ही सहज,सरल और सबके सामने होती है. यहां पर संबंधित पक्ष का कोई भी व्यक्ति एक भी झूठ बोलने में कांपने लगता है. सभी पक्ष मौजूद होते हैं. झूठ बोलते ही कई व्यक्ति उठ खड़े होंगे और झूठ बोलने वाले व्यक्ति को घेर लेंगे. उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों का जवाब दे पाना झूठे व्यक्ति के लिये असंभव हो जाएगा. आज के न्यायालय में कोई भी व्यक्ति सफेद झूठ बोल सकता है. इतना ही नहीं वहां टोकने वाला कोई नहीं. गवाह और जमानतदार पैसे पर खरीदे जाते हैं. ये सारी दुर्व्यवस्थाएं पंचायत में संभव नहीं. पंचायत स्वराज का एक स्तंभ है, जो आज तक कायम है. इसे अनेक स्थानों पर, अनेक समाजों में, जाति पंचायतों में जीवंत रूप में देखा जा सकता है. पंचायतें समानता का बहुत बड़ा प्रतीक हैं.
बहुजन समाज के पास उपलब्ध ज्ञान और विद्या पर आधारित व्यवस्था स्वराज के लिए आवश्यक है. बहुजन के ज्ञान के आधार पर बनाई गई व्यवस्था ही बहुजन के हित में हो सकती है. बहुजन समाज स्वाभाविक तौर पर ज्ञानी होता है. किसान हों, कारीगर हों, आदिवासी हों, स्त्रियां हो, छोटी पूंजी के दुकानदार हों- सभी किसी न किसी रचना और सृजन और उत्पादन के काम में लगे हैं. रचना और सृजन के कार्य ज्ञान के बिना नहीं हो सकता. कबीर दास की वाणी है कि तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी. बहुजन समाज इसे चरितार्थ करता है.
स्वराज की व्यवस्था “लकीर का फकीर” नहीं, एक जीवंत प्रक्रिया की परिकल्पना है. बहुजनों की पहल पर स्वराज निर्माण से ही समाज और देश का कल्याण संभव है.
नवदीप, हरियाणा (शोध छात्र):
उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि, इस पंचायत में सम्मिलित होकर बहुजन समाज की शक्ति को जाना और किस तरह से इस शक्ति का आधार लोकविद्या में है, इसे भी भलीभांति समझा. युवा पीढ़ी को आधुनिकता के साथ-साथ लोकविद्या के मूल्यों को भी उतना ही महत्व व सम्मान देना चाहिए. नवदीप इसके पीछे का कारण बताते हैं कि आधुनिकता और शहरी रहन-सहन से ज्यादा जब हम लोकविद्या का महत्व समझेंगे तब जाकर बहुजन स्वराज मजबूत स्थिति में खड़ा किया जा सकेगा. नवदीप दिल्ली में हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन में पूरा समय उपस्थित रहे. इस आन्दोलन के बारे में वे अपने अनुभव साझा किए और बताया कि हम जानते थे कि सरकार इतनी आसानी से काले कानून वापस नहीं लेने वाली है. इसलिए हम अपना राशन और अन्य सामान साथ लेकर चले थे और सड़क पर ही अपने गांव बसा लिए थे. कुछ ही दिनों में इस देश के बहुजन समाज के बल पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया और यह पर्यटन स्थल की तरह बन गया. इस आंदोलन की सबसे बड़ी बात महिलाओं की भागीदारी रही और हर परिस्थितियों में उनका समर्थन और सहयोग मिला.
रामजी यादव, वाराणसी (एंकर, गाँव के लोग) :
आपने अपने वक्तव्य की शुरुआत बहुजन शब्द को परिभाषित करते हुए किया. आपका मानना है कि सदियों से बहुजन समाज ने सभी को अपना माना है, सभी के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम करता चला आ रहा है. आज बहुत तरह के संगठन और राजनीतिक पार्टियां बहुजन समाज के नाम पर बन गई हैं, लेकिन बहुजन समाज आज भी बदहाली में जी रहा है. लोकविद्या को ख़त्म करने में आधुनिक मशीनों और हरित क्रांति को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा लेकिन लोकविद्या मरती नहीं है.
राम सूरत सिंह (भारतीय किसान यूनियन के नेता):
भारतीय किसान यूनियन के नेता हैं और संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आपने अपने वक्तव्य में कहा कि, मनुष्य एक चेतन प्राणी है और वह अपनी चेतना के बल पर कार्य करता है. आज देश को आजाद हुए लगभग 78 वर्ष होने को आया. जो न्याय की परंपरा गांव में थी वह पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है, देश का राजस्व विभाग जानबूझकर लोगों को कचहरी के चक्कर कटवा रहा है जबकि 13 ग्राम सभाओं को मिलकर गांव में न्याय पंचायते होती थी, जिसमें जमीन पर बैठकर फैसले हुआ करते थे. किसी भी जनप्रतिनिधि से मिलने के लिए आम जनता को आज मौका नहीं मिलता. अगर कोई मिलने की कोशिश भी करता है तो पुलिस उसे जेल में बंद कर देती है. वहीं धार्मिक आयोजनों में जनता के ऊपर फूल बरसाए जाते हैं. ये किस तरह की व्यवस्था है?
एकता शेखर, वाराणसी (पर्यावरण आन्दोलन):
एकता पर्यावरण कार्यकर्ता हैं और विद्या आश्रम के साथ काफ़ी समय से जुड़ी हुई है. अपने वक्तव्य में आपने कहा कि लोकविद्या दर्शन समाज निर्माण का आधार है, आज जिस तरह के न्यायपूर्ण समाज की हम कल्पना कर रहे हैं, वह पहले भी था, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में सब कुछ समाप्त करने की होड़ मची हुई है. एकता जी ने सिंगरौली में अपने किए गए कार्यों के दौरान हुए अनुभवों को साझा करते हुए आदिवासी समाजों में प्रकृति के साथ सहजीवन और समाज के अन्दर सहजीवन के मूल्यों को उजागर किया. उन्होंने कहा कि बहुजन स्वराज के निर्माण में इन समाजों से बहुत कुछ सीखने के लिए है.
अमरनाथ यादव, वाराणसी (कृषि भूमि बचाओं समिति):
आपने बहुजन स्वराज पंचायत को बनाने में सहयोग आकारने की बात की.
प्रह्लाद सिंह पटेल, मिर्जापुर (भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश सचिव, उत्तर प्रदेश):
आपने अपने वक्तव्य में विद्या आश्रम में आने के चलते अपनी बदली चेतना के बारे में बताया और परिवर्तन के रास्ते क्या होंगे, उनकी समझ पुख्ता होने की तरफ बढ़ने में लोकविद्या विचार ने कैसे मदद की उसका वर्णन किया.
जे. के. सुरेश, बंगलूरु (विद्या आश्रम न्यासी, लोकविद्या वेदिके संयोजक, इनफ़ोसिस से अवकाशप्राप्त इंजीनियर):
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य की शुरुआत करतें हुए उन्होंने अपने लोकविद्या विचार के बनने के दौर को याद किया. उस दौर में जिसे बहिष्कृत समाज कहा जाता था और जिनकी संख्या लगभग 90% के करीब थी, उनसे उनके प्राकृतिक संसाधन को छीना जा रहा था; और उन्हें पश्चिमी समाज की तरह बनाने की कोशिश की गई. पिछले 250-300 सालों से लोकविद्या समाज का लगातार दमन किया गया लेकिन फिर भी हम आज यह सोचने पर मजबूर हैं कि इस दमन के बावजूद समाज में आज भी अपनी ज्ञान परंपराएं जीवंत हैं. जिसमें कृषि, चिकित्सा, निर्माण, कारीगरी आदि आती हैं. यह लोकविद्या समाज अपने आत्मसम्मान को बचाए रखते हुए अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है. इनकी ताकत को समझने की ज़रूरत है. आज इसी के बल पर हम अन्याय के खिलाफ लड़ सकते हैं, नया कुछ बनाने के लिए भी हमें इसी ताकत में विश्वास बढ़ाना है.
अरुण, वाराणसी (जयप्रकाश आन्दोलन के कार्यकर्त्ता और लोकविद्या आन्दोलन के सहयोगी):
अध्यक्षता कर रहे अरूण जी ने एक जन गीत गाकर सत्र का समापन किया.
तीसरे दिन 09/10/2025
सुबह 9.30 से 10.30 तक
लोकविद्या सत्संग
लक्ष्मण प्रसाद और सामू भगत की सदारत में लोकविद्या के बोल व पद गाये गए.‘’भरम जार के बार दे मनवा’, “घूँघट के पट खोल रे”, “जागु-जागु जंजाली मनवा” और “मोरा हीरा हेराय गयो कचरे में” पद गाकर पंचायत का समाँ बाँध दिया.
छठा सत्र
तीसरे दिन 08/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
दिन में 3.00 बजे से 5.00 बजे तक
लेखक: पारमिता, वाराणसी
विषय: आगे की बात और समापन सुबह 10.30 से दोपहर 1.30 तक
अध्यक्ष मंडल: सुनील सहस्रबुद्धे, वाराणसी और प्रवाल सिंह, वाराणसी
संचालक: पारमिता, वाराणसी
इस सत्र में कोई वक्ता नहीं थे बल्कि खुली चर्चा रखी गई. पिछले दो दिन के सत्रों में चली विचार प्रक्रिया के चलते नीचे दिए दो बिन्दुओं पर बहस केन्द्रित करने का आग्रह किया गया.
1-बहुजन स्वराज पंचायत बनाने की ओर कदम
2-बहुजन ज्ञान विमर्श/संवाद: शोध उपक्रम की रूपरेखा
पारमिता, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन की कार्यकर्त्ता और संयोजक, नागरिक समाज वाराणसी):
सत्र का संचालन करते हुए पारमिता ने आए हुए लोगों का आवाहन किया कि जो बहुजन स्वराज पंचायत के विचार को आगे की दिशा में ले जाना चाहते हैं, अपनी दृष्टि पंचायत में रखें. इसे आगे कैसे बढ़ाया जाए, इसके लिए कार्यक्रम बनाने में सहयोग करें.
बहुजन ज्ञान विमर्श/संवाद – एक शोध उपक्रम की रूपरेखा:
बहुजन ज्ञान विमर्श/ संवाद के नाम से विद्या आश्रम समूह द्वारा शुरू की गई शोध कार्य की रूपरेखा और उसकी प्रगति चित्रा जी ने प्रस्तुत की. उन्होंने कहा कि बहुजन स्वराज पंचायत का लक्ष्य सबके हित का स्वराज बनाना है. जब तक न्याय, त्याग और भाईचारा के मूल्य समाज के पुनर्निर्माण की क्रियाओं में निहित नहीं होंगे तब तक हम बहुजन हिताय बहुजन सुखाय स्वराज बना नहीं पाएंगे. नैतिक ज्ञान किसी भी समाज की रीढ़ होती है. नैतिक ज्ञान बहुजन समाज में बसता है और समाज के ज्ञान (लोकविद्या) में समाहित होता है. साइंस के आधार पर नैतिक ज्ञान नहीं पैदा किया जा सकता.
लोकविद्या दृष्टिकोण किसी को ‘दुश्मन’ नहीं देखता/मानता. वर्तमान समय में बहुजन समाज में जातियां जड़/स्थिर चौखट की तरह दिखाई दे रही हैं, जिनके बीच निरंतर घर्षण है यह पश्चिम से आयातित ज्ञान के नज़रिए को अपनाने का नतीजा है. इस नज़रिए में बहुजन समाज अनेक समाजों में बंटा हुआ दिखाई देता है. विश्वविद्यालय में पढाये गए ‘समाज शास्त्र‘ के सहारे समाज की समझ ऐसा नजरिया बना दे रही है. बहुजन की दृष्टि से देखें तो बहुजन समाज विविध समाजों से बना है और इसका बनना एक जैविक क्रिया के समान है. जैसे जंगल में पुराने पेड़ मरते हैं और नए जन्म लेते हैं. उसी प्रकार समाज में भी नए समाज जन्म लेते हैं और पुराने मरते हैं. लोकविद्या आन्दोलन से जुड़ा समूह बुद्धिजीवी नहीं है,
अनेक जन संघर्षों/आन्दोलनों में भागीदारी के साथ बहुजन स्वराज पंचायत के विचार पर यह समूह पहुंचा है. पिछले दो वर्षों से इस शोध कार्यक्रम पर यह समूह कार्य कर रहा है. लोकविद्या और सामान्य जीवन के गतिशील रिश्तों के आधार पर बहुजन समाज की शक्तियों का एक भाव पूर्ण आकलन करने का प्रयास है, जो आज की अन्यायी व्यवस्थाओं और परिस्थितियों से मोर्चा ले सके. इसके लिए बहुजन, स्वराज, सामान्य जीवन और लोकविद्या ये चारों मिलकर हमारे लिए साधन हैं, मार्ग हैं, कसौटी है और लक्ष्य भी.
बहुजन समाज का एक नया नैरेटिव बनाने की ओर ये कदम है. यह सामाजिक न्याय आन्दोलन और आर्थिक बराबरी के आन्दोलन के जुड़वां उद्देश्यों को समाहित करता आगे का कदम है. आज वित्तीय पूंजी, तकनीकी, आर्थिक व्यवस्था और राज्यसत्ता इन सबका ‘ज्ञान’ आधार एक ही ‘साइंस’ में है. इस शोधकार्य के माध्यम से इस अन्यायी गठबंधन को चुनौती देने के मार्गों को बनाने के प्रयास हैं.
पिछले कुछ वर्षों से विद्या आश्रम से इस शोध कार्य को आकार देने की दिशा में तीन तरह की गतिविधियाँ चल रही हैं.
- वर्ष 2020 से कोविड के चलते हुए लॉक डाउन और किसान आन्दोलन के सन्दर्भों के साथ ऑनलाइन चर्चा चलाई गई. ये साप्ताहिक चर्चाएँ सामान्य जन और लोकविद्या के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठे विविध प्रश्नों, प्रसंगों और नीतियों पर निरंतर अभी तक चल रही हैं. इन चर्चाओं का रिकॉर्डिंग/ट्रांसक्रिप्शन के लिंक विद्या आश्रम की वेब साईट पर उपलब्ध हैं.
- बहुजन समाज के बीच जाकर बहुजन ज्ञान संवाद चलाया गया. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र और वाराणसी के आस-पास विविध कार्यक्रम हुए. बौद्धिक सत्याग्रह ज्ञान पंचायत, और लोकविद्या सत्संग के साथ इस ज्ञान संवाद/विमर्श को चलाया गया.
- बहुजन शोध पत्रिका के रूप में ‘सुर साधना’ का प्रकाशन होता है.
इस शोध कार्यक्रम के लक्ष्य और कार्य पद्धति विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध से भिन्न हैं. कुछ अवधारणाओं के तहत कार्य आगे बढ़ा है उनमें प्रमुख हैं-
- सामान्य जीवन की परंपरा बहुजन समाज की जीवन परंपरा है.
- लोकविद्या की परंपरा बहुजन समाज की ज्ञान परंपरा है.
- स्वराज की परंपरा बहुजन समाज की राज परंपरा है.
- संत परंपरा बहुजन समाज की दर्शन परंपरा है.
- बहुजन समाज में विधि-विधान की परंपरा, पंचायत की परंपरा है.
- समाज में छोटी पूंजी से अपना कारोबार चलाने की बहुजन समाज के लोगों की जो समझ और व्यवस्था है, वह उनकी अर्थनीति का आधार है.
- बहुजन समाज में हर गतिविधि कलापूर्ण है.
- बहुजन समाज में तर्क का प्रकार भावपूर्ण है.
अंत में उन्होंने कहा कि यह बहुजन स्वराज पंचायत इस कार्य को अपने हाथ में ले, इसका विस्तार करे, और बहुजन स्वराज बनाने के मार्ग गढ़े.विभिन्न अंचलों में बहुजन स्वराज पंचायतों के आयोजन हों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर बहुजन समाज का नया नरेटीव बनाने के कदम उठें.
इसके बाद खुली चर्चा हुईं, जिसमे अनेक लोगों ने अपने विचार रखे और अपनी पहल के बारे में बातें रखीं.
जानकी भगत:
समाजशास्त्र जो पढ़ाया जाता है,उसमें समाज की बुराइयों का अवलोकन किया जाता है. विश्वविद्यालय के लोग समाज धर्म की परिभाषा भी नहीं जानते.
अवधेश कुमार:
सिंगरौली का क्षेत्र लोकविद्या के दृष्टि से जानने के लिए बहुत उपयुक्त है.
अरुण कुमार:
लोकविद्या सामान्य लोगों की आवाज बन सकती है.
विजय जांवधिया:
पैसे की लफंगा गिरी पर समाज का नियंत्रण चाहिए. बहुजन ही संपत्ति का निर्माण करता है. वितरण का कार्य राज्य सरकार करती है. सही ढंग से वितरण न हो पाने के कारण आज बहुजन समाज संकट में है.
रामजनम:
इस पंचायत को आगे बढ़ाने के लिए एक समिति बने. इस बहस को दूसरे अंचलों में ले जाने की कार्य योजना बने और एक संरक्षक मंडल बने.
लक्ष्मी चंद दुबे:
सिंगरौली जिले में बहुत सारे कारखाने हैं. मजदूर की हालत चिंताजनक है. पूंजी पति की पूंजी बढ़ती जा रही है. हम अपने क्षेत्र में एक बहुजन स्वराज पंचायत करेंगे.
राम किशोर चौहान:
समाज में हुए संत आंदोलन के संतों के विचार और पदों को संकलित/समाहित करना चाहिए. हम अपने जिले देवरिया में एक बहुजन स्वराज पंचायत का आयोजन करेंगे.
रामजी यादव:
हम बहुजन समाज के कलाओं के दस्तावेजीकरण का काम कर रहे हैं. हमें यह लगता है कि हम गांव की ओर जाएं और गांव के लोगों की बातों को सुने. उनके अंदर अपने ज्ञान और श्रम को लेकर कैसे आत्मविश्वास पैदा हो यह कोशिश करनी चाहिए.
अक्षय कुमार:
समाज माइक्रोफाइनेंस के माध्यम से छोटे-छोटे कर्ज में फस गया है. हमें इस विषय पर भी विमर्श करना चाहिए कि कैसे बहुजन समाज के लोग कर्ज के इस जाल से मुक्त हों.
विनोद चौबे:
इसके नाम से मैं बहुत सहमत नहीं हूं. लेकिन मैं इसके विचार से पूरी तरह सहमत हूं. मैं अपने क्षेत्र में एक बहुजन स्वराज पंचायत का आयोजन करूंगा.
राजेंद्र मानव:
बनारस में रिंग रोड के पास विस्थापन का काम हो रहा है. वहां पर भी एक बहुजन स्वराज पंचायत करवाने की जिम्मेदारी लेता हूं.
हरिश्चंद्र केवट:
मैं घाट पर और जिन क्षेत्रों में मैं काम करता हूं, वहां पर मैं अधिक से अधिक संख्या में बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित करूंगा.
संजीव कीर्तने, फज़लुर्रहमान अंसारी, एहसान अली, आर्यमन, लक्ष्मण प्रसाद इत्यादि लोगों ने भी अपनी बात रखी. कोलकाता से आये विद्या आश्रम के मूल सदस्य अभिजीत मित्र ने खुली चर्चा में हिस्सा लिया और बहुजन स्वराज पंचायत के विचार का समर्थन किया और कोलकोता में इस विचार को आगे बढ़ाने की बात की.
निकट भविष्य में निम्नलिखत व्यक्तियों ने बहुजन स्वराज पंचायतों के आयोजन की जिम्मेदारी लेने की घोषणा की.
1- सिंगरौली और सोनभद्र में लक्ष्मीचंद दुबे
2- देवरिया में रामकिशोर चौहान
3- चोलापुर, वाराणसी में विनोद चौबे
4- वाराणसी में राजेंद्र मानव
5- सलारपुर, वाराणसी में लक्ष्मण प्रसाद
6- जौनपुर में रामजनम
7- बदलापुर, जिला जौनपुर में रामयश यादव (स्वराज अभियान)
8- हरिश्चंद्र केवट ने यह जिम्मेदारी ली है कि वह घाट पर और अपने क्षेत्र में बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित करेंगे.
प्रवाल कुमार सिंह, वाराणसी (अध्यक्ष, पीयूसीएल, वाराणसी):
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रवाल कुमार सिंह ने कहा कि सिविल लिबर्टी (नागरिक स्वतन्त्रता) का पालन व सम्मान अपने परिवार और समाज में होना चाहिए. यह बात भी पंचायतों के विचार विमर्श में शामिल की जानी चाहिए.
सुनील सहस्रबुद्धे, वाराणसी (अध्यक्ष, विद्या आश्रम):
इस सत्र के दूसरे अध्यक्ष सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि इस पंचायत में जो निर्णय लिया गया है उसको क्रियान्वित करने में जिस भी तरह के सहयोग की जरूरत होगी, विद्या आश्रम उसमें मदद करेगा. एक ध्यान देने की बात यह है कि बहुजन की पहल पर स्वराज की जब भी बात होगी तब कला पर बात होगी, अन्यथा बहस और सोच दूसरी दिशा में चली जाएगी. आधुनिक यूरोपीय सोच के तार्किक आधार व नींव में साइंस और उसकी तर्क प्रणाली है जो नीति निरपेक्ष व भाव निरपेक्ष है. पाश्चात्य और आधुनिक दर्शन की खासियत यह है कि मनुष्य की सोच में से साइंटिफिक तत्वों को छोड़ कर शेष सब छांट देते हैं. इसलिए वह भाव विहीन हो जाती है. ‘स्वतंत्रता’ और ‘लोकतंत्र’ जैसे विचारों का अंतिम आधार भी साइंस की ही तार्किक प्रणाली में होता है. बहुजन के तर्क की प्रणाली अलग है. बहुजन का तर्क भाव प्रधान व कला प्रधान होता है. बहुजन स्वराज की दिशा में समाज निर्माण का कार्य बहुजन स्वराज पंचायतों की पहल से ही हो पाएगा. इन्हें बनाया जाए.
समापन करते हुए पारमिता ने बहुजन स्वराज पंचायत के सभी भागीदारों को धन्यवाद दिया. उन्होंने आवाहन किया कि बहुजन स्वराज के निर्माण की शुरुआत हो गई है, हम सब इसे बहुजन समाज की शक्तियों का स्रोत बनाने की दिशा में आगे बढ़ें.
उन्होंने इस पंचायत की भोजन, आवास और सभी व्यवस्थाओं को बनाने में विद्या आश्रम के कमलेश कुमार की सदारत में व्यवस्थापक मंडल प्रभावती, अंजू देवी और चम्पादेवी को धन्यवाद दिया तथा सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराने के लिए पप्पू और उनके साथियों को धन्यवाद दिया. पगडंडी समूह से आये युवाओं और आश्रमवासी किशोरों ने व्यवस्थाओं को सुचारू चलने के लिए जो स्वयंसेवा की वह प्रशंसनीय रही. सभी लोगों को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी बहुजन स्वराज पंचायतों को आगे भी करने में इन सभी का सहयोग मिलता रहेगा इसकी उम्मीद हम करते हैं.
अंत में अरुण कुमार के साथ मिलकर अनेक युवाओं ने गीत प्रस्तुत किया.
- स्वागत और विषय प्रवेश
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स्वागत
विद्या आश्रम की समन्वयक चित्राजी ने पंचायत में आये सभी भागीदारों का स्वागत किया. उन्होंने कहा कि यह पंचायत बहुजन-समाज की शक्ति के स्रोतों को उजागर करने का लक्ष्य रखती है. बहुजन समाज यानि सामान्य जन. पिछले 15-20 वर्षों में लोकविद्या जन आन्दोलन ने लोकविद्या दर्शन और विचार की अनेक अवधारणाओं को गढ़ा है और इस आधार पर कार्यक्रमों और जन आन्दोलनों में भागीदारी के मार्फ़त आज हम बहुजन-स्वराज पंचायत तक पहुंचे हैं. वाराणसी ज्ञान पंचायत की पहल पर यह बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित की गई है. वर्ष 2016 में सलारपुर में शोषित समाज दल और लोकविद्या जन आन्दोलन की संयुक्त पहल पर बनी वाराणसी ज्ञान पंचायत में अनेक संगठन शामिल हैं, जिनमें मुख्यत: लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन, स्वराज अभियान, बुनकर साझा मंच, माँ गंगाजी निषाद सेवा समिति और कारीगर नजरिया हैं. बहुजन स्वराज पंचायत के इस आयोजन में इंदौर से लोकविद्या समन्वय समूह और कला केंद्र की भागीदारी उल्लेखनीय है.
आज दुनिया के कुछ शक्तिशाली देशों ने बहुजन-समाज को बहिष्कृत, उत्पीडित कर लगभग मिटाने की मुहिम चला रखी है. इस मुहिम को लोकतान्त्रिक, समाजवादी, रुढ़िवादी सभी सरकारों का समर्थन मिलता हुआ हम देख रहे हैं. नई तकनीकी, साइंस और वित्तीय पूंजी के गठबंधन ने साम्राज्यवादी शक्तियों की नई आकांक्षाओं और व्यवस्थाओं के लिए मैदान तैयार किया है. इस मुहिम के साथ वे राष्ट्र-सत्ताओं के पुनर्संगठन की बातें भी कर रहे हैं. इन बातों में सभ्यतागत-राज्य (सिविलिज़ेशनल-स्टेट), राष्ट्र-राज्य (नेशन-स्टेट), उदार लोकतंत्र (लिबरल डेमोक्रेसी), सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (कल्चरल नेशनेलिस्म) प्रमुख हैं.
जबकि इस बहस के कुछ ही वर्षों पहले इक्वाडोर और बोलीविया देशों के मूल निवासियों ने एक नया रास्ता बनाया है. इन देशों में बहुराष्ट्रीय-राज्य (प्लूरिनेशनल-स्टेट) की एक नई अवधारणा अस्तित्व में आई और उसके हिसाब से इन्होंने अपने ज्ञान (लोकविद्या) के बल पर राष्ट्र का संविधान बनाने की पहल ली. हम मानते हैं कि यह घटना दुनिया भर के बहुजन-समाजों के लिए प्रेरणा का स्रोत है.
हमारा मानना है कि इस वैश्विक बहस में ‘स्वराज’ को ले आने की पहल करनी चाहिए. ‘स्वराज’ यह बहुजन-समाज के विचार और परम्परा का हिस्सा है. भारत के किसान आन्दोलन के लम्बे दौर में हम स्वराज की परंपराओं की स्पष्ट झलक देख चुके हैं. ‘न्याय, त्याग और भाईचारा’ के नारे व मूल्य में उनकी दृढ निष्ठा के नतीजों का असर भी देख चुके हैं. हम उम्मीद करते हैं कि बहुजन स्वराज पंचायत से कुछ उजाला मिले और बहुजन की पहल पर स्वराज निर्माण के मार्ग खुलें.
विषय प्रवेश
गिरीश सहस्रबुद्धे, नागपुर (संयोजक, लोकविद्या जन आन्दोलन, महाराष्ट्र, विद्या आश्रम के न्यासी, शेतकरी संघटना (किसान आन्दोलन) के सक्रियकर्मी और भौतिक शास्त्र के अवकाशप्राप्त प्राध्यापक).
सत्र के मुख्य विषय को गिरीश ने विस्तार से पंचायत के सामने रखा. बहुजन स्वराज पंचायत यह बहुजन स्वराज की पहल की शुरुआत है. बहुजन समाज एक विशाल समाज है, जो सामान्य जीवन का वाहक है और एक ज्ञानी समाज है. हम जिसे लोकविद्या समाज कहते आए हैं, यह वही समाज है. ‘बहुजन’ यह शब्द इस बात को पकड़ता है कि ये सामान्य-जन का समाज है, अभिजनों से भिन्न. बहुजन समाजों का ज्ञान वह ज्ञान है, जो सृजन की वास्तविक क्रियाओं में पैदा होता है और वहीं बसता है और यह ज्ञान लोकविद्या कहलाता है, जो सामान्य जीवन का वाहक है. सामान्य जीवन का वाहक होने का मतलब है कि बहुजन ने अपने ज्ञान में कभी बिखराव नहीं आने दिया, ज्ञान के किसी एक हिस्से को बहुत बड़ा कभी होने नहीं दिया. इसके उलटे पिछले 400 वर्षों में जो पश्चिम में ज्ञान (साइंस) के एक – भौतिक – आयाम को इतना बढ़ावा मिला कि वह बहुजन समाज से अलग हो गया. बहुजन समाज के ज्ञान से विलग होकर जो ज्ञान खड़ा हुआ उसने ऐसे समूहों को जन्म दिया, जो बहुजन समाज पर शासन करते हैं. इनसे आधुनिक राजनीति ने आकार लिया और अलग-अलग किस्म की राज्य व्यवस्थाएं अस्तित्व में आईं. इस तरह आधुनिक ज्ञान (साइंस), आधुनिक राजनीति और आधुनिक राज्यसत्ता परस्पर की सहयोगी बनकर विकसित हुईं.
इन राज्य व्यवस्थाओं और आधुनिक ज्ञान के बल पर जो व्यवस्थाएं बनीं, उन्होंने समाज के सामने ऐसे भयानक संकट पैदा कर दिए हैं, जिनका जवाब इनके पास नहीं है. ज्ञान को समाज से विलग कर उसी समाज के विरोध में खड़ा करने के कुछ बड़े परिणामों में एक उदाहरण पर्यावरण संकट है. इसका सामना आधुनिक जीवन प्रणालियों की समाप्ति के बगैर असंभव है. इन जीवन प्रणालियों को बदलने का कोई जरिया वर्त्तमान व्यवस्थाओं के पास नहीं है, जबकि बहुजन-समाज के आंदोलन इस स्थिति पर निरंतर ध्यान खींचते रहे हैं. इस पंचायत के माध्यम से आज हम जिस बात पर ध्यान खींचना चाहते हैं वह, यह है कि बहुजन समाज के आंदोलन वर्त्तमान स्थिति को बहुजन ज्ञान के दृष्टिकोण से पहचानें. अगर नहीं पहचान पाते हैं तो ये आंदोलन भी आज की व्यवस्थाओं को मजबूत करने के आंदोलन बनकर रह जाते हैं, ये तथ्य भी सामने है. परिवर्तन की विचारधाराओं से जो आंदोलन खड़े हुए वे सारे बहुजन समाज के आंदोलन ही थे. लेकिन वो आधुनिक ज्ञान-विधाओं पर कोई प्रश्न चिन्ह नहीं लगा पाए. ये उनकी प्रमुख कमजोरी मानी जानी चाहिए.
तो, आज स्थिति यह है कि जितनी राज्य प्रणालियां हैं, वे सभी, बहुजन समाज के ज्ञान को समाज से उठाकर राज्य व्यवस्था के साथ मिलकर बहुजन समाज के शोषण के आधार पर बनी. आधुनिक राज्य व्यवस्था का इतिहास बहुत पुराना नहीं है. मात्र 400 साल – इससे ज्यादा नहीं. जब से नेशन स्टेट की बात शुरू हुई तभी से. नेशन स्टेट चाहे डेमोक्रेटिक वैरायटी का हो, तानाशाही हो या उदारवादी, उस स्टेट का ज्ञान आधार आधुनिक साइंस में ही रहा. अमेरिका ने इस ज्ञान और इस तरह की राज्य व्यवस्था के बल पर सारी दुनिया पर राज किया. लेकिन अब उसकी ताकत लगभग खत्म होती जा रही है, ऐसा सब मान रहे हैं. एक मल्टीपोलर वर्ल्ड-बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था पनप रही है. इसमें अमेरिका ही सत्ता का एक केंद्र नहीं होगा, बल्कि कई देशों में सत्ता के केंद्र होंगे. जब सत्ता का केंद्र बिखरता है, आपको अपनी बात कहने का मौका बनाता है. आज कुछ ऐसे परिवर्तन हो रहे हैं, जो हमको अपने स्वराज की बात कहने में मददगार साबित हो सकते हैं.
पिछली बार भी हम लोगों ने जब लोकविद्या की बात शुरू की थी तब मौका इंटरनेट के फैलाव का था जिसने साइंस पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया था. संचार की एक नई दुनिया खड़ी कर दी थी. ज्ञान क्या है और नहीं है, उसकी कसौटियाँ क्या हैं, इसके नए सिद्धांत खड़े कर दिए थे. इसलिए साइंस पर प्रश्न चिन्ह लग गया, और तमाम बहुजन समाजों के पास में जो अलग-अलग ज्ञान विधाएं हैं, उनकी एक पहचान बनी, जिसके बल पर हम अपनी लोकविद्या की बात खड़ी कर पाए. यह कह पाए कि आज की दुनिया की जो त्रासदी है वह यह है कि बहुजन के ज्ञान – लोकविद्या – की ताकत को आज की दुनिया नकारती है. हमने बात की कि लोकविद्या को संगठित ज्ञान के बराबर की प्रतिष्ठा होनी चाहिए, तभी सामाजिक न्याय की बात हो सकती है. यह शर्त है न्याय-संगत समाज खड़ा करने की. इसके आगे का कदम बढ़ाने की बात हम अब कर रहे हैं.
अब जिस तरह की परिस्थितियां बन रही है उनमें राज्य व्यवस्थाओं को समाज ‘चलाना’ – मतलब बहुजन समाज के आन्दोलनों को सीमाओं में बांधना – अधिकाधिक कठिन होता जाएगा. बहुध्रुवीय विश्व बनने के पीछे यह भी एक कारण है. लेकिन नई व्यवस्थाएं जब खड़ी होती हैं तब राजनीति में नए किस्म की बातें भी साथ में आती हैं. जैसे विश्व बाजार का रूप बदलेगा, राज करने के तरीके बदलेंगे. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद हो या सभ्यतागत राज्य हो, इन अलग-अलग नामों के साथ जो कुछ भी घट रहा है वह हमारे यहाँ 2014 से हो रहा है. इन सारे विषयों पर बात आगे होनी है. यहाँ मैं सिर्फ यह कह रहा हूं कि नई राज्य व्यवस्थाओं के नाम से जो भी घट रहा है उसमें बहुजन ज्ञान के लिए बराबरी और सम्मान का स्थान नहीं है. बहुजन ज्ञान का अर्थ मात्र लोकविद्या की वे धाराएं नहीं, जिनका साइंस के और विश्व बाजार के अधिपत्य में इंटरनेट और ज्ञान-प्रबंधन के माध्यम से शोषण किया गया. इनके साथ बात बहुजन-समाज की राज व्यवस्थाओं की भी हो रही है. समाज चलाने की व्यवस्थाओं की भी हो रही है. हम बहुजन स्वराज के समाज संचालन के ज्ञान दर्शन की बात भी कर रहे हैं. उसका भी दावा ठोकना है. जो बहुजन समाज की अपनी क्षमताएं हैं, समाज संचालन का जो ज्ञान है, यानि खुद अपना समाज चलाने की बात है, जिसको सब मिला–जुलाकर स्वराज का नाम दिया जा सकता है, उसका दावा करने का यह अवसर है.
अगर आज की दुनिया में बहुजन स्वराज को अवस्थित करना है, तो जिन चीजों को देखते हुए चलना होगा उनकी बात इस पंचायत में होगी. बहुजन समाज की एक नई पहचान बनाने की, एक नया बहुजन नैरेटिव खड़ा करने की यह बात है. आज की व्यवस्थाएं बहुजन समाज को बांटने वाली जो पहचान आज तक बनाती रहीं उसको दूर हटाने की बात है. यह बात हम पंचायत के पहले दो सत्रों में करेंगे. उसके बाद कल के सत्रों में स्वराज चेतना पर, स्वराज पर बात होगी. इसके अलग-अलग अर्थों पर बात होगी. बहुजन सभ्यता से इसके रिश्तों पर बात होगी. समाज संचालन से इसके रिश्तों पर बात होगी. लोकविद्या से इसके रिश्तों पर बात होगी. सामान्य जीवन के साथ इसके रिश्तों की बात होगी. एक और नई बात, जो एक अलग सत्र में होनी है, वह है कला और स्वराज के रिश्तों की. कला की जो विधा है वह लोकविद्या की विधा से अलग नहीं है. सामान्य जीवन की शर्तों के अनुसार सर्जन की विधा कला की विधा है, लोकविद्या की विधा है. तो इस पर एक अलग सत्र होगा. इस पंचायत के साथ प्रकाशित ‘बहुजन स्वराज की किताब’ आप देखेंगे तो पायेंगे कि किताब के लेखों पर पंचायत के सत्रों को गढ़ा गया है. दो किस्म की बातें हैं. एक बात है आज बहुजन समाज के सामने की चुनौती और स्वराज के अर्थ और प्रासंगिकता की. दूसरी है चुनौती के स्वीकार के लिए बहुजन समाज की क्षमताओं की बात. यह दो तरह की है: एक, स्वराज निर्माण में कला की बात; और दो, जीवंत बहुजन परंपराओं में बहुजन समाज की क्षमताओं की खोज, जो बहुजन की अपनी खोज होगी और बहुजन नैरेटिव को गढ़ेगी.
तो, आगे के सत्रों में ये बातें होंगीं. सत्संग के साथ में ये बातचीत चलेगी. कला की बात के साथ यह बातचीत चलेगी. लोकविद्या की बात के साथ यह बातचीत चलेगी, और स्वराज की बात को बढ़ाते हुए ये बातचीत चलेगी. मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि आप सभी उसमें सक्रियता से शामिल हों.
- सत्र 1: बहुजन समाज
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पहला सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
सुबह 11.00 बजे से भोजन तक
लेखक: फ़ज़लुर्रहमान अंसारी
विषय: बहुजन-समाजअध्यक्ष मंडल: सामू भगत,वाराणसी (निर्गुण गायकी के कलाकार), केदारनाथ यादव, आजमगढ़ (लोरिकायन और चनैनी गायकी के कलाकार)
संचालन: फ़ज़लुर्रहमान अंसारी, वाराणसी (बुनकर साझा मंच और लोकविद्या जन आन्दोलन)
वक्ता: रामजनम, इकबाल अंसारी, पारमिता
फ़ज़लुर्रहमान अंसारी (बुनकर साझा मंच, लोकविद्या जन आन्दोलन):
सत्र संचालक ने अपनी बात बहुजन समाज के इस परिचय के साथ की कि बहुत से ज्ञानी समाजों से मिलकर बना हुआ यह एक ऐसा समाज है, जिसमें तरह-तरह के हुनर, ज्ञान और कार्य करने वाले समाज साथ साथ उसी तरह रहते हैं जैसे किसी माला में विविध रंग के मोती पिरोये होते हैं. इन सभी समाजों को हम ज्ञानी इसलिए मानते हैं कि इनके पास केवल अपना ज्ञान और हुनर ही नहीं है बल्कि इसका दर्शन भी है, इनकी अपनी विरासत और परम्पराएँ हैं. आज सामान्य जन को ‘जनता’ के नाम से पुकारा जाता है, जो गलत है. क्योंकि जनता बेशक्ल और बेअकल मानी जाती है, जिसे हुक्मरान हांकते हैं. जबकि बहुजन समाज की अपनी एक समृद्ध पहचान है.
रामजनम, वाराणसी (स्वराज अभियान और लोकविद्या जन आन्दोलन, किसान नेता):
रामजनम ने अपनी बात शुरू करते हुए कहा कि काफी लंबी कवायद के बाद हम लोग आज बहुजन स्वराज पंचायत तक पहुंचे हैं. जब हम लोगों ने सोचा कि देश के सामान्य जन को किस नाम से पुकारा जाए तो लोगो के अलग-अलग विचार आए, कुछ ने शूद्र तो कुछ लोगो ने पिछड़ा समाज कहा. हम लोग लोकविद्या जन आंदोलन के लोग हैं, हम लोग किसी भी समाज को शूद्र और पिछड़ा नहीं मानते, क्योंकि इनका भारत में गौरव शाली इतिहास रहा है और इन समाजों के इस देश में कई राजा रहे हैं. इन्हीं समाजों ने भारत देश को बनाया है और चलाया है. हम इन्हें पिछड़ा समाज नहीं मानते और शूद्र शब्द तो ब्राह्मणवादी शब्द है.
हम इन्हें इन शब्दों से नहीं बल्कि बहुजन-समाज के नाम से पुकारेंगे.
जब हम दुनिया के समाजों को देखते है तो हमको इनमें दो कैटेगरी दिखती है; एक विशिष्ट समाज, जिसे हम ‘प्रोफेशनल’ समाज कहते हैं और दूसरा सामान्य जन जिसे हम ‘बहुजन-समाज’ कहते हैं. ये जो प्रोफेशनल समाज है, ये दुनियां के सारे संसाधनों पर कब्ज़ा जमाए बैठा है, दुनिया की अर्थनीति और राजनीति पर भी इनका ही कब्ज़ा है. इसी के बल पर ये बहुजन-समाज का तिरस्कार करता है.
बहुजन-समाज का हज़ारों साल का इतिहास है, पर इतना पुराना इतिहास देखने के बजाए अगर 2 या 3 सौ सालों का ही इतिहास देख लें तो हमें मालूम होता है कि बहुजन-समाज के पास तब सारे संसाधन भी थे और इनके राजा भी थे, जिनकी एक राज्य परम्परा थी, जिसमें न्याय, त्याग और भाईचारा था. खुद अंग्रेजों ने भारत आने के बाद अपनी किताबों में लिखा कि भारत के किसानों की आमदनी यूरोपीय किसानों से अधिक हुआ करती थी. उस समय खेती साम्राज्यवादी या सामंतवादी लोगो के कब्जे में नहीं थी. उस समय समाज की ऐसी व्यवस्था थी कि जिनके पास खेती करने योग्य ज़मीन नहीं थी तो समाज इनके लिए व्यवस्था करता था. हम मानते हैं यही असली स्वराज है.
आज हम बहुजन समाज का इतिहास विश्वविद्यालय में या किताबों में ढूंढते है. अगर बहुजन समाज का इतिहास देखना है तो समाजों के बीच जाना होगा, वहां आपको इनका जिंदा इतिहास मिल जाएगा.
इकबाल अंसारी, मऊ (अध्यक्ष, बुनकर वाहिनी उत्तर प्रदेश):
पूर्वांचल बुनकरों का एक बड़ा हब है, जैसे किसान देश का अनाज देता है वैसे ही बुनकर देश को कपड़ा देता है. मगर आज दोनों समाजों की समस्या एक ही है.
इसलिए हम बहुजन समाज के लोगों को ये समझना होगा कि जब भी कोई आंदोलन हो चाहे वो किसान का हो या बुनकर का हम बहुजन समाज को आपसी इख़्तिलाफ भूल कर उस आंदोलन को हर स्तर पर साथ देना चाहिए ताकि बहुजन समाज की आपसी एकता और भाईचारा मजबूत हो.
बात जब लोकविद्या ज्ञान की होगी तो मैं खुद एक बुनकर हूँ और करघे पर बुनकरी करता हूं. मेरे पास जो ज्ञान है वो किसी भी डिग्री का मौहताज नहीं. आज तमाम कारीगर समाज को ये बात मजबूती से उठानी होगी के हमारा जो ज्ञान या हुनर है वो किसी भी लिहाज़ से विश्वविद्यालय के ज्ञान से कम नहीं है. इसलिए हमारे ज्ञान और विश्वविद्यालय के ज्ञान को बराबरी का सम्मान मिलना चाहिए और हर कारीगर और किसान की आय पक्की और नियमित होनी चाहिए जो सरकारी कर्मचारी के बराबर हो.
पारमिता, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन और संयोजक, नागरिक समाज वाराणसी):
सामाजिक कार्यकर्ता और संघर्षशील पारमिता जी ने कहा कि बहुजन समाज को हम अलग अलग रूप में देखते है. कभी किसान के रूप में तो कभी कारीगर के रूप में, तो कभी आदिवासी के रूप में, कभी महिला शक्ति के रूप में और आज के इस आधुनिक दौर में इलेक्ट्रीशियन, कम्प्यूटर ऑपरेटर, मोटर साईकिल बनाने वाले आदि तमाम तरह के मिस्त्री और इस तरह के भिन्न-भिन्न प्रकार के कारीगर भी बहुजन समाज का ही हिस्सा हैं और इनका भी ज्ञान विश्वविद्यालय का नहीं है. ये सारे लोग उसी विद्या से आए हैं, जो समाज में रहकर सीखने की है, जिसे हम समाजों का विश्वविद्यालय कहते हैं.
अगर हम इतिहास में देखें तो बहुजन समाज का भी इस देश में काफी लंबा शासन रहा है और बहुजन समाज के अनेकों राजा हुए हैं, जिनका प्रयास बहुजन समाज के साथ न्याय संगत रिश्ता बनाने का रहा है और समाजों को विश्वास में लेकर ही कोई भी नीति बनाने की ओर झुकाव रहा है.
लेकिन आधुनिक शिक्षा और राज्यसत्ता में जब बहुजन समाज के बाहर के लोग नेतृत्व में आये तो उनका सम्बन्ध समाज से दूर होता गया और हश्र आप सभी के सामने है. लोकविद्या यह बहुजन समाज का ज्ञान-दर्शन है और इसके आधार पर जब तक समाज का पुनर्निर्माण और राज्यसत्ता का प्रकार आकार नहीं लेगा तब तक बहुजन का/के लिए स्वराज और बहुजन की पहल से स्वराज नहीं बना सकेंगे.
- सत्र 2: बहुजन समाज
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दूसरा सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के दूसरे सत्र की कार्यवाही
दोपहर 3.00 बजे से 5.00 तक
लेखक: लक्ष्मण प्रसाद
विषय: बहुजन समाज
अध्यक्ष मंडल: विजय जावंधिया, नागपुर,(किसान नेता, शेतकरी संघटना के पूर्व अध्यक्ष अंतर्राज्यीय किसान आन्दोलन समन्वय समिति के पूर्व अध्यक्ष), जानकी भगत, बिहार (समाजवादी नेता)
संचालक: लक्ष्मण प्रसाद, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन)
वक्ता: संजीव दाजी, हरिश्चंद्र केवट, राजकिशोर चौहान, रामदुलार प्रजापति, राजीव यादव, राहुल राजभर
संजीव दाजी (संयोजक, लोकविद्या समन्वय समूह, इंदौर):
मालवा और निमाड़ के इलाके में पिछले दस सालों से सक्रिय रहे संजीव दाजी सत्संगी मंडलियों के बीच लोकविद्या वार्ता और तरह-तरह के रचनात्मक कार्यों से जुड़े हैं. ये सत्संगी सभी की बात करते हैं. अलग-अलग संतो की बात करते हैं. ज्ञान-दर्शन की बात करते हैं. किसी भी गतिविधि को अंजाम देने के लिए स्त्री-पुरुष दोनों की भागीदारी जरूरी है. इंदौर के सांस्कृतिक कार्यक्रम में पारो-दरिया की एक संकल्पना है. जिसमें पारो स्त्री है और दरिया पुरुष. इंदौर के पास आदिवासी इलाकों में सत्संगी समूह संतों की वाणी के मार्फत बहुजन समाज की बात करते हैं. हाटों में सत्संग किये जाते हैं, जिसमें स्वाभाविक रूप से सत्संग सुनने के लिए और उसमें भागीदार होने के लिए लोग आते हैं. ज्ञान यात्रायें होती हैं, जिसमें अलग-अलग गाँवों के लोग शामिल होते हैं. कला और विद्या की प्रस्तुति के साथ बात होती है. यहाँ लोकविद्या दर्शन की बातें होती हैं, जीवन दर्शन की बाते होती हैं. उन्होंने पंचायत के सामने हाटों के इर्द-गिर्द लोकविद्या चेतना को उजागर करने के रचनात्मक कार्यों का एक नक्शा प्रस्तुत किया. उनका कहना यह था कि ग्रामीण क्षेत्रों के हाट लोकविद्या के ज्ञानपुंज होते हैं.
हरिश्चंद्र केवट, मिर्जापुर (लोक विद्या पत्रकार, मां गंगाजी निषाद सेवा समिति के सचिव) :
हरिश्चंद्र ने प्रमुखत: दो बातें रखीं. एक, बहुजन समाज किसी जाति विशेष से नहीं बना है बल्कि इसमें सभी सामान्य जन शामिल हैं. बहुजन समाज की पहचान सामान्य जन की व्यापक एकता बनाने का रास्ता खोलती है. यह ‘जाति’ और धर्म की सीमाओं से बाहर निकलकर न्याय के संघर्षों से जुड़ने का रास्ता देती है.
दूसरा, ‘पंचायत’ की व्यवस्था हम बहुजन की देन है. पंचायत जब होती है तो उसमें सभी व्यक्तियों की राय होती है. आज की व्यवस्था सिर्फ दिल्ली में बैठे लोग तय करते हैं. बनारस, गाजीपुर के सुदूर गांव में व्यवस्थाएं क्या होंगी ये वहीं से तय हो जाता है. बहुजन समाज मानता है कि स्वराज से हमें न केवल अपने रीति-रिवाज, परंपरा, मूल्य हमें मिल जाएंगे बल्कि न्याय की व्यवस्थाओं के नए सूत्र भी मिलेंगे.
राम किशोर चौहान, देवरिया (किसान मजदूर मंच):
अपनी बात रखते हुए कहा कि सभी भारतवासी किसान, मजदूर, कामगार वास्तविक बहुजन हैं. देवरिया में रोड निकालने के नाम पर किसानों की जमीन की लूट का जिक्र किया, जिसमें भारतीय किसान यूनियन के साथ उनका संगठन इस लड़ाई में शामिल रहा.
रामदुलार प्रजापति, वाराणसी (शोषित समाज दल और अधिवक्ता):
बहुजन समाज में किसान भी हैं, बुनकर, गड़ेरिया, लेदर से काम करने वाले, मिट्टी से काम करने वाले, सबका पालन करने वाले बहुजन हैं. इस बहुजन का कभी बहुत सम्मान था. लेकिन धीरे-धीरे यह गुलाम हो गया. उन्होंने सामाजिक न्याय आन्दोलन और आरक्षण आन्दोलन के विविध चरणों की बात को रखा और इनके राजनीतिकरण की संकुचित धारा में बदलाव की स्थिति को रखते हुए इस बहुजन पंचायत से एक नई लकीर खींचे जाने की उम्मीद होने की बात रखी.
राजीव यादव, आजमगढ़ (किसान आंदोलन के नेता और रिहाई मंच के सचिव):
बहुजन की पहचान की बात करते हुए उन्होंने कहा कबीर, बुद्ध, गोरख से जोड़कर देखें तो बहुजन समाज का एक वृहत् आयाम बनता है. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज के नाम पर जाति वर्चस्व की लड़ाई रही है. राजनीतिक समीकरण अंतत: कहाँ ले जायेंगे ? यह सवाल है. बहुजन समाज की एकता के स्रोत खोजने और पनपाने के लिए ऐसी पंचायतों को लगाने की ज़रूरत को रखा.
राहुल राजभर, वाराणसी (समाज में सक्रिय युवा सामाजिक- राजनीतिक कार्यकर्ता):
बहुजन समाज की संकल्पना में एक ऐसे समाज की संकल्पना है, जिसमें सबकी भागीदारी का समाज बने. बहुजन के महापुरुष, उनके इतिहास और दर्शन की बात करके समता मूलक समाज को आगे बनाया जा सकता है. समाज को बांटने वाले विचार और नीतियों ने हमें अपने बारे में, अपनी पहचान के बारे में, अपनी विरासत के बारे में गलत जानकारियाँ देकर, हमें भ्रमित किया है. बहुजन समाज को अपनी पहचान खुद बनानी है. इस पंचायत से निश्चित ही इसकी ऊर्जा मिलेगी.
विजय जवंधिया,नागपुर (किसान आंदोलन के नेता, शेतकरी संघटना के पूर्व अध्यक्ष और अंतरराज्यीय किसान समन्वय समिति के पूर्व अध्यक्ष):
अध्यक्ष मंडल की ओर से अपनी बात रखते हुए उन्होंने कहा कि बहुजनों की ताकत होनी चाहिए, बहुजनों का स्वराज होना चाहिए और बहुजनों का स्वराष्ट्र होना चाहिए. आज असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों की लूट का जवाब नहीं. बहुजन ही इकट्ठा नहीं है. व्यवस्था ने बहुजनों को आपस में लड़ा कर रख दिया है. इन्हें एकजुट होने की जरूरत है.
जानकी भगत, बिहार (पुराने समाजवादी और अर्जक संघ के कार्यकर्ता):
अध्यक्ष मंडल की ओर से बोलते हुए कहा कि मैं अंबेडकर से सीखता हूं. गांधी से सीखता हूं. किसानों के सवाल पर टिकैत साहब के साथ जेल गया, बिहार में जगदेव प्रसाद मारे गए, उसके न्याय के लिए संघर्ष में मैं जेल भी गया. उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति का बेटा हो या चपरासी की संतान, सब की शिक्षा एक समान हो यह हम मानते है.
- सत्र 3: समाज सृजन का कला मार्ग
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तीसरा सत्र
पहले दिन 07/10/2025 के तीसरे सत्र की कार्यवाही
शाम 5.00 बजे से 6.30 तक
लेखक: अपर्णा (रंगकर्मी, पत्रकार, गाँव के लोग, वाराणसी)
विषय: समाज सृजन के कला मार्ग
अध्यक्ष मंडल: चित्रा जी (समन्वयक, विद्या आश्रम, राष्ट्रीय संयोजक, लोकविद्या जन आन्दोलन)
संचालक: रामजी यादव, वाराणसी (एंकर, गाँव के लोग, प्रकाशक अगोरा)
वक्ता: अपर्णा, संजीव, अंशिका
मैं कहता आखिन देखी तू कहता कागज की लेखी
तीन दिवसीय बहुजन स्वराज पंचायत के पहले दिन के तीसरे सत्र का नाम ‘समाज सृजन के कला मार्ग’ था.
लोक में कला बहुजन समाज की ही देन है. लेकिन इधर जब से नई तकनीकें जीवन पर हावी हुई हैं तब से भाषा और कला में ‘लोक’ का प्रभाव कम होता गया है, जबकि देखा जाए तो लोककला में बहुजनों के अनुभव और जीवन की बातें शामिल होती हैं. बहुजन समाज अपने अनुभव से ही सीखता है, उसका यही अनुभव उसका शास्त्र होता है. लोककवि व दार्शनिक कबीरदास हों या रैदास हों.
अंशिका, पटना, चित्रकला और कविता की कलाकार:
इस सत्र में अंशिका ने अपने विचार रखते हुए कला के बारे में बताया. जीवन के हर क्षेत्र और काम में कला समाहित है, चलना, उठना, बैठना, बात करना या फिर घर पर किए जाने वाला कोई काम ही क्यों न हो. कला भाव प्रधान होने के साथ सृजनात्मक होती है. अंशिका ने शुरुआत अपनी लिखी कविता से की.
संजीव दाजी, इंदौर (लोकविद्या समन्वय समूह और कलाकेन्द्र):
इस पंचायत शामिल होने आए संजीव दाजी ने कलाकारों का आवाहन करते हुए अपनी एक कविता “अरे, ओ कलाकार.. . सुनते हो?” सुनाई. इसके साथ मालवा के गांवों में जमीनी स्तर पर किए जा रहे कामों पर प्रकाश डालते हुए होने वाले बदलाव के बारे में उन्होंने बताया. साथ ही यह भी बताया कि कैसे वे आदिवासियों और बहुजनों से जुडते हैं. उन्होंने कहा कि किसान, कारीगर, महिलायें जो ज्ञानी हैं, जिनके पास ज्ञान का भंडार है, समाज उनको अज्ञानी मानता है. ऐसा ढांचा तैयार किया गया है कि उन्हें एक मजदूर से ज्यादा कुछ नहीं माना गया है लेकिन सैकड़ों वर्षों से उनके ज्ञान को सँजोने और पुनर्जीवित करने का काम संतों ने किया. समाज के ये संत बहुजन समाज से ही आए, उन्होंने उनकी कलाओं और हुनर को तरजीह दी. इस पंचायत में मालवा के अलग-अलग गांवों से आए आदिवासी कलाकारों ने, जो प्रस्तुति दी, वह अद्भुत थी. जबकि उसमें से किसी ने भी कोई औपचारिक शिक्षा नहीं ली है. लेकिन उन्होंने संतों की जो बातें अपने संगीत के माध्यम से सामने रखीं, उससे यह साबित हो गया कि वास्तव में मौलिक ज्ञान भंडार बहुजनों के पास है.
संजीव जी ने बताया कि तीन वर्ष पहले इंदौर में लोकविद्या कला केंद्र की स्थापना की. इसका विस्तार आसपास के गांवों में भी किया जा रहा है. गाँव-गाँव जाकर इनकी बातें और ज्ञान को लेकर छोटी-छोटी फिल्में बनाने का काम कर रहे हैं जिससे लोग अपने तरीके से अपनी बातें कहते हुए लोकविद्या के दर्शन को कैसे समझ रहे हैं, उनकी क्या सोच है, इस बात को सामने रख रहे हैं. ‘नई सोच नया करें’ के अंतर्गत गांवों और शहरों के लोकविद्या ज्ञानियों को जोड़कर लगातार प्रयोग किए जा रहे हैं और उसमें सफलता भी मिल रही है. इस तरह संजीव जी और सप्रे जी लगातार लोकविद्या ज्ञान की खोज करते हुए उसे सहेजने के काम में लगे हुए हैं. अपना वक्तव्य एक कविता से समाप्त किया.
सत्र के संचालक रामजी यादव (गाँव के लोग और अगोरा प्रकाशन):
कार्यक्रम को आगे बढ़ाते हुए रामजी यादव ने बताया कि ‘लोकविद्या जन आंदोलन’ और ‘गाँव के लोग’ के संयुक्त सहयोग से पूर्वाञ्चल के लोकगायकों खासकर बिरहा कलाकारों का कार्यक्रम आयोजित किया गया. ‘बिरहा में कबीर’ को गवाया गया, नए प्रयोग के साथ नई शुरुआत की गई. इसमें रैदास के पदों को भी गाने की योजना है. ये कार्यक्रम उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिलों में शुरू किये जा चुके हैं. विद्या आश्रम पर भी तीन प्रस्तुतियां हो चुकी हैं.
अपर्णा, वाराणसी (रंगकर्मी और पत्रकार):
अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़ के जिस रायगढ़ शहर से वे आती हैं, वहाँ उन्हें बहुजन समाज को लेकर जाति भेद का कोई ऐसा अनुभव नहीं हुआ, जिसे जातिगत भेदभाव कहा जाता है. वास्तव में उत्तर प्रदेश में जाति की राजनीति को करीब से देखने को मिला. पूरे देश में जातिवाद को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं आ रहीं हैं, वह दिल दहलाने वाली हैं. अपनी बात में उन्होंने कहा कि वास्तव में बहुजन द्वारा अपने ज्ञान और कला के माध्यम से किए जा रहे काम ही हैं जो देश की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. उनके पास अपनी मौलिक कलाएं हैं, जिनमें वे पारंगत है, उसे सीखने के लिए किसी तरह की किताब की जरूरत नहीं होती. साथ ही एक गुण और है, उनमें तृष्णा की प्रवृत्ति नहीं होती, वह कल की चिंता नहीं करते – जैसे आदिवासी समाज जंगल के पास रहते हुए केवल आज की जरूरतों के लिए ही चीजें लेते हैं.
अपनी बात कहने के बाद उन्होंने कथाकार रामजी यादव की कहानी, कहानी संग्रह ‘आधा बाजा ‘से ली हुई कहानी ‘परजुनियाँ’, का पाठ किया. कहानी के केंद्र में बहुजन नायक सोभा नाई हैं, जो समाज के हर वर्ग के लोगों को सुंदर बनाने का काम करते हैं. लेकिन अपने ज्ञान में पारंगत होने के बाद भी उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ता है. सोभा नाई जो बारात में जाने वालों की बाल-दाढ़ी बना रहे होते हैं, इस उम्मीद से कि इस काम में यहाँ से चार पैसे ज्यादा आमदनी हो जाएगी. लेकिन दल्लू अहीर बारात में जाने का झूठ कहते हुए जबरदस्ती सोभा नाई से बाल बनवाने के लिए अपमानित करने में कोई कसर नहीं छोड़ते.
अंत में इस सत्र की अध्यक्षता कर रही चित्रा सहस्रबुद्धे ने अपनी बात की शुरुआत करते हुए बताया कि बहुजन समाज का कला से क्या रिश्ता है. यह सवाल लगातार उठ रहा है. कला क्या है, किस प्रकार का ज्ञान है? क्या यह किसी विचार को प्रस्तुत करने का माध्यम मात्र है? कला क्या ऐसी कोई विधा है जो मनुष्य में पैदाइशी आती है. कला को यदि विद्या मानें तो सवाल उठता है कि यह किस तरह की विद्या है? इन सवालों पर विचार शुरू हुआ. आज जो समाज है, उसमें बहुजन समाज में बहुत सी जातियाँ हैं, जिनमें आपसी संघर्ष हैं. यह सच्चाई है लेकिन पूरे बहुजन समाज को राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र से एकदम बाहर कर दिया गया है यह भी सच्चाई है. तो इसका क्या रास्ता हो सकता है? इस पर विचार करते हुए हम कहते हैं कि बहुजन स्वराज में इसका एक रास्ता मिल सकता है, इसमें देखना होगा कि बहुजन समाज के पास शक्ति के कौन से स्रोत हैं? राजनैतिक दृष्टि से देखने पर उत्तर प्रदेश और बिहार में जाति को लेकर चीजें दिखाई देती हैं लेकिन आधुनिक राजनैतिक स्तर पर दुनिया में हर जगह गैर बराबरी को लेकर स्थितियाँ बिगड़ी हुई हैं. कोई रास्ता नहीं सूझता लेकिन बहुजन स्वराज पंचायत यह कहती है कि कमजोरियों पर अपनी इमारत खड़ी नहीं हो सकती, बहुजन समाज की शक्तियों पर उनकी अपनी इमारत बनती है. बहुजन समाज के पास क्या है जिसके बल पर स्वराज खड़ा होगा? जब इसकी बात करते हैं तो कला के इस सत्र में इस बात को मैं कहना चाहती हूँ कि समाज निर्माण के अनेक मार्ग दिखाई देते हैं. उससे भी आगे यह बात है कि स्वराज चेतना की बातें कला के द्वारा कैसे दिखाई देंगी? आज जो समाज व्यवस्थाएं हैं, जिनमें आधुनिक राजसत्ता, विज्ञान और पूंजी का गठबंधन है, इस गठबंधन ने सारी जातियों को लक्ष्य बनाया है, उन्हें भ्रमित किया है और इन व्यवस्थाओं में कुछ लोगों का ही विकास हो रहा है. इसमें बहुजन समाज को शामिल नहीं किया गया है. हम खोज रहे हैं कि बहुजन समाज जब स्वराज की बात करेगा तो कौन से लक्ष्य रखेगा? निश्चित ही इस गठबंधन को चुनौती देने का लक्ष्य रखेगा. कला के मार्ग से उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त करेगा? हम कहते हैं कि स्वराज चेतना का एक स्रोत कला में होता है, जो इस लक्ष्य को प्राप्त करने का माध्यम बन सकता है. बहुजन समाज की हर गतिविधि कलापूर्ण होती है. उन्होंने कला में निहित ज्ञान के प्रकार किस तरह व्यापक एकता, स्वायत्तता, भाईचारा और सहजीवन के मूल्यों को संजोते हैं, इसकी बात की.
- सत्र 4: स्वराज
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दूसरे दिन 08/10/2025, सुबह 10.00-11.00
लोकविद्या सत्संग
दूसरे दिन की शुरुआत इंदौर से आई सत्संग मंडली के द्वारा लोकविद्या सत्संग से हुई. बहुजन स्वराज पंचायत में इंदौर से लगभग पचास की संख्या में मालवा-निमाड़ के विविध गाँवों की सत्संग मंडलियों से लोग आये थे. इनमें घनशामभाई भाबर, किशोर महाराज, पद्म नायक, कन्हैया महाराज, गणेश बुंदेला, जगदीशबाबा, बिलमनभाई बडोदिया, राजरत्नम महाराज, कुंजीपटल, करनभाई, शिवराम, परसराम, रवीना, गंगाबाई, देवानबाई की सदारत में अन्य साथियों के साथ सत्संग हुआ.
चौथा सत्र
दूसरे दिन 08/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
सुबह 11.00 बजे से भोजन तक
लेखक: रामजनम
विषय: स्वराज
अध्यक्ष मंडल: कृष्ण गांधी, झाँसी, उत्तर प्रदेश (किसान आन्दोलन में सक्रिय, पूर्व समन्वयक, अंतर्राज्यीय किसान आन्दोलन समन्वय समिति, लोकविद्या जन आन्दोलन) और अवधेश, सिंगरौली, मध्य प्रदेश (समाजवादी नेता और सिंगरौली में विस्थापन विरोध के जुझारू नेता, अध्यक्ष, लोकहित समिति. सिंगरौली)
संचालन: रामजनम, वाराणसी (किसान नेता, स्वराज अभियान और लोकविद्या जन आन्दोलन)
वक्ता: शिवराम कृष्णन, अक्षय कुमार, राजेंद्र मानव, रामजी सिंह, आर्यमन, शिवदास
शिवराम कृष्णन, बंगलौर (समाज शास्त्र के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक और विद्या आश्रम के न्यासी):
शिवराम कृष्णन जी ने हिंदी में बोलने की अपनी असमर्थता व्यक्त की. आर्यमन (पगडण्डी समूह) ने उनके वक्तव्य का हिंदी में अनुवाद किया. शिवराम कृष्णन ने कहा कि मैं लंबे समय से बहुजन-समाज से जुड़ा हूँ. उन दिनों इस समाज को बहुजन नहीं कहा जाता था. मैं आमतौर पर किसी ऐसे आंदोलन या संगठन से जुड़ा रहा हूँ, जो सामान्य लोगों से जुड़ा हो. एक वामपंथी होने के नाते भी मैं कई तरह की गतिविधियों में भाग लेता रहा हूँ और बाद में जब मैं पीपीएसटी में संस्थापक सदस्य के रूप में शामिल हुआ, तो धर्मपाल जी की प्रेरणा से भारतीय समाज में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की प्रासंगिकता के तहत विज्ञान और प्रौद्योगिकी के बारे में बात की. सुनील सहस्त्रबुद्धे बहुजन-समाज और विशेष रूप से लोकविद्या के इस तर्क के साथ आए, जो भारत में हमारे आंदोलन का केंद्र बिंदु बना है, खासकर बुद्धिजीवियों का, जो हतोत्साहित हैं. इसमें कुछ बहुत ही चौंकाने वाली बात थी कि हम सभी विश्वविद्यालय से निकले हैं, हम सभी आधुनिक शिक्षा प्रणाली में शिक्षित हैं, हालाँकि हमें अशिक्षित और कम पढ़े-लिखे लोगों से सहानुभूति थी. लेकिन हमने उन्हें ज्ञान के वाहक के रूप में नहीं देखा, यह नहीं देखा कि वे अपने तरीके से ज्ञान का उत्पादन करने और समाज को बदलने में सक्षम हैं. हमने उन्हें मूल रूप से उपभोक्ता या बाहुबल, ताकत, मेहनत के बल पर काम करने वाला श्रमिक माना. मुझे लगता है कि सुनील सहस्त्रबुद्धे की दूरदर्शिता ही थी कि 1990 के दशक के मध्य में, उन्होंने ‘लोकविद्या’ का यह तर्क गढ़ा कि प्रत्येक साधारण व्यक्ति के पास ज्ञान का एक अंश है, और यह ज्ञान बहुत महत्वपूर्ण है.
अक्षय कुमार, उड़ीसा (नवनिर्माण किसान संघ):
बहुजन स्वराज पंचायत में स्वराज पर अपनी बात रखते हुए उड़ीसा से आये हुए किसान नेता अक्षय कुमार ने कहा कि अंग्रेज आने के पहले भारतीय समाज स्वराज पर खड़ा था. समाज व्यवस्थाओ के मूल में स्वराज था और खेती इस व्यवस्था के केन्द्र में थी. शिल्प, वाणिज्य और संस्कृति का खेती से गहरा नाता था. अंग्रेज के जाने के बाद आजाद भारत अंग्रेजो के ढाँचे पर आगे बढ़ता रहा. 1990 मे वैश्वीकरण बाद वैश्विक पूंजी केन्द्र में आ गई और भारत मे स्वराज की रीढ़ टूट गई. हमें अपने कामों में वैश्विक पूंजी को चुनौती देना आवश्यक है. इसके बिना कोई नई स्वदेशी राजनीति नहीं खड़ी हो सकती.
राजेंद्र मानव, वाराणसी (किसान नेता और बहुजन कार्यकर्त्ता):
राजेन्द्र मानव ने कहा कि बहुजन-हिताय बहुजन-सुखाय का सपना अभी अधूरा है. इस सपने की तरफ बढ़ने के लिए बहुजन एकता जरूरी है. बराबरी और खुशहाली का समाज यानि समतामूलक समाज बहुजन समाज का पैगाम है. मानव जी ने बहुजन समाज पर स्वरचित कविता का पाठ भी किया.
रामजी सिंह, वाराणसी (किसान सभा वाराणसी के जिलाध्यक्ष):
साथी ने कहा कि भारत में आजादी आंदोलन और विभिन्न अंचलों में सामंतो के खिलाफ आंदोलन का मकसद भी स्वराज ही था. इन आन्दोलनों के नायकों ने ऐसे ही मन्तव्य समय-समय पर पेश किए है. दुनिया राजनैतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं के जाल में फंसे बहुजन समाज की मुक्ति के लिए बहुजन स्वराज पंचायत को आगे बढ़ाने की जरूरत है. बनारस के आसपास जबरन भूमि अधिग्रहण के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले किसान नेता रामजी ने कहा कि बहुजन स्वराज पंचायत को आगे ले जाने के लिए मेरा सक्रिय योगदान रहेगा.
आर्यमन, दिल्ली (पगडंडी समूह) :
युवा साथी आर्यमन ने शिक्षा, विकास की अवधारणा, न्याय, नैतिकता और जीवन शैली को रेखांकित करते हुए कई अहम सवाल खड़े किए.
शिवदास, वाराणसी, (युवा पत्रकार):
साथी ने सामाजिक न्याय, आरक्षण, संविधान और जाति के सवाल उठाये और कहा कि इन सवालों को बिना हल किए खुशहाली और बराबरी या स्वराज की बात आगे नही बढ़ सकती है.
अवधेश, सिंगरौली (लोकहित समिति):
अध्यक्ष मंडल के सदस्य ने सिंगरौली में विस्थापन विरोध के आन्दोलनों का गहरा अनुभव प्रस्तुत कर कहा कि इस देश का बहुजन समाज या लोकविद्या-समाज सृजनकर्ता और पालनहार है. इस समाज का जल, जंगल और जमीन से गहरा रिश्ता है. दूसरी तरफ पढ़े लिखे लोग या प्रोफेशनल क्लास है, जिसका रचना, सृजन और निर्माण में नगण्य योगदान है. तमाम जनसुनवाई और कार्यक्रम और आंदोलन से महसूस होता है कि सामान्य जन की चेतना और तेवर बढ़ा है और इसे बहुजन स्वराज के विचार के साथ आगे बढ़ने के अवसर भी हैं.
कृष्ण गांधी, झाँसी (किसान आन्दोलन में सक्रिय भागीदारी, विद्या आश्रम के न्यासी, फिज़िक्स के अवकाश प्राप्त प्राध्यापक) :
अपने अध्यक्षीय संबोधन में उन्होंने कहा कि स्वराज कही दूर का लक्ष्य नही है, यह लोगों की ज़िन्दगी में रचा बसा है. यह बात हवा में नही कही जा रही है. स्वराज हमारे आसपास समाज के लोगों की विभिन्न परम्परओं में मौजूद है. स्वराज लक्ष्य नही है, यह मार्ग ही है. अनेक उदाहरणों और आन्दोलन के अनुभवों से उन्होंने अपनी बात को स्पष्ट किया.
अंत मे खुला सत्र हुआ जिसमें अरुण कुमार, वाराणसी और विजय जावंधिया, नागपुर ने भाग लिया.
- सत्र 5: स्वराज
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पाँचवाँ सत्र
दूसरे दिन 08/10/2025 के दूसरे सत्र की कार्यवाही
दोपहर 3.00 बजे से 5.00 बजे तक
लेखक: हरिश्चंद्र केवट
विषय: स्वराज
अध्यक्ष मंडल: अरुण, वाराणसी (जयप्रकाश आन्दोलन के जुझारू कार्यकर्त्ता) और जे.के. सुरेश, बंगलुरु (संयोजक, लोकविद्या वेदिके, बंगलुरु, विद्या आश्रम के न्यासी, इनफ़ोसिस से अवकाशप्राप्त इंजीनियर)
संचालन: हरिश्चंद्र केवट, वाराणसी (लोकविद्या पत्रकार, सचिव, माँ गंगाजी निषाद सेवा समिति)
वक्ता: लक्ष्मण प्रसाद, रामस्वरुप सिंह, रामजी यादव, एकता शेखर, नवदीप, प्रह्लाद सिंह पटेल
लक्ष्मण प्रसाद, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन, भारतीय किसान यूनियन):
लक्ष्मण ने लंबे समय से लोकविद्या कार्यकर्ता के रूप में, किसान, कारीगर, आदिवासी के बीच काम किया हैं. अपने वक्तव्य में उन्होंने लोकविद्या समाज की ज्ञान आधारित व्यवस्थाओं पर प्रकाश डाला. आपने कहा कि, बहुजन समाज में न्याय, त्याग, भाईचारा, करूणा, सहिष्णुता, बंधुता जैसे अनेक बुनियादी मानवीय मूल्य होते हैं और तमाम तरह के सद्गुण भी. बहुजन समाज में संतों की एक लंबी कतार है, जिसमें कबीर, रविदास, तुकाराम, नानक, नामदेव आदि हैं, जो समाज की शक्ति को जागृत करने का काम किए. बहुजन समाज की इन ज्ञान आधारित व्यवस्थाओं की एक झलक हम हाल ही में हुए किसान आन्दोलन में देख चुके हैं.
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में लोक और सरकार के बीच ऐसा कोई माध्यम नहीं है, जिससे कि आपस में वार्ता हो सके. बिजली, पानी, दाम, भूमि-अधिग्रहण इत्यादि मुद्दों को लेकर किसानों का आंदोलन चलता रहता है. तीन काले कृषि कानून के विरोध में दिल्ली की सीमाओं पर 13 महीनों तक ऐतिहासिक आंदोलन चला. अगर सरकार लोक की होती तो निश्चित रूप से सरकार और किसानों के बीच वार्ता के मार्फत कोई हल निकल जाता. किसानों की ही तरह कारीगर, आदिवासी, महिलाएं, छोटे-छोटे दुकानदार,इत्यादि समूचा बहुजन समाज अपनी-अपनी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं.
हमारे यहां का लोकतंत्र पश्चिमी देशों के लोकतंत्र की अवधारणाओं की नकल है. अपनी सत्ता को कायम रखने के लिए ऐसा लोकतंत्र बनाया गया है. इसमें लोक का तंत्र नहीं है. स्वराज के लिए ‘लोक का तंत्र’ आवश्यक है. अर्थात लोक और सरकार के बीच की दूरी समाप्त हो जाय.
स्वराज में पंचायत की व्यवस्था होती है. सारे निर्णय पंचायत में लिए जाते हैं और यह प्राय: सर्वमान्य होता है. पंचायत में निर्णय की प्रक्रिया बहुत ही सहज,सरल और सबके सामने होती है. यहां पर संबंधित पक्ष का कोई भी व्यक्ति एक भी झूठ बोलने में कांपने लगता है. सभी पक्ष मौजूद होते हैं. झूठ बोलते ही कई व्यक्ति उठ खड़े होंगे और झूठ बोलने वाले व्यक्ति को घेर लेंगे. उनके द्वारा उठाए गए प्रश्नों का जवाब दे पाना झूठे व्यक्ति के लिये असंभव हो जाएगा. आज के न्यायालय में कोई भी व्यक्ति सफेद झूठ बोल सकता है. इतना ही नहीं वहां टोकने वाला कोई नहीं. गवाह और जमानतदार पैसे पर खरीदे जाते हैं. ये सारी दुर्व्यवस्थाएं पंचायत में संभव नहीं. पंचायत स्वराज का एक स्तंभ है, जो आज तक कायम है. इसे अनेक स्थानों पर, अनेक समाजों में, जाति पंचायतों में जीवंत रूप में देखा जा सकता है. पंचायतें समानता का बहुत बड़ा प्रतीक हैं.
बहुजन समाज के पास उपलब्ध ज्ञान और विद्या पर आधारित व्यवस्था स्वराज के लिए आवश्यक है. बहुजन के ज्ञान के आधार पर बनाई गई व्यवस्था ही बहुजन के हित में हो सकती है. बहुजन समाज स्वाभाविक तौर पर ज्ञानी होता है. किसान हों, कारीगर हों, आदिवासी हों, स्त्रियां हो, छोटी पूंजी के दुकानदार हों- सभी किसी न किसी रचना और सृजन और उत्पादन के काम में लगे हैं. रचना और सृजन के कार्य ज्ञान के बिना नहीं हो सकता. कबीर दास की वाणी है कि तू कहता कागज की लेखी, मैं कहता आंखन की देखी. बहुजन समाज इसे चरितार्थ करता है.
स्वराज की व्यवस्था “लकीर का फकीर” नहीं, एक जीवंत प्रक्रिया की परिकल्पना है. बहुजनों की पहल पर स्वराज निर्माण से ही समाज और देश का कल्याण संभव है.
नवदीप, हरियाणा (शोध छात्र):
उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि, इस पंचायत में सम्मिलित होकर बहुजन समाज की शक्ति को जाना और किस तरह से इस शक्ति का आधार लोकविद्या में है, इसे भी भलीभांति समझा. युवा पीढ़ी को आधुनिकता के साथ-साथ लोकविद्या के मूल्यों को भी उतना ही महत्व व सम्मान देना चाहिए. नवदीप इसके पीछे का कारण बताते हैं कि आधुनिकता और शहरी रहन-सहन से ज्यादा जब हम लोकविद्या का महत्व समझेंगे तब जाकर बहुजन स्वराज मजबूत स्थिति में खड़ा किया जा सकेगा. नवदीप दिल्ली में हुए ऐतिहासिक किसान आंदोलन में पूरा समय उपस्थित रहे. इस आन्दोलन के बारे में वे अपने अनुभव साझा किए और बताया कि हम जानते थे कि सरकार इतनी आसानी से काले कानून वापस नहीं लेने वाली है. इसलिए हम अपना राशन और अन्य सामान साथ लेकर चले थे और सड़क पर ही अपने गांव बसा लिए थे. कुछ ही दिनों में इस देश के बहुजन समाज के बल पर एक बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया और यह पर्यटन स्थल की तरह बन गया. इस आंदोलन की सबसे बड़ी बात महिलाओं की भागीदारी रही और हर परिस्थितियों में उनका समर्थन और सहयोग मिला.
रामजी यादव, वाराणसी (एंकर, गाँव के लोग) :
आपने अपने वक्तव्य की शुरुआत बहुजन शब्द को परिभाषित करते हुए किया. आपका मानना है कि सदियों से बहुजन समाज ने सभी को अपना माना है, सभी के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराने का काम करता चला आ रहा है. आज बहुत तरह के संगठन और राजनीतिक पार्टियां बहुजन समाज के नाम पर बन गई हैं, लेकिन बहुजन समाज आज भी बदहाली में जी रहा है. लोकविद्या को ख़त्म करने में आधुनिक मशीनों और हरित क्रांति को जिम्मेदार ठहराते हुए उन्होंने कहा लेकिन लोकविद्या मरती नहीं है.
राम सूरत सिंह (भारतीय किसान यूनियन के नेता):
भारतीय किसान यूनियन के नेता हैं और संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. आपने अपने वक्तव्य में कहा कि, मनुष्य एक चेतन प्राणी है और वह अपनी चेतना के बल पर कार्य करता है. आज देश को आजाद हुए लगभग 78 वर्ष होने को आया. जो न्याय की परंपरा गांव में थी वह पूरी तरह से समाप्त कर दी गई है, देश का राजस्व विभाग जानबूझकर लोगों को कचहरी के चक्कर कटवा रहा है जबकि 13 ग्राम सभाओं को मिलकर गांव में न्याय पंचायते होती थी, जिसमें जमीन पर बैठकर फैसले हुआ करते थे. किसी भी जनप्रतिनिधि से मिलने के लिए आम जनता को आज मौका नहीं मिलता. अगर कोई मिलने की कोशिश भी करता है तो पुलिस उसे जेल में बंद कर देती है. वहीं धार्मिक आयोजनों में जनता के ऊपर फूल बरसाए जाते हैं. ये किस तरह की व्यवस्था है?
एकता शेखर, वाराणसी (पर्यावरण आन्दोलन):
एकता पर्यावरण कार्यकर्ता हैं और विद्या आश्रम के साथ काफ़ी समय से जुड़ी हुई है. अपने वक्तव्य में आपने कहा कि लोकविद्या दर्शन समाज निर्माण का आधार है, आज जिस तरह के न्यायपूर्ण समाज की हम कल्पना कर रहे हैं, वह पहले भी था, लेकिन आधुनिकता की अंधी दौड़ में सब कुछ समाप्त करने की होड़ मची हुई है. एकता जी ने सिंगरौली में अपने किए गए कार्यों के दौरान हुए अनुभवों को साझा करते हुए आदिवासी समाजों में प्रकृति के साथ सहजीवन और समाज के अन्दर सहजीवन के मूल्यों को उजागर किया. उन्होंने कहा कि बहुजन स्वराज के निर्माण में इन समाजों से बहुत कुछ सीखने के लिए है.
अमरनाथ यादव, वाराणसी (कृषि भूमि बचाओं समिति):
आपने बहुजन स्वराज पंचायत को बनाने में सहयोग आकारने की बात की.
प्रह्लाद सिंह पटेल, मिर्जापुर (भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश सचिव, उत्तर प्रदेश):
आपने अपने वक्तव्य में विद्या आश्रम में आने के चलते अपनी बदली चेतना के बारे में बताया और परिवर्तन के रास्ते क्या होंगे, उनकी समझ पुख्ता होने की तरफ बढ़ने में लोकविद्या विचार ने कैसे मदद की उसका वर्णन किया.
जे. के. सुरेश, बंगलूरु (विद्या आश्रम न्यासी, लोकविद्या वेदिके संयोजक, इनफ़ोसिस से अवकाशप्राप्त इंजीनियर):
अपने अध्यक्षीय वक्तव्य की शुरुआत करतें हुए उन्होंने अपने लोकविद्या विचार के बनने के दौर को याद किया. उस दौर में जिसे बहिष्कृत समाज कहा जाता था और जिनकी संख्या लगभग 90% के करीब थी, उनसे उनके प्राकृतिक संसाधन को छीना जा रहा था; और उन्हें पश्चिमी समाज की तरह बनाने की कोशिश की गई. पिछले 250-300 सालों से लोकविद्या समाज का लगातार दमन किया गया लेकिन फिर भी हम आज यह सोचने पर मजबूर हैं कि इस दमन के बावजूद समाज में आज भी अपनी ज्ञान परंपराएं जीवंत हैं. जिसमें कृषि, चिकित्सा, निर्माण, कारीगरी आदि आती हैं. यह लोकविद्या समाज अपने आत्मसम्मान को बचाए रखते हुए अपने अस्तित्व के लिए संघर्षरत है. इनकी ताकत को समझने की ज़रूरत है. आज इसी के बल पर हम अन्याय के खिलाफ लड़ सकते हैं, नया कुछ बनाने के लिए भी हमें इसी ताकत में विश्वास बढ़ाना है.
अरुण, वाराणसी (जयप्रकाश आन्दोलन के कार्यकर्त्ता और लोकविद्या आन्दोलन के सहयोगी):
अध्यक्षता कर रहे अरूण जी ने एक जन गीत गाकर सत्र का समापन किया.
- सत्र 6: समापन
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तीसरे दिन 09/10/2025
सुबह 9.30 से 10.30 तक
लोकविद्या सत्संग
लक्ष्मण प्रसाद और सामू भगत की सदारत में लोकविद्या के बोल व पद गाये गए.‘’भरम जार के बार दे मनवा’, “घूँघट के पट खोल रे”, “जागु-जागु जंजाली मनवा” और “मोरा हीरा हेराय गयो कचरे में” पद गाकर पंचायत का समाँ बाँध दिया.
छठा सत्र
तीसरे दिन 08/10/2025 के पहले सत्र की कार्यवाही
दिन में 3.00 बजे से 5.00 बजे तक
लेखक: पारमिता, वाराणसी
विषय: आगे की बात और समापन सुबह 10.30 से दोपहर 1.30 तक
अध्यक्ष मंडल: सुनील सहस्रबुद्धे, वाराणसी और प्रवाल सिंह, वाराणसी
संचालक: पारमिता, वाराणसी
इस सत्र में कोई वक्ता नहीं थे बल्कि खुली चर्चा रखी गई. पिछले दो दिन के सत्रों में चली विचार प्रक्रिया के चलते नीचे दिए दो बिन्दुओं पर बहस केन्द्रित करने का आग्रह किया गया.
1-बहुजन स्वराज पंचायत बनाने की ओर कदम
2-बहुजन ज्ञान विमर्श/संवाद: शोध उपक्रम की रूपरेखा
पारमिता, वाराणसी (लोकविद्या जन आन्दोलन की कार्यकर्त्ता और संयोजक, नागरिक समाज वाराणसी):
सत्र का संचालन करते हुए पारमिता ने आए हुए लोगों का आवाहन किया कि जो बहुजन स्वराज पंचायत के विचार को आगे की दिशा में ले जाना चाहते हैं, अपनी दृष्टि पंचायत में रखें. इसे आगे कैसे बढ़ाया जाए, इसके लिए कार्यक्रम बनाने में सहयोग करें.
बहुजन ज्ञान विमर्श/संवाद – एक शोध उपक्रम की रूपरेखा:
बहुजन ज्ञान विमर्श/ संवाद के नाम से विद्या आश्रम समूह द्वारा शुरू की गई शोध कार्य की रूपरेखा और उसकी प्रगति चित्रा जी ने प्रस्तुत की. उन्होंने कहा कि बहुजन स्वराज पंचायत का लक्ष्य सबके हित का स्वराज बनाना है. जब तक न्याय, त्याग और भाईचारा के मूल्य समाज के पुनर्निर्माण की क्रियाओं में निहित नहीं होंगे तब तक हम बहुजन हिताय बहुजन सुखाय स्वराज बना नहीं पाएंगे. नैतिक ज्ञान किसी भी समाज की रीढ़ होती है. नैतिक ज्ञान बहुजन समाज में बसता है और समाज के ज्ञान (लोकविद्या) में समाहित होता है. साइंस के आधार पर नैतिक ज्ञान नहीं पैदा किया जा सकता.
लोकविद्या दृष्टिकोण किसी को ‘दुश्मन’ नहीं देखता/मानता. वर्तमान समय में बहुजन समाज में जातियां जड़/स्थिर चौखट की तरह दिखाई दे रही हैं, जिनके बीच निरंतर घर्षण है यह पश्चिम से आयातित ज्ञान के नज़रिए को अपनाने का नतीजा है. इस नज़रिए में बहुजन समाज अनेक समाजों में बंटा हुआ दिखाई देता है. विश्वविद्यालय में पढाये गए ‘समाज शास्त्र‘ के सहारे समाज की समझ ऐसा नजरिया बना दे रही है. बहुजन की दृष्टि से देखें तो बहुजन समाज विविध समाजों से बना है और इसका बनना एक जैविक क्रिया के समान है. जैसे जंगल में पुराने पेड़ मरते हैं और नए जन्म लेते हैं. उसी प्रकार समाज में भी नए समाज जन्म लेते हैं और पुराने मरते हैं. लोकविद्या आन्दोलन से जुड़ा समूह बुद्धिजीवी नहीं है,
अनेक जन संघर्षों/आन्दोलनों में भागीदारी के साथ बहुजन स्वराज पंचायत के विचार पर यह समूह पहुंचा है. पिछले दो वर्षों से इस शोध कार्यक्रम पर यह समूह कार्य कर रहा है. लोकविद्या और सामान्य जीवन के गतिशील रिश्तों के आधार पर बहुजन समाज की शक्तियों का एक भाव पूर्ण आकलन करने का प्रयास है, जो आज की अन्यायी व्यवस्थाओं और परिस्थितियों से मोर्चा ले सके. इसके लिए बहुजन, स्वराज, सामान्य जीवन और लोकविद्या ये चारों मिलकर हमारे लिए साधन हैं, मार्ग हैं, कसौटी है और लक्ष्य भी.
बहुजन समाज का एक नया नैरेटिव बनाने की ओर ये कदम है. यह सामाजिक न्याय आन्दोलन और आर्थिक बराबरी के आन्दोलन के जुड़वां उद्देश्यों को समाहित करता आगे का कदम है. आज वित्तीय पूंजी, तकनीकी, आर्थिक व्यवस्था और राज्यसत्ता इन सबका ‘ज्ञान’ आधार एक ही ‘साइंस’ में है. इस शोधकार्य के माध्यम से इस अन्यायी गठबंधन को चुनौती देने के मार्गों को बनाने के प्रयास हैं.
पिछले कुछ वर्षों से विद्या आश्रम से इस शोध कार्य को आकार देने की दिशा में तीन तरह की गतिविधियाँ चल रही हैं.
- वर्ष 2020 से कोविड के चलते हुए लॉक डाउन और किसान आन्दोलन के सन्दर्भों के साथ ऑनलाइन चर्चा चलाई गई. ये साप्ताहिक चर्चाएँ सामान्य जन और लोकविद्या के दृष्टिकोण से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठे विविध प्रश्नों, प्रसंगों और नीतियों पर निरंतर अभी तक चल रही हैं. इन चर्चाओं का रिकॉर्डिंग/ट्रांसक्रिप्शन के लिंक विद्या आश्रम की वेब साईट पर उपलब्ध हैं.
- बहुजन समाज के बीच जाकर बहुजन ज्ञान संवाद चलाया गया. उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल क्षेत्र और वाराणसी के आस-पास विविध कार्यक्रम हुए. बौद्धिक सत्याग्रह ज्ञान पंचायत, और लोकविद्या सत्संग के साथ इस ज्ञान संवाद/विमर्श को चलाया गया.
- बहुजन शोध पत्रिका के रूप में ‘सुर साधना’ का प्रकाशन होता है.
इस शोध कार्यक्रम के लक्ष्य और कार्य पद्धति विश्वविद्यालयों में हो रहे शोध से भिन्न हैं. कुछ अवधारणाओं के तहत कार्य आगे बढ़ा है उनमें प्रमुख हैं-
- सामान्य जीवन की परंपरा बहुजन समाज की जीवन परंपरा है.
- लोकविद्या की परंपरा बहुजन समाज की ज्ञान परंपरा है.
- स्वराज की परंपरा बहुजन समाज की राज परंपरा है.
- संत परंपरा बहुजन समाज की दर्शन परंपरा है.
- बहुजन समाज में विधि-विधान की परंपरा, पंचायत की परंपरा है.
- समाज में छोटी पूंजी से अपना कारोबार चलाने की बहुजन समाज के लोगों की जो समझ और व्यवस्था है, वह उनकी अर्थनीति का आधार है.
- बहुजन समाज में हर गतिविधि कलापूर्ण है.
- बहुजन समाज में तर्क का प्रकार भावपूर्ण है.
अंत में उन्होंने कहा कि यह बहुजन स्वराज पंचायत इस कार्य को अपने हाथ में ले, इसका विस्तार करे, और बहुजन स्वराज बनाने के मार्ग गढ़े.विभिन्न अंचलों में बहुजन स्वराज पंचायतों के आयोजन हों और पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर बहुजन समाज का नया नरेटीव बनाने के कदम उठें.
इसके बाद खुली चर्चा हुईं, जिसमे अनेक लोगों ने अपने विचार रखे और अपनी पहल के बारे में बातें रखीं.
जानकी भगत:
समाजशास्त्र जो पढ़ाया जाता है,उसमें समाज की बुराइयों का अवलोकन किया जाता है. विश्वविद्यालय के लोग समाज धर्म की परिभाषा भी नहीं जानते.
अवधेश कुमार:
सिंगरौली का क्षेत्र लोकविद्या के दृष्टि से जानने के लिए बहुत उपयुक्त है.
अरुण कुमार:
लोकविद्या सामान्य लोगों की आवाज बन सकती है.
विजय जांवधिया:
पैसे की लफंगा गिरी पर समाज का नियंत्रण चाहिए. बहुजन ही संपत्ति का निर्माण करता है. वितरण का कार्य राज्य सरकार करती है. सही ढंग से वितरण न हो पाने के कारण आज बहुजन समाज संकट में है.
रामजनम:
इस पंचायत को आगे बढ़ाने के लिए एक समिति बने. इस बहस को दूसरे अंचलों में ले जाने की कार्य योजना बने और एक संरक्षक मंडल बने.
लक्ष्मी चंद दुबे:
सिंगरौली जिले में बहुत सारे कारखाने हैं. मजदूर की हालत चिंताजनक है. पूंजी पति की पूंजी बढ़ती जा रही है. हम अपने क्षेत्र में एक बहुजन स्वराज पंचायत करेंगे.
राम किशोर चौहान:
समाज में हुए संत आंदोलन के संतों के विचार और पदों को संकलित/समाहित करना चाहिए. हम अपने जिले देवरिया में एक बहुजन स्वराज पंचायत का आयोजन करेंगे.
रामजी यादव:
हम बहुजन समाज के कलाओं के दस्तावेजीकरण का काम कर रहे हैं. हमें यह लगता है कि हम गांव की ओर जाएं और गांव के लोगों की बातों को सुने. उनके अंदर अपने ज्ञान और श्रम को लेकर कैसे आत्मविश्वास पैदा हो यह कोशिश करनी चाहिए.
अक्षय कुमार:
समाज माइक्रोफाइनेंस के माध्यम से छोटे-छोटे कर्ज में फस गया है. हमें इस विषय पर भी विमर्श करना चाहिए कि कैसे बहुजन समाज के लोग कर्ज के इस जाल से मुक्त हों.
विनोद चौबे:
इसके नाम से मैं बहुत सहमत नहीं हूं. लेकिन मैं इसके विचार से पूरी तरह सहमत हूं. मैं अपने क्षेत्र में एक बहुजन स्वराज पंचायत का आयोजन करूंगा.
राजेंद्र मानव:
बनारस में रिंग रोड के पास विस्थापन का काम हो रहा है. वहां पर भी एक बहुजन स्वराज पंचायत करवाने की जिम्मेदारी लेता हूं.
हरिश्चंद्र केवट:
मैं घाट पर और जिन क्षेत्रों में मैं काम करता हूं, वहां पर मैं अधिक से अधिक संख्या में बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित करूंगा.
संजीव कीर्तने, फज़लुर्रहमान अंसारी, एहसान अली, आर्यमन, लक्ष्मण प्रसाद इत्यादि लोगों ने भी अपनी बात रखी. कोलकाता से आये विद्या आश्रम के मूल सदस्य अभिजीत मित्र ने खुली चर्चा में हिस्सा लिया और बहुजन स्वराज पंचायत के विचार का समर्थन किया और कोलकोता में इस विचार को आगे बढ़ाने की बात की.
निकट भविष्य में निम्नलिखत व्यक्तियों ने बहुजन स्वराज पंचायतों के आयोजन की जिम्मेदारी लेने की घोषणा की.
1- सिंगरौली और सोनभद्र में लक्ष्मीचंद दुबे
2- देवरिया में रामकिशोर चौहान
3- चोलापुर, वाराणसी में विनोद चौबे
4- वाराणसी में राजेंद्र मानव
5- सलारपुर, वाराणसी में लक्ष्मण प्रसाद
6- जौनपुर में रामजनम
7- बदलापुर, जिला जौनपुर में रामयश यादव (स्वराज अभियान)
8- हरिश्चंद्र केवट ने यह जिम्मेदारी ली है कि वह घाट पर और अपने क्षेत्र में बहुजन स्वराज पंचायत आयोजित करेंगे.
प्रवाल कुमार सिंह, वाराणसी (अध्यक्ष, पीयूसीएल, वाराणसी):
इस सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रवाल कुमार सिंह ने कहा कि सिविल लिबर्टी (नागरिक स्वतन्त्रता) का पालन व सम्मान अपने परिवार और समाज में होना चाहिए. यह बात भी पंचायतों के विचार विमर्श में शामिल की जानी चाहिए.
सुनील सहस्रबुद्धे, वाराणसी (अध्यक्ष, विद्या आश्रम):
इस सत्र के दूसरे अध्यक्ष सुनील सहस्रबुद्धे ने कहा कि इस पंचायत में जो निर्णय लिया गया है उसको क्रियान्वित करने में जिस भी तरह के सहयोग की जरूरत होगी, विद्या आश्रम उसमें मदद करेगा. एक ध्यान देने की बात यह है कि बहुजन की पहल पर स्वराज की जब भी बात होगी तब कला पर बात होगी, अन्यथा बहस और सोच दूसरी दिशा में चली जाएगी. आधुनिक यूरोपीय सोच के तार्किक आधार व नींव में साइंस और उसकी तर्क प्रणाली है जो नीति निरपेक्ष व भाव निरपेक्ष है. पाश्चात्य और आधुनिक दर्शन की खासियत यह है कि मनुष्य की सोच में से साइंटिफिक तत्वों को छोड़ कर शेष सब छांट देते हैं. इसलिए वह भाव विहीन हो जाती है. ‘स्वतंत्रता’ और ‘लोकतंत्र’ जैसे विचारों का अंतिम आधार भी साइंस की ही तार्किक प्रणाली में होता है. बहुजन के तर्क की प्रणाली अलग है. बहुजन का तर्क भाव प्रधान व कला प्रधान होता है. बहुजन स्वराज की दिशा में समाज निर्माण का कार्य बहुजन स्वराज पंचायतों की पहल से ही हो पाएगा. इन्हें बनाया जाए.
समापन करते हुए पारमिता ने बहुजन स्वराज पंचायत के सभी भागीदारों को धन्यवाद दिया. उन्होंने आवाहन किया कि बहुजन स्वराज के निर्माण की शुरुआत हो गई है, हम सब इसे बहुजन समाज की शक्तियों का स्रोत बनाने की दिशा में आगे बढ़ें.
उन्होंने इस पंचायत की भोजन, आवास और सभी व्यवस्थाओं को बनाने में विद्या आश्रम के कमलेश कुमार की सदारत में व्यवस्थापक मंडल प्रभावती, अंजू देवी और चम्पादेवी को धन्यवाद दिया तथा सादा लेकिन स्वादिष्ट भोजन उपलब्ध कराने के लिए पप्पू और उनके साथियों को धन्यवाद दिया. पगडंडी समूह से आये युवाओं और आश्रमवासी किशोरों ने व्यवस्थाओं को सुचारू चलने के लिए जो स्वयंसेवा की वह प्रशंसनीय रही. सभी लोगों को धन्यवाद देते हुए उन्होंने कहा कि ऐसी बहुजन स्वराज पंचायतों को आगे भी करने में इन सभी का सहयोग मिलता रहेगा इसकी उम्मीद हम करते हैं.
अंत में अरुण कुमार के साथ मिलकर अनेक युवाओं ने गीत प्रस्तुत किया.
पढ़िए:
पंचायत के अवसर पर प्रकाशित बहुजन स्वराज पंचायत की किताब
11 अक्तूबर 2025 की बहुजन ज्ञान विमर्श बैठक में बहुजन स्वराज पंचायत के भावी कार्यक्रमों की पहल
सत्रों का शब्दांकन:
स्वागत और विषय प्रवेश, सत्र 1: बहुजन समाज, सत्र 2: बहुजन समाज, सत्र 3: समाज सृजन का कला मार्ग
सत्र 4: स्वराज, सत्र 5: स्वराज

